नज़रिया: कोविंद उन्हें फ़ायदा दिला पाएंगे जिन्हें वाक़ई ज़रूरत है?

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रामनाथ कोविंद का भारत के 14वें राष्ट्रपति के तौर पर चुना जाना देश की राजनीति में दलित राजनीति के उभार में मील का पत्थर है.

रामनाथ कोविंद, केआर नारायणन के बाद देश के दूसरे दलित राष्ट्रपति बने हैं.

कोविंद को राष्ट्रपति बनाए जाने को दलित राजनीति के लिहाज़ से बीजेपी का मास्टरस्ट्रोक माना जा रहा है.

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केआर नारायणन सीढ़ी दर सीढ़ी चढ़ते हुए राष्ट्रपति के पद तक पहुंचे थे.

वो 1992 में उपराष्ट्रपति चुने गए थे. फिर जब 1997 में वो उपराष्ट्रपति के पद से हट रहे थे तब उन्हें राष्ट्रपति के उम्मीदवार के तौर पर चुना गया था.

उनका नाम अचानक राष्ट्रपति के लिए नहीं सामने आया था.

हालांकि नारायणन दलित समुदाय से राष्ट्रपति बनने वाले पहले शख्स ज़रूर थे लेकिन उनका दलित होना उस वक्त राजनीति का केंद्रीय मुद्दा नहीं था.

जाना-पहचाना नाम

राष्ट्रपति बनने से पहले से ही वो भारतीय राजनीति में जाना-पहचाना नाम थे. वो उपराष्ट्रपति होने से पहले एक विद्वान, राजनयिक, प्रशासक और केंद्रीय मंत्री रह चुके थे.

इसलिए उनकी कामयाबी में उनकी दलित पहचान की कोई अहम भूमिका नहीं थी.

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लेकिन जब बीजेपी ने रामनाथ कोविंद का नाम राष्ट्रपति के उम्मीदवार के लिए घोषित किया तो बिहार छोड़कर बाकी जगहों पर शायद ही ज्यादा लोग उनको जानते हो.

वो उस वक्त बिहार के राज्यपाल थे. उनके नाम की घोषणा ज़रूर अचानक हुई लेकिन इसमें आश्चर्यजनक कुछ भी नहीं था क्योंकि बीजेपी को ख़ुद को दलितों की हितैषी बताने के लिए किसी दलित चेहरे की तलाश थी.

रामनाथ कोविंद में बीजेपी को वो उम्मीदवार नज़र आया.

कोविंद का चुनाव एक औपचारिकता भर था क्योंकि बीजेपी के पास केंद्र और राज्यों दोनों ही जगहों के मतों में बहुमत हासिल था.

प्रतीकात्मक राजनीति

चुनाव आयोग के आकड़ों के मुताबिक कोविंद को 65.65 फ़ीसदी वोट मिले जो कि 1974 के बाद से किसी राष्ट्रपति को मिला सबसे कम वोट है. केआर नारायणन को 1997 में 94.97 फ़ीसदी वोट मिला था.

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कोविंद के राष्ट्रपति बनने से इसमें कोई शक नहीं है कि दलितों से जुड़े मुद्दे भारतीय राजनीति के केंद्र में आ गए हैं.

बहुत संभव है कि इसने अब तक दलित राजनीति का चेहरा रहीं मायावती को राज्य सभा से इस्तीफ़ा देने को मजबूर किया हो.

लेकिन सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या दलितों को ऐसी प्रतीकात्मक राजनीति से फ़ायदा मिलने वाला है?

बहुत हद तक इसका जवाब ना में है. इससे कोई इंकार नहीं है कि इस तरह की प्रतीकात्मक राजनीति से दलित समुदाय के बीच तरक्की का बोध विकसित होगा.

लेकिन इसका फ़ायदा सबसे हाशिए पर पड़े हुए दलितों को नहीं मिलेगा जिनको मदद की सबसे ज्यादा ज़रूरत है.

