पहचान बचाने के लिए जूझ रहे हैं कश्मीरी पठान

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कश्मीर के पठान

भारत प्रशासित कश्मीर के अनंतनाग में एक गांव है छत्तीसिंहपुरा. सेब के बागीचों के बीच बसे इस ख़ूबसूरत गांव से होकर एक नदी भी बहती है जिसे स्थानीय लोग शाह कुल कहते हैं.

इस गांव में रहने वालों का मुख्य पेशा खेतीबाड़ी है. कुछ लोग ग़रीब हैं तो कुछ अच्छे से गुज़र-बसर कर रहे हैं. इस गांव को ख़ास बनाते हैं यहां के बाशिंदे जो बाजोड़ पख़्तून समुदाय से हैं.

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इस गांव के पठान समुदाय की कई बातें कश्मीरियों से अलग हैं. भाषा तो अलग है ही, अन्य तौर-तरीकों में भी बहुत फ़र्क है. जैसे कि समुदाय में पैदा होने वाली समस्याओं को वे झिरगा के ज़रिए हल करते हैं.

एक तरह की पंचायत, झिरगा, में गांवों के कई लोग बैठकर समस्या का हल निकालते हैं. शादी को लेकर भी बहुत सी बातें अलग हैं. इस गांव में पश्तो बोलने वाले 250 परिवार रहते हैं. यहीं रहते हैं 57 साल के बशीर अहमद जो अपने समुदाय की पहचान को लेकर फ़िक्रमंद हैं.

वह अकेले नहीं हैं जिन्हें लगता है कि उनकी तहज़ीब और ज़ुबान खतरे में है. इस समुदाय के बड़े-बुजुर्गों को लगता है कि कश्मीर में रहकर भी उनकी अलग पहचान बनी हुई थी मगर अब वह गुम होती जा रही है.

Image caption अनंतनाग में पश्तो बोलने वाले पठानों के 250 परिवार हैं

कहां से आए ये लोग?

बशीर अहमद का कहना है कि हमारे परदादा वगैरह यहां कारोबार के लिए आए थे. वो बताते हैं कि 1931 के आसपास उनके दादा और कई लोग पाकिस्तान के बाजोड़ से यहां आए थे. इस समुदाय को साल 1954 में नागरिकता मिली.

कश्मीर के मशहूर इतिहासकार मोहम्मद यूसुफ़ कहते हैं, 'कुछ तो अफ़ग़ानिस्तान से आए थे तो और कुछ पख़्तूनों को डोगरा हुक्मरान अपनी ज़रूरत के लिए यहां लाए थे. ये वफ़ादार और रौबदार होते थे. डोगरा सिपाही उस लायक नहीं थे.'

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मोहम्मद यूसुफ़ बताते हैं कि अफ़गानिस्तान में हालात ख़राब होने की वजह से भी पठान यहां पर आकर बसे. उन्होंने कहा, 'अफ़गान पठान यहां 1755 में आए. 1819 में रणजीत सिंह ने यहां हमला किया और उनके आखिरी राजा ज़बान ख़ान का अंत किया.'

बशीर के मुताबिक कश्मीर के अलग-अलग इलाकों में उनकी कम्युनिटी के करीब 80 हजार लोग हैं. वह इस बात को लेकर चिंतित हैं कि नई पीढ़ी अब अपने समुदाय से बाहर भी शादी करने लगी है.

वो कहते हैं कि ऐसा करना उनके समुदाय की तहज़ीब और ज़ुबान को ख़त्म करने की तरफ़ एक क़दम है.

Image caption समुदाय के बुजुर्गों को लगता है कि उनकी तहज़ीब और ज़ुबान ख़तरे में है

उनके अनुसार, 'अब हालात बदल रहे हैं. नई पीढ़ी अब गांव से बाहर जाने लगी है. अब वह बहुत सारे चेहरे देख लेती है. हमारी शरियत में इसके लिए मनाही तो नहीं है मगर कोई लव मैरिज करे तो हम लोग मजबूर हो जाते हैं. पिछले दो-तीन सालों में ऐसे कुछ मामले सामने आए हैं. हमें इस बात की काफ़ी चिंता है.'

बशीर कहते हैं, 'अगर कोई दूसरे समुदाय की लड़की हमारे यहां शादी करती है तो पश्तो सीख लेती है. लेकिन हमारी लड़की अगर बाहर शादी करेगी तो वह अपनी ज़ुबान भूल जाएगी और उसके बच्चे भी. यह दुख की बात है. फिर भी हम कोशिश करते हैं कि ऐसा न हो.'

समुदाय से बाहर शादी के ख़िलाफ़ नहीं हैं युवा

21 साल के ताहम के विचार बशीर से अलग हैं. उनका मानना है कि अपने समुदाय से बाहर शादी करना बुरी बात नहीं है. वह कहते हैं, 'कोशिश यह रहनी चाहिए कि हमारी संस्कृति बचे, हमारी ज़ुबान बचे. बाहर शादी करने में कोई बुराई नहीं है. पहले हमारे दिमाग़ में यही होता था कि चाचा या ख़ाला की बेटी से शादी करनी है. लेकिन अब नई पीढ़ी पढ़ाई कर रही है, कॉलेज जा रही है. वहां दोस्त बनते हैं तो कभी-कभी यह दोस्ती रिश्ते में भी बदल जाती है.'

