नज़रिया: 'नीतीश कुमार यू-टर्न की राजनीति के मास्टर हैं'

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अगर यही सब कुछ होना था तो आखिर क्यों चार अहम साल (16 जुलाई, 2013 से 26 जुलाई, 2017) बर्बाद किए गए? बिहार के हर हलके में आज ये सवाल छाया हुआ है. और आज जिनकी साख पर बट्टा लगने में जरा भी वक्त नहीं लगा, वो शख्स कोई और नहीं बल्कि छवि गढ़ने की राजनीति के माहिर खिलाड़ी नीतीश कुमार हैं.

गुरुवार को नीतीश कुमार ने महागठबंधन का दामन छोड़ छठी बार बिहार के मुख्यमंत्री के पद की शपथ ली. इस बार नीतीश ने अपनी कैबिनेट में पुराने दोस्त सुशील कुमार मोदी को तेजस्वी यादव वाली जगह दी है.

चाहे नीतीश को पसंद करने वाले लोग हों या फिर उनकी मुखालफत करने वाले, हर कोई आज ये पूछ रहा है कि इन चार सालों में जो चार सरकारें आईं और गईं और उनकी वजह से जो राजनीतिक अस्थिरता और प्रशासनिक अनिश्चितता का माहौल रहा, उसके लिए किसे जिम्मेदार ठहराया जाना चाहिए.

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समता पार्टी का गठन

अगर वे इसकी जिम्मेदारी बड़े भाई लालू यादव पर थोपना चाहते हैं कि उनके मामले में गलती हो गई तो हर किसी को ये मालूम है कि आरजेडी के मुखिया एक दोषी करार दिए गए राजनेता हैं और अन्य नेताओं की तरह वंशवाद की राजनीति उनकी भी कमजोरी है.

साल 1994 में जब नीतीश कुमार ने समता पार्टी बनाने के लिए लालू यादव का साथ छोड़ा था तो अच्छी-खासी संख्या में जनता दल समर्थक पार्टी छोड़ कर उनके साथ हो लिए थे. 1995 के विधानसभा चुनावों में नीतीश ने भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के साथ गठबंधन कर पहली बार अलग चुनाव लड़ा था तो कहीं कोई खुसफुसाहट तक नहीं हुई.

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बीजेपी की डिनर पार्टी

साल भर बाद ही नीतीश ने यू-टर्न लिया और भारतीय जनता पार्टी के खेमे में शरीक हो गए तो कहीं-कहीं विरोध के सुर सुनाई दिए. कुछ नेताओं ने समता पार्टी छोड़ दी जिसमें सैयद शहाबुद्दीन जैसे नाम थे लेकिन तब कई लोगों ने ये दलील दी कि बीजेपी को गले लगाना नीतीश की सियासी मजबूरी थी, नहीं तो उनका वजूद ही मिट जाता.

मंडल के बाद की राजनीति में बीजेपी को एक पिछड़ी जाति का नेता मिल गया था. नीतीश जिस काबिल थे, उन्हें उससे ज्यादा अहमियत मिली. वक्त गुजरता और बदलता रहा.

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गुजरात सरकार को चेक वापसी

12 जून, 2010 को नीतीश कुमार ने पटना में भारतीय जनता पार्टी के वरिष्ठ नेताओं के लिए रात्रिभोज का कार्यक्रम रद्द कर दिया. बीजेपी का शीर्ष नेतृत्व पार्टी कार्यकारिणी की बैठक के सिलसिले में इकट्ठा हुआ था.

इसके कुछ हफ्ते बाद नीतीश कुमार गुजरात सरकार को दान में मिले पांच करोड़ रुपये की रकम वापस कर देते हैं. गुजरात सरकार ने ये पैसा 2008 के कोसी बाढ़ पीड़ितों के लिए सहायता राशि के तौर पर दी थी. भगवा खेमे में इस बात को लेकर गहरी निराशा थी.

चार महीने बाद बिहार विधानसभा के चुनाव थे और इसे देखते हुए पार्टी अपमान का घूंट पीकर रह गई. लेकिन इस घटना के साढ़े तीन साल बाद जब नीतीश कुमार ने अचानक सभी मंत्रियों को बिना कोई कारण बताए मंत्रिमंडल से बर्खास्त कर दिया तो उनके शुभचिंतक भी उनसे नफरत करने लगे.

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मोदी की हुंकार रैली

तब बीजेपी के किसी भी मंत्री के खिलाफ न तो भ्रष्टाचार का कोई आरोप था और न ही सरकार का कामकाज ठीक से न करने का, लेकिन इसके बावजूद उन्हें चलता कर दिया गया. बदले में भाजपा नेताओं की तरफ से उन्हें पसंदीदा गालियां दी गईं, ऐसे शब्दों के इस्तेमाल किए गए जो कभी लालू प्रसाद यादव तक के ख़िलाफ़ नहीं किए गए थे.

