दिग्विजय सिंह ने कांग्रेस महासचिव पद से क्यों दिया इस्तीफ़ा?

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गुरुवार को दिग्विजय ने पार्टी महासचिव पद से अपना इस्तीफ़ा दे दिया. उन्होंने पार्टी अध्यक्ष सोनिया गांधी और उपाध्यक्ष राहुल गांधी को त्याग पत्र भेजा है.

ऐसा क्या हुआ कि उन्हें इस्तीफा देना पड़ा, क्या वह हाशिये पर थे?

यूपीए के दौर में एक वक़्त था जब नेहरू-गांधी परिवार तक अपनी बात पहुंचाने के लिए न केवल कांग्रेस कार्यकर्ता बल्कि पार्टी के मुख्यमंत्री तक दिग्विजय सिंह के दरवाज़े पर दस्तक दिया करते थे.

उन्हें पार्टी का अनाधिकारिक प्रवक्ता माना जाता था. कहा जाता था कि कांग्रेस जो बात आधिकारिक रूप से नहीं कह सकती, वो दिग्विजय सिंह कहते हैं.

वो यूपीए के दोनों कार्यकाल में बिना किसी मंत्रालय के गांधी परिवार से अपने नजदीकी के बूते सत्ता के गलियारों में ताक़तवर बने रहे. अब हालात बदल गए हैं.कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी ने मंगलवार को दिग्विजय सिंह से तेलंगाना का प्रभार वापस ले लिया था. इससे पहले उन्हें गोवा और कर्नाटक के प्रभार से हटाया गया था. दिग्विजय के पास आंध्र प्रदेश का ही प्रभार बाकी था जहां पर पार्टी का एक भी विधायक नहीं है.

दिग्विजय के स्थान पर अब रामचंद्र कुंतिया तेलंगाना प्रदेश कांग्रेस की ज़िम्मेदारी देखेंगे. चू्ंकि अभी पार्टी ने दिग्विजय का इस्तीफ़ा स्वीकार नहीं किया है, इसलिए अभी आंध्र प्रदेश के प्रभारी का नाम घोषित नहीं किया गया है.

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अच्छे दिनों पर सवाल

चंद्राबाबू नायडू के पिछले कार्यकाल के बाद कांग्रेस यहां लगातार 10 साल (2004-2014) सत्ता में रही लेकिन आज हालात ऐसे हैं कि राज्य विधानसभा में पार्टी का कोई नाम लेने वाला नहीं है.

क्या दिग्विजय सिंह के अच्छे दिन गुजर गए?

इस सवाल पर कांग्रेस पार्टी के मीडिया सेल से जुड़े एसवी रमणी कहते हैं, "पहले लोग ये सोचते थे कि राहुल गांधी पर दिग्विजय सिंह ख़ासा असर रखते हैं. लोग अब ये कह रहे हैं कि उन्हें किनारे कर दिया गया है. हालांकि यह सच है कि नेहरू-गांधी परिवार से उनके रिश्ते पहले जैसे ही हैं. सोनिया गांधी, राहुल गांधी और दिग्विजय सिंह के आपसी संबंधों पर हम बाहर से कुछ नहीं कह सकते हैं."

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Image caption दिग्विजय सिंह दो बार मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री रहे और उनके हटने के बाद कांग्रेस वहां फिर कभी सत्ता में आ नहीं सकी

नर्मदा परिक्रमा यात्रा

दो हफ़्ते पहले 'इकनॉमिक टाइम्स' को दिए एक इंटरव्यू में दिग्विजय सिंह ने कहा था कि वो जल्द ही नर्मदा परिक्रमा पदयात्रा करने जा रहे हैं. 30 सितंबर से इसे शुरू करने के संकेत भी दिए थे.

उनके मुताबिक, हालांकि वो लंबे अरसे से इसके बारे में सोच रहे थे लेकिन ज़िम्मेदारियों के चलते उन्हें यह मौक़ा नहीं मिल पाया था. उन्होंने कहा कि 'यह सिर्फ़ एक धार्मिक और आध्यात्मिक कार्यक्रम है और राजनीति से इसका कोई लेना देना नहीं' है.

हालांकि सियासी हलकों में कयास लगाए जा रहे हैं कि गुजरात और मध्य प्रदेश के आगामी चुनावों के मद्देनज़र ही उन्होंने यह कार्यक्रम बनाया होगा.

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'दिग्गी राजा'

कांग्रेस हाई कमान में एक अहम नेता की हैसियत रखने वाले दिग्विजय सिंह 2014 के आम चुनावों के पहले तक प्रभावी रहे.

आंध्र प्रदेश के विभाजन के समय दिल्ली के लोधी गार्डेन्स स्थित उनका निवास केंद्रीय मंत्रियों, मुख्यमंत्रियों और अन्य नेताओं से खचाखच भरा रहता था.