राजनीतिक फायदा

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विधायिका, शैक्षणिक संस्थानों और सार्वजनिक क्षेत्रों में आरक्षण से मिलने वाले फ़ायदे हाशिए पर पड़े इस तबके की बजाए दलित समुदाय के ही दूसरे संपन्न लोगों को मिलते रहे हैं.

लेकिन यह एक ऐसी वास्तविकता है जो हाल के सालों में चर्चा में आई हो ऐसा नहीं है. दशकों से इस पर चर्चा होती रही है लेकिन राजनीतिक वर्ग अपनी सुविधानुसार इस मुद्दे को टालता रहा है.

वे दलित समुदाय से आने वाले उस प्रभावशाली तबके को नाराज़ नहीं करना चाहते हैं जो इस समुदाय के अंदर अपना प्रभाव रखता है.

अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति की सूची में संशोधन करने को लेकर 1965 में सलाहकार समिति बनाई गई थी. इसे आम तौर पर लोकुर समिति कहते हैं.

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इस समिति का कहना था, "कई बार ऐसा देखा गया है कि दलितों को मिलने वाले फ़ायदों का बड़ा हिस्सा बड़ी संख्या और राजनीतिक तौर पर संगठित समुदायों को मिलता है. छोटे और अधिक पिछड़े समुदाय इस लोकतांत्रिक प्रक्रिया में पिछड़ जाते हैं इसलिए उन्हें विशेष सहायता की ज़रूरत है."

समिति की रिपोर्ट में कहा गया था, "हालांकि बड़ी और राजनीतिक तौर पर चेतनशील जातियों के राजनीतिक दावों से बचना मुश्किल है इसलिए योजना और मिलने वाले फ़ायदों के वितरण के मामले में अधिक पिछड़े और छोटे समूहों पर ध्यान केंद्रित करने की ज़रूरत है."

रिपोर्ट में आगे कहा गया है, "हमने राजनीतिक अधिकारों को विकास संबंधी फ़ायदों से अलग रखने के बारे में सोचा लेकिन हम यह सिफ़ारिश इसलिए नहीं दे रहे हैं क्योंकि राजनीतिक आरक्षण जल्द ही ख़त्म होने वाले हैं. इसके बदले हम यह सिफ़ारिश करते हैं कि कई सूची में मौजूद कई जातियां जो अधिक जरूरतमंद है उन्हें विकास संबंधि योजनाओं में अधिक वरियता दी जाए."

लोकुर समिति ने अपनी सिफ़ारिशें 1965 में दी थीं जब आधिकारिक तौर पर कहा गया था कि दलित और आदिवासी समुदायों के लिए राजनीतिक आरक्षण 1970 में खत्म कर दिया जाएगा.

लेकिन राजनीतिक वर्ग अपने हितों में फंसा हुआ था और वो दशकों तक राजनीतिक आरक्षण को बढ़ाता रहा. कोई भी दल सत्ता में हो यह हर दस साल के लिए आगे बढ़ जाता है.

अनसुनी की सिफारिशें

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राजनीतिक वर्ग ने समिति के दूसरी सिफारिशों को भी अनसुना कर दिया जिसके तहत लाभ उठा चुके या फिर जिन्हें जरूरत नहीं है, उन तबकों को अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति की सूची से बाहर रखने की बात हुई थी.

लोकुर समिति ने जिन 1965 में जिन प्रवृतियों की तरफ़ ध्यान दिलाया था, वो आज लगभग आधी सदी के बाद अब पूरी तरह से देश की राजनीति पर हावी हो चुकी है.

क्या नए राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद समाज के सबसे हाशिए पर पड़े लोगों के हितों के लिए कुछ कर पाएंगे?

अगर वो ऐसा कर पाते हैं तो उनकी जीत के मायने सिर्फ प्रतीकात्मक नहीं होंगे बल्कि वो भारत के राष्ट्रपतियों के इतिहास में एक वाकई में बदलाव लाने वाले राष्ट्रपति के तौर पर याद किए जाएंगे.

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