मीडिया में नीतीश कुमार को अवसरवादी और गद्दार तक करार दिया गया. बोध गया में जब बम धमाके हुए और 27 अक्टूबर, 2013 को पटना में नरेंद्र मोदी की हुंकार रैली के दौरान गांधी मैदान में बम फट गया तो उनके पुराने दोस्तों ने उन पर चरमपंथियों के प्रति नरम रवैया रखने का आरोप तक लगाया.

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2014 के चुनाव

तब नीतीश के लिए इस स्थिति का सामना करने में मुश्किल आ गई. मई, 2014 के लोकसभा चुनाव के नतीजे आने के ठीक एक दिन बाद नीतीश कुमार ने नैतिक जिम्मेदारी लेते हुए मुख्यमंत्री पद से इस्तीफ़ा दे दिया. तब नीतीश ने मुख्यमंत्री पद के लिए जीतनराम मांझी को चुना. और फिर शुरू हुआ बिहार में नौ महीने की अराजकता का दौर.

नीतीश पर्दे के पीछे रहकर सरकार चलाना चाहते थे और जीतनराम मांझी को ये पसंद नहीं था. इसके बाद नीतीश कुमार और जीतनराम मांझी के समर्थकों के बीच सार्वजनिक तौर पर तू-तू-मैं-मैं का दौर शुरू हुआ. और आखिरकार जीतनराम मांझी को भी सत्ता से बाहर का दरवाजा दिखा दिया गया.

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जीतनराम मांझी प्रकरण

फरवरी, 2015 के आखिरी हफ्ते में नीतीश कुमार एक बार फिर से बिहार के मुख्यमंत्री बने. इस नौ महीने में जीतनराम मांझी ने खुलकर नीतीश कुमार पर भ्रष्ट ठेकेदारों को संरक्षण देने का आरोप लगाया. मांझी के मुताबिक ये ठेकेदार बिहार को लूट रहे थे. उन्होंने बिहार सरकार में चल रहे कई गंभीर घोटालों की तरफ लोगों का ध्यान दिलाया.

नीतीश ने जब देखा कि उनकी छवि पर गहरे दाग रहे हैं तो उन्होंने लालू प्रसाद यादव के साथ हाथ मिला लिया. वे जानते थे कि लालू यादव के पास वोट बैंक है, लेकिन अदालत से दोषी करार दिए जाने के बाद वे मुख्यमंत्री नहीं बन सकते हैं.

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महागठबंधन की जीत

आरजेडी सुप्रीमो राजनीतिक तौर पर फिर से प्रासंगिक होने के लिए बेकरार थे और लालू यादव को एक बार फिर से इसका मौका मिल गया. इसके बाद आरजेडी, जेडीयू और कांग्रेस के बीच महागठबंधन हुआ और बिहार की 243 में से 178 सीटें इनकी झोली में आ गिरी. अगर तीनों पार्टियां अलग होकर लड़ी होतीं तो 78 सीटें तक इनके लिए जीतना मुश्किल था.

इसलिए एक तरीके से कहा जाए तो लालू यादव ने नीतीश को हारने से बचाया और नीतीश ने लालू यादव को राजनीति की मुख्यधारा में फिर से लाने में मदद की. इसलिए आज जो कुछ हो रहा है, उसके लिए नीतीश किसी को दोष नहीं दे सकते. महागठबंधन के बारे में वो जो कुछ कहना चाहते हैं, कहने के लिए आजाद हैं.

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जेडीयू-आरजेडी का विलय प्रस्ताव

लेकिन हकीकत तो ये है कि ये 20 महीने उन 29 महीनों (16 जून, 2013 से 20 नवंबर, 2015) से कही बेहतर हैं जब नीतीश कुमार सभी तरह के राजनीतिक प्रयोगों में मशरूफ थे. जब आरजेडी, जेडीयू और कांग्रेस में गठबंधन हुआ था तो कई लोगों ने कहा था, 'गुड़ खाते हैं, गुल-गुले से परहेज करते हैं.'

जेडीयू-आरजेडी के विलय प्रस्ताव पर भी नीतीश कुमार को कोई हिचक नहीं थी और 28 मार्च, 2015 को तिहाड़ जेल में बंद ओम प्रकाश चौटाला से मिलने में भी उन्होंने कोई गुरेज नहीं किया लेकिन अपने डिप्टी मुख्यमंत्री से उन्हें महज एक एफआईआर होने पर दिक्कत हो गई.

एनडीए में नीतीश की घरवापसी को जितनी तेजी से अंजाम दिया गया उससे लोगों का ये ख्याल अब जोर पकड़ रहा है कि नीतीश ने मनमाने किस्म की राजनीति शुरू कर दी है.

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