मध्य प्रदेश के आम जन भी अपनी समस्याओं को लेकर उनसे मिलने के लिए आया करते थे. राज परिवार से जुड़े दिग्विजय सिंह को लोग 'दिग्गी राजा' के नाम से भी बुलाते हैं. हालांकि आंध्र प्रदेश के विभाजन के बाद हालात बदल गए.

तेलंगाना के पार्टी नेता दिग्विजय सिंह की कार्यशैली और उनके कामकाज के तौर-तरीक़ों की खुली आलोचना करने लगे. उनके ख़िलाफ़ गोवा में भी आवाज़ें उठीं.

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आलोचना के स्वर

यह भी ख़बर है कि कुछ नेताओं ने हाई कमान से शिकायत की कि दिग्विजय सिंह को गोवा, कर्नाटक, तेलंगाना और आंध्र प्रदेश का प्रभार दिए जाने के कारण वो किसी भी प्रदेश के साथ न्याय नहीं कर पा रहे हैं.

कई लोगों ने दिग्विजय की कार्यशैली की खुलेआम आलोचना की जिनमें एआईसीसी के पूर्व सचिव वी हनुमंतराव एक हैं.

हनुमंतराव ने बीबीसी से बात करते हुए कहा, 'जिन राज्यों के वो प्रभारी रहे, उन पर उनका ध्यान ही नहीं रहा. गोवा में सरकार गठन जैसे अहम मुद्दों पर वो विफल रहे. पार्टी में गुटबाजी को ख़त्म करने के लिए उन्होंने कुछ नहीं किया.'

हनुमंतराव की बातों का लब्बोलुआब यह था कि दिग्विजय ने न तो ज़मीनी स्तर पर कोई काम किया और न ही ऐसा काम करने वालों पर ध्यान दिया.

हनुमंतराव का मानना है कि दिग्विजय सिंह की कार्यशैली से पार्टी को नुक़सान हो रहा था और इसीलिए राहुल गांधी ने उन्हें तेलंगाना प्रदेश कांग्रेस के प्रभार से मुक्त करने का फ़ैसला लिया.

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दो मौक़ों पर हुई चूक

तेलंगाना राष्ट्र समिति के अध्यक्ष और तेलंगाना के वर्तमान मुख्यमंत्री के चंद्रशेखर राव ने तेलंगाना के गठन के बाद सोनिया गांधी को ये आश्वासन दिया था कि वो अपनी पार्टी का कांग्रेस में विलय कर देंगे.

विभाजन के समय वो परिवार समेत दिल्ली आकर गांधी परिवार से मिले थे. बाद में सोनिया के कहने पर वो दिग्विजय सिंह से मिलने गए थे.

दोनों पार्टियों के कई नेता पिछले तीन सालों में कई बार यह कहते सुने गए कि दिग्विजय सिंह की गलत कार्यशैली के कारण ही चंद्रशेखर राव अपने वादे से मुकर गए.

तेलंगाना के गठन बावजूद राज्य में कांग्रेस के बुरे प्रदर्शन के लिए भी दिग्विजय सिंह की कार्यशैली को ज़िम्मेदार माना जा रहा था.

हाल ही में कांग्रेस पार्टी के नेता और पूर्व मंत्री शब्बीर अली ने आंध्र ज्योति से बात करते हुए इस बात की पुष्टि भी की थी.

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गोवा की नाकामी

गोवा विधानसभा के चुनावों में कांग्रेस पार्टी को ज़्यादा सीटें मिलने के बावजूद सरकार नहीं बन पाने के लिए भी दिग्विजय सिंह को दोषी माना गया.

आरोप ये भी लगे थे कि दिग्गी की देरी का भाजपा ने फ़ायदा उठा लिया. इसके बाद ही सोनिया ने दिग्विजय को गोवा के प्रभार से हटा दिया था.

हालांकि कांग्रेस के पूर्व सांसद पोन्नम प्रभाकर ने बीबीसी से बात करते हुए कहा कि कांग्रेस पार्टी में प्रभारी की ज़िम्मेदारी स्थाई नहीं होती और इसमें फ़ेरबदल कोई नई बात नहीं है.

उनका मानना है कि चूंकि दिग्विजय सिंह अनुभवी नेता हैं इसलिए राज्यों का प्रभार युवा नेताओं को सौंपकर, दिग्विजय की सेवाओं को राष्ट्रीय स्तर पर इस्तेमाल किया जा सकता है.

उन्होंने इस बात से इनकार नहीं किया कि उन्हें तेलंगाना प्रभार से हटाने के लिए कांग्रेस में टीआरएस का विलय न हो पाना एक कारण हो सकता है, जैसा कि उनकी पार्टी के अन्य नेताओं ने खुलेआम कहा था.

मध्य प्रदेश मुख्यमंत्री के रूप में दस साल काम करने वाले दिग्विजय सिंह फ़िलहाल राज्यसभा सदस्य हैं.

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