#70yearsofpartition: मुसलमान नहीं सिख हैं इस दरगाह के ख़ादिम

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सिखों ने आपस में चंदा इकट्ठा कर दरगाह को ठीक किया.

दूर तक ढोल नगाड़ों की धुन सुनाई पड़ती है. रास्ते में लोगों का हुजूम भी है जो भारत और पकिस्तान के बार्डर अटारी से सूफी संतों - हज़रत खिज़्मत अली शाह और हज़रत इज़मत अली शाह की दरगाह की तरफ बढ़ रहा है .

दरगाह के मुहाने पर हरे झंडे हैं जिन पर चाँद और तारे बने हुए हैं. लोगों के हाथों में चादरें भी हैं जिनपर कलमा या क़ुरान की आयतें लिखीं हुईं हैं. दरगाह पर सज्जादानशीन भी हैं.

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मगर इनमें से कोई भी मुसलमान नहीं है. ये सभी सिख हैं. दरगाह पर आने वाले भी और इसकी देखभाल करने वाले भी.

दरगाह

हर सप्ताह बुधवार को यहाँ मेला लगता है जिसमे क़व्वालियों, पारम्परिक लोक गीत, सूफी गीत और सामूहिक लंगर का आयोजन किया जाता है.

दरगाह का इतिहास बहुत पुराना है. स्थानीय लोग बताते हैं कि यह दरगाह उस समय की है जब यहाँ मुग़ल बादशाह जहांगीर की हुकूमत थी.

स्थानीय लोगों का यह भी कहना है कि ये दरगाह 1640 से 1670 के बीच बनायी गयी थी.

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दरगाह

इसी इलाक़े में मुग़ल बादशाह जहांगीर की आरामगाह भी हुआ करती थी जहां वो अपने प्रवासों के दौरान ठहरा करते थे.

हज़रत खिज़्मत अली शाह और हज़रत इज़मत अली शाह के बारे में स्थानीय लोग बताते हैं कि ये उसी दौर में आये थे. कहाँ से आये थे किसी को पता नहीं. लेकिन इन दोनों सूफ़ी संतों की दरगाह भी उसे दौर की है जिसका निर्माण भी मुग़लों के दौर में ही हुआ था.

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राजाताल के लोग बताते हैं कि 1947 के आस पास ये दरगाह बहुत बुरे हाल में हुआ करती थी. भवन खंडहर हो चुका था और पीरों की क़ब्रें भी बुरे हाल में ही थीं. बंटवारे के बाद, यानी मुसलामानों के जाने के बाद, यहाँ के सिखों ने आपस में चंदा कर दरगाह का सौन्दर्यकरण किया.

दरगाह

बंटवारे से पहले दरगाह के ख़ादिम यानी देखभाल करने वाले मुसलमान हुआ करते थे. राजाताल में भी मुसलमानों की बड़ी आबादी भी हुआ करती थी. 1640 के आसपास के दौर में यहां एक मस्जिद भी बनी थी जो आज खंडहर हो चुकी है.

1947 में बटवारा हुआ. पंजाब का भी बंटवारा हुआ और राजाताल के मुसलमान सरहद के उस पार यानी पाकिस्तान चले गए.

दरगाह

मगर लोगों की इस दरगाह से जुड़ी आस्था का बंटवारा नहीं हो पाया.

राजाताल के बुज़ुर्ग सुब्बा सिंह कहते हैं कि पुश्त दर पुश्त सिखों की आस्था हज़रत खिज़्मत अली शाह और हज़रत इज़मत अली शाह की दरगाह से जुड़ी हुई है.

वो कहते हैं कि बंटवारे के बाद भी सरहद के उस पार से मुसलमान इस दरगाह पर आया करते थे और चादर चढ़ाया करते थे.

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दरगाह

सुब्बा सिंह का कहना था, "सरहद पर कंटीले तारों बाढ़ कुछ सालों पहले ही लगी है. उससे पहले जब तार नहीं थे तब अक्सर लोग दरगाह पर चादर चढाने आया करते थे. ये मेल मिलाप की जगह भी थी. जब से तार लगे हैं तब से वहां से लोगों का आना बंद हो गया है."

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सुब्बा सिंह

दरगाह पर स्थानीय लोगों की आस्था का यह हाल है कि इसके सारे रस्म-ओ-रिवाज वैसे ही हैं जैसा मुसलमान किया करते थे.

चाहे सालाना उर्स का आयोजन हो या फिर दरगाह के अंदर दुसरे बुज़ुर्गों की क़ब्रों की देखभाल हो.

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दरगाह की संचालन समिति के अध्यक्ष विरासत सिंह बताते हैं कि हर साल समिति के नए सदस्य चुने जाते हैं.

लोग आपस में पैसे जमा कर लंगर कराते हैं. सांस्कृतिक कार्यक्रमों का आयोजन करते हैं.

विरासत सिंह

वे कहते हैं, "आस्था अपने आप में मुकम्मल होती है. हम सिख हैं. गुरुद्वारे जाते हैं. इस दरगाह पर भी हमारी आस्था किसी मुसलमान से कम नहीं है. देश को बाटा गया मगर आस्था नहीं बट पायी."

आज अटारी के इस इलाक़े में मुसलामानों की कोई आबादी नहीं है.

मगर हज़रत खिज़्मत अली शाह और हज़रत इज़मत अली शाह की दरगाह स्थानीय सिख समुदाय की आस्था का एक बहुत बड़ा केंद्र बन गया है.

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