अरविंद पनगढ़िया पुरानी नीतियों को ही आगे बढ़ा रहे थे: स्वदेशी जागरण मंच

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Image caption जनवरी 2015 में नीति आयोग के पहले उपाध्यक्ष बनाए गए थे अरविंद पनगढ़िया

नीति आयोग के उपाध्यक्ष अरविंद पनगढ़िया ने मंगलवार को अपने पद से इस्तीफा दे दिया था. इसका कारण उन्होंने बताया था कि कोलंबिया विश्वविद्यालय उन्हें और एक्सटेंशन नहीं दे रहा है जिसके कारण वह उपाध्यक्ष पद छोड़ रहे हैं और वापस अकादमिक जीवन की ओर लौट रहे हैं.

इसके विपरीत ऐसी रिपोर्ट्स थीं कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से जुड़े स्वदेशी जागरण मंच समेत कई संगठन उनकी नीतियों से खुश नहीं थे और इसके दबाव में उन्हें पद से इस्तीफ़ा देना पड़ा.

अरविंद पनगढ़िया का नीति आयोग के उपाध्यक्ष पद से इस्तीफ़ा

'सीमा से बाहर जाकर काम कर रहा था आयोग'

नीति आयोग की नीतियों और अरविंद पनगढ़िया को लेकर बीबीसी संवाददाता विनीत खरे ने स्वदेशी जागरण मंच के राष्ट्रीय संयोजक अरुण ओझा से बात की.

नीति आयोग के काम करने के तरीके के सवाल पर ओझा ने कहा, "सरकार को कुछ क्षेत्रों के लिए नीति बनाने में मदद करने के लिए नीति आयोग का गठन किया गया था. लेकिन कई मामलों में वह अपनी सीमा से बाहर जाकर काम कर रहा था. जीन संवर्धित फ़सलों का स्वदेशी जागरण मंच ने विरोध किया था. इसमें नीति आयोग ने दखल देते हुए सरकार से कहा था कि पूरे देश में जीन संवर्धित फ़सलों को अनुमति मिलनी चाहिए."

Image caption स्वदेशी जागरण मंच के राष्ट्रीय संयोजक अरुण ओझा

ओझा कहते हैं कि आयोग को इस मामले में दख़ल नहीं देना चाहिए था क्योंकि सुप्रीम कोर्ट में यह मामला चल रहा है और यह विवादास्पद विषय है. उन्होंने कहा कि जागरण मंच ने इसका विरोध करते हुए इस संबंध में कई कार्यक्रम भी किए थे और एक कार्यक्रम में नीति आयोग के सदस्यों को अपनी बात रखने के लिए बुलाया था, लेकिन वह नहीं आए और न ही फिर उनसे संपर्क किया गया.

गुजरात मॉडल के प्रशंसक रहे हैं पनगढ़िया

क्या आयोग पुरानी धारा को आगे बढ़ा रहा था?

इन मुद्दों को लेकर सरकार के पास जाने पर उनकी तरफ़ से क्या जवाब मिलता था इस सवाल पर उन्होंने कहा, ''सरकार हमारी बात सुनती रही है और समय के हिसाब से वह अपना निर्णय लेते रहती है.''

ओझा का कहना है कि उन्होंने इसको लेकर वित्त मंत्री, वाणिज्य मंत्री और प्रधानमंत्री को भी पत्र लिखा था, लेकिन उनकी तरफ़ से कोई जवाब नहीं आया.

जीन संवर्धित फ़सलों के अलावा नीति आयोग को किन मुद्दों पर काम करना चाहिए था? इस सवाल पर ओझा ने कहा, "नीति आयोग को कई चीज़ें करनी चाहिए थीं. योजना आयोग को भंग करने के बाद जब इस आयोग का गठन किया गया तब पूरी दुनिया की परिस्थितयां बदल रही थीं. आयोग को भविष्य कि आर्थिक दिशा को देखते हुए भूमंडलीकरण और उदारीकरण के विकल्प के लिए काम करना चाहिए था. लेकिन वह पुरानी धारा को आगे बढ़ाने में लगा हुआ था."

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Image caption योजना आयोग को भंग करके बना था नीति आयोग

अरविंद पनगढ़िया के कार्यकाल को अनुत्पादक बताते हुए ओझा कहते हैं, ''वह कोई भी ऐसा काम नहीं कर रहे थे जिसको उनके जाने से धक्का पहुंचेगा. उन्होंने कहा कि नीति आयोग कोई नई चीज़ लेकर सामने नहीं आया था, आर्थिक सुधार के नाम पर वह पुरानी नीतियों को ही आगे बढ़ा रहा थे.''

'भारत की संस्कृति को ध्यान में रखे आयोग'

नीति आयोग को कैसा होना चाहिए? इस सवाल पर ओझा ने कहा, "नीति आयोग के नाम से ही स्पष्ट है कि वह नीति बनाने वाली संस्था होनी चाहिए. हर सेक्टर में उन्हीं नीतियों को आगे नहीं बढ़ाना चाहिए जो पूरी दुनिया में चल रही हैं. भारत की आवश्यकता, संस्कृति और प्रकृति को ध्यान में रखते हुए शिक्षा, व्यवसाय, रोज़गार, टेक्नॉलॉजी के क्षेत्र में नीति आयोग को काम करना चाहिए. विदेशी निवेश पर ज़ोर देने पर हमें आपत्ति है."

योजना आयोग की जगह बना नीति आयोग

स्वदेशी जागरण मंच के कारण पनगढ़िया के इस्तीफ़ा देने की चर्चा पर उन्होंने कहा कि उनकी संस्था किसी व्यक्ति को हटाने पर सरकार पर दबाव नहीं डालती और न ही व्यक्तियों के संबंध में उन्होंने सरकार को कोई प्रतिक्रिया दी. वह केवल नीतियों के बारे में बात करते हैं और वह सरकार से नहीं कहते कि वह किसी को बनाएं या हटाएं, लेकिन सरकार को नीतियों को लेकर अपनी बात कहते हैं.

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Image caption पद्म भूषण से सम्मानित हैं अरविंद पनगढ़िया

31 अगस्त तक पद पर बने रहेंगे पनगढ़िया

ओझा कहते हैं कि पनगढ़िया उसी धारा का प्रतिनिधित्व करते थे जो पूंजीवाद, उदारवाद के नाम पर चल रही है. उन्होंने कहा कि आरबीआई के पूर्व गवर्नर रघुराम राजन और यही लोग टॉप माइंड नहीं थे और बाहर से पढ़कर आ रहा व्यक्ति ही टॉप माइंड नहीं है, देश के अंदर भी कई टॉप मांइड हैं.

वह कहते हैं कि इस पद पर ऐसे व्यक्ति को आना चाहिए जो भारत की आवश्यक्ता, प्रकृति और संस्कृति को ठीक से समझता हो.

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