क्या फूलपुर संसदीय सीट बीजेपी के गले की हड्डी बन गई है?

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उत्तर प्रदेश की विधानसभा और विधान परिषद दोनों जगह नेता सदन भी उन सदनों के सदस्य नहीं हैं. विधानसभा में मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ नेता सदन हैं जबकि विधानपरिषद में उप मुख्यमंत्री डॉक्टर दिनेश शर्मा.

छह महीने तक बिना किसी सदन का सदस्य बने भी मंत्री बने रहने की अनुमति भारतीय संविधान ने दे रखी है.

लेकिन जब किसी राज्य के मुख्यमंत्री, दो-दो उपमुख्यमंत्री और कुछ अन्य मंत्री भी चार महीने बीत जाने के बाद भी सदस्यता न ले रहे हों तो राजनीतिक गलियारों में इसकी चर्चाएं होना स्वाभाविक है.

मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ और केशव प्रसाद मौर्य लोकसभा के सदस्य हैं, इसलिए उनके वोटों की अहमियत को समझते हुए राष्ट्रपति चुनाव तक इस मामले को खींचा गया, लेकिन उसके बाद भी उनकी सदस्यता पर संशय को हवा देने लगा है.

हालांकि डॉक्टर दिनेश शर्मा को विधान परिषद में नेता सदन बनाने से ये स्पष्ट है कि उनको उसी सदन का सदस्य बनाने की कोशिश होगी, लेकिन केशव मौर्य को लेकर कई तरह के सवाल उठ रहे हैं.

चार महीने से ज़्यादा का समय बीत चुका है और अभी तक योगी और केशव मौर्य ने लोकसभा सदस्यता से इस्तीफ़ा तक नहीं दिया है और न ही ये स्पष्ट है कि ये लोग किन सीटों पर मुक़ाबला करके विधानसभा में आएंगे.

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बीजेपी प्रवक्ता राकेश त्रिपाठी का कहना है, "इस मामले में संसदीय बोर्ड फ़ैसला करेगा कि कौन किस सीट से लड़ेगा, कौन लोकसभा की सदस्यता से त्यागपत्र देगा या फिर कौन केंद्र में जाएगा या नहीं जाएगा."

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सियासी दांव

दरअसल, चर्चा ये चल रही हैं कि यदि फूलपुर की सीट से केशव मौर्य इस्तीफ़ा देते हैं तो बीएसपी नेता मायावती संयुक्त विपक्ष की ओर से यहां से चुनाव लड़ सकती हैं.

हालांकि इस बारे में न तो बीएसपी की ओर से अभी कोई रुझान मिला है और न ही विपक्षी दलों की ओर से इसकी कोई जानकारी सामने आई है.

लेकिन जिस तरह से विपक्ष ने राज्यसभा से इस्तीफ़े के वक़्त मायावती के समर्थन में एकजुटता दिखाई उसे देखते हुए इसकी संभावनाओं से इनकार भी नहीं किया जा सकता है.

हालांकि वरिष्ठ पत्रकार सुनीता ऐरन को इसकी संभावनाएं बहुत कम दिखती हैं.

वो कहती हैं, "कांशीराम के समय में तो ये होता था कि बीएसपी उपचुनाव लड़ती थी लेकिन अब ऐसा नहीं है. अब पार्टी उपचुनाव को लेकर बहुत उत्सुक नहीं रहती है. जहां तक मायावती का सवाल है तो मुझे नहीं लगता कि वो फूलपुर से चुनाव लड़ेंगी."

दरअसल, फूलपुर की सीट न सिर्फ़ इसलिए काफी अहम है कि यहां नेहरू समेत तमाम दिग्गज चुनाव लड़ चुके हैं. कई दिग्गज हार भी चुके हैं.

लेकिन बीजेपी के लिए सबसे अहम बात ये है कि 2014 में इस सीट पर पार्टी ने पहली बार जीत हासिल की थी.

कथित 'राम लहर' में भी बीजेपी यहां से जीत हासिल नहीं कर पाई थी. इसलिए वो किसी क़ीमत पर उपचुनाव में इसे खोना नहीं चाहती है.

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विकल्प

माना जा रहा है कि बीजेपी अपनी रणनीति बदल सकती है और केशव मौर्य को यूपी की बजाय केंद्र में बुला सकती है.

यही नहीं, इन तीनों के अलावा दो और मंत्री ऐसे हैं जिन्हें किसी सदन का सदस्य बनना है.

परिवहन मंत्री स्वतंत्र देव सिंह और मंत्रिपरिषद में एकमात्र मुस्लिम चेहरा मोहसिन रज़ा भी किसी सदन के सदस्य नहीं हैं. ऐसे में पांच सीटों की व्यवस्था करना भी पार्टी के लिए आसान नहीं है.

जहां तक केशव मौर्य का सवाल है तो उनके केंद्र में जाने की अटकलों को सुनीता ऐरन भी सही मानती हैं, लेकिन वजह कुछ और बताती हैं, "केशव मौर्य केंद्र में जा सकते हैं लेकिन इसकी वजह मुख्यमंत्री के साथ उनके संबंधों का ठीक न होना है. दोनों के बीच ट्यूनिंग ठीक नहीं है. इसलिए हो सकता है कि केंद्र में कोई अच्छा मंत्रालय देकर केशव को दिल्ली बुला लिया जाए."

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मुश्किल

जानकारों का कहना है कि केशव मौर्य के सामने एक समस्या ये भी है कि फूलपुर सीट छोड़कर वो विधानसभा का चुनाव कहां से लड़ेंगे.

यहां एक दिलचस्प बात ये है कि तीन सौ से ज़्यादा विधायक होने के बावजूद मुख्यमंत्री और दोनों उप मुख्यमंत्रियों के लिए अभी तक एक भी विधायक ने अपनी सीट छोड़ने की पेशकश नहीं की है जबकि आमतौर पर ऐसा होता नहीं है.

हालांकि राजनीतिक पर्यवेक्षक इस बात को ज़्यादा अहमियत नहीं देते क्योंकि उनके मुताबिक़ ये पार्टी का फ़ैसला होगा, जिसे कहा जाएगा उसे सीट छोड़नी होगी.

बहरहाल, इन्हीं सब मसलों पर विचार करने और निर्णय लेने के लिए पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह 29 तारीख को तीन दिनों के लिए लखनऊ पहुंचे हैं और समझा जा रहा है कि उनकी इस यात्रा के दौरान ये मसला हल कर लिया जाएगा.

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