चरमपंथ के ख़िलाफ़ सेना का साथ क्यों दे रहे कश्मीरी?

कश्मीर में पिछले दो महीनों के दौरान हिंसक विरोध प्रदर्शनों में कमी आई है इमेज कॉपीरइट Getty Images
Image caption कश्मीर में पिछले दो महीनों के दौरान हिंसक विरोध प्रदर्शनों में कमी आई है

पिछले दो महीनों से कश्मीर घाटी में जारी हिंसक विरोध प्रदर्शनों को रोकने की कार्रवाइयों में खासा वृद्धि हुई है. खासकर उस दक्षिणी हिस्से में जिसे नई पीढ़ी के चरमपंथ का गढ़ माना जाता है.

जून-जुलाई 2017 के महीने में लश्कर-ए-तैयबा प्रमुख अबू दुजाना और लश्कर के ही एक और शीर्ष कमांडर बशीर लश्करी समेत कश्मीर घाटी में लगभग 36 चरमपंथी मारे गए, इनमें हिज़बुल मुज़ाहिद्दीन के कई शीर्ष चरमपंथी भी शामिल थे. इस सूची में नियंत्रण रेखा पर घुसपैठ की कोशिश में मारे गए चरमपंथी शामिल नहीं हैं.

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एक ओर पुलिस और अन्य सुरक्षा एजेंसियां चरमपंथ को बेअसर करने में मिली कामयाबी का जश्न मना रही हैं, तो वहीं दूसरी तरफ़ अलगाववादियों को यह पसंद नहीं आ रहा. जेल में बंद आसिया अंद्राबी के नेतृत्व वाले महिलाओं के कट्टरवादी संगठन दुख़्तरान-ए-मिल्लत ने मारे गए चरमपंथियों की संख्या में वृद्धि पर खुलकर अपनी चिंता व्यक्त की है.

दुख़्तरान-ए-मिल्लत की महासचिव नाहिदा नसरीन ने 22 जून को एक बयान में कहा, "मारे जा रहे चरमपंथियों की संख्या बढ़ गई है. हम आज़ादी के समर्थक और चरमपंथी गुटों से आग्रह करते हैं कि इतनी बड़ी संख्या में मुजाहिदीनों की मौत के पीछे कमियों को तलाशें और साथ ही गोलीबारी के दौरान उन्हें बचाने की कोशिश में लगे युवाओं की पहचान करें.

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पुलिस और सेना समेत अन्य सुरक्षाकर्मियों को चरमपंथियों की मौज़ूदगी की अधिक से अधिक सटीक सूचनाएं मिल रही हैं. जहां एक ओर यह उनके संबंधित ख़ुफ़िया विभागों की दक्षता को दिखाता है तो वहीं दूसरी तरफ़ एक कठोर सच को भी ज़ाहिर करता है कि अब पहले की तुलना में कश्मीर के लोग सुरक्षाबलों की मदद के लिए आगे आ रहे हैं. दुख़्तरान-ए-मिल्लत का बयान यही इशारा करता है.

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कश्मीर के अस्थिर राजनीतिक और सैन्य घटनाओं पर नज़र रखने वाले कुछ विश्लेषक इसका कारण विभिन्न चरमपंथी संगठनों के बीच प्रतिद्वंद्विता को बताते हैं.

हिज़बुल कमांडर ज़ाकिर मूसा अलगाववादी संगठन हुर्रियत के ख़िलाफ़ यह कहते हुए विद्रोह करते है कि चरमपंथी तथाकथित आज़ादी या पाकिस्तान के लिए नहीं बल्कि इस्लामी ख़िलाफ़त की स्थापना के लिए लड़ रहे हैं. मूसा को हिज़बुल प्रमुख सैयद सलाहुद्दीन ने हटा दिया और हाल ही में उन्हें अल क़ायदा ने कश्मीर में अपना प्रमुख बनाया है.

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Image caption ज़ाकिर मूसा की उम्र 20 से 30 के बीच बताई जा रही है

विशेषज्ञों का तर्क है कि चरमपंथी गुट क्योंकि संबंधित समूहों में वर्चस्व और आपसी प्रतिद्वंद्विता को लेकर अपनी गतिविधियां गुप्त रखते हैं तो ये संभव है कि वो सुरक