मगर 36 साल के राज महमद ख़ान कहते हैं कि नई पीढ़ी अपनी संस्कृति से दूर होती जा रही है जो अच्छा इशारा नहीं है. उन्होंने कहा, 'बाहर के समुदायों से शादी करने से हमारा वजूद ख़तरे में पड़ेगा. हम पठानों में कुछ मामले अलग होते हैं जिनपर फर्क पड़ेगा. हमारी ज़ुबान ही नहीं रहेगी. नई पीढ़ी तो अब अपना पठानी लिबास तक नहीं पहनती.'

Image caption शाइस्ता कहती हैं कि लड़कियों का बाहर शादी करना बुज़ुर्गों को पसंद नहीं है

इस समुदाय की महिलाएं पहले पर्दे में रहा करती थीं मगर इसमें भी अब बदलाव आ रहा है. नई पीढ़ी पर्दे का इस्तेमाल बहुत कम करती है. शाइस्ता ख़ान 12वीं में पढ़ती हैं और वह अपनी कम्यूनिटी में हो रहे बदलाव से वाकिफ़ हैं. वह कहती हैं, 'अब हमारी कम्यूनिटी में लड़कियां पढ़ाई कर रही हैं और वे घर से बाहर निकलने लगी हैं. मगर शादी की बात है तो हमारे भाई बाहर की लड़की तो ला सकते हैं मगर हम बाहर शादी नहीं कर सकते. हमारे बुजुर्गों को यह पसंद नहीं है.'

ऐसा नहीं है कि सारे बुज़ुर्ग समुदाय से बाहर शादी करने को ग़लत मानते हैं. 72 साल के महमद ख़ान ने 30 साल पहले अपने बेटे की शादी ग़ैर पख़्तून समुदाय में करने से इनकार कर दिया था. मगर आज उनका मानना है कि ग़ैर-समुदाय में शादी कोई गुनाह नहीं है.

भाषा को लेकर सरकार से भी है नाराज़गी

यह पठान कम्यूनिटी अपनी ज़ुबान को बचाने की जंग भी लड़ रही है. बशीर कहते हैं कि उनकी भाषा को बचाने के लिए सरकार की तरफ़ से कुछ नहीं किया जा रहा. उन्होंने कहा, 'तहज़ीब के बाद दूसरा बड़ा मसला हमारे लिए यह है कि सरकार कश्मीर में हमारी पश्तो ज़ुबान के लिए कुछ नहीं कर रही. एक ज़माना था जब कश्मीर के प्रसार भारती से पश्तो ज़ुबान का एक न्यूज़ बुलेटिन हुआ करता था. उसे भी बंद कर दिया गया है.'

Image caption पाकिस्तानी रिश्तेदारों से मंगवाई पश्तो किताबें पढ़ाते हैं बच्चों को

यहां पर बहुत सारे लोगों ने अपने घरों पर सैटलाइट टीवी लगाए हैं ताकि पश्तो में समाचार सुन करें. बशीर कहते हैं कि यहां की कल्चरल अकैडमी में भी हमारा कोई नाम नहीं है.

वो कहते हैं, 'कई बार हमने पाकिस्तान से आने वाले रिश्तेदारों से अपनी ज़ुबान की साहित्यिक किताबें मंगवाई हैं. अपने बच्चों को अपनी भाषा इन्हीं किताबों से सिखाते हैं.'

पश्तो भाषा के गाने सुनने के लिए यहां के युवा यूट्यूब को ख़ूब इस्तेमाल करते हैं. कश्मीर में 90 के दशक की शुरुआत में संघर्ष तेज होने के बाद से इस समुदाय का पाकिस्तान या अफ़गानिस्तान में रह रहे अपने रिश्तेदारों से भी संपर्क टूट चुका है.

मगर सोशल मीडिया इनके लिए मददगार साबित हुआ है. सोशल मीडिया ने इस समुदाय की नई जेनरेशन को पाकिस्तान या अन्य जगहों पर रहने वाले पख्तूनों के करीब लाया है. फिर भी सोशल मीडिया इनके दर्द को कम नहीं कर पाता है.

Image caption यूट्यूब पर पश्तो म्यूज़िक वीडियो देखते शाहमीर

शाहमीर कहते हैं, 'सोशल मीडिया के ज़रिए हम अपने समुदाय के लोगों से तो जुड़ गए हैं मगर दिल में एक कसक है. जब हम लोग अपने गांवों से बाहर निकलते हैं तो कश्मीरी या उर्दू में बात करनी पड़ती है. हम चाहते हैं कि हमारा इलाका ऐसा हो कि हम चलें तो हमारे लोग ख़त्म न हो.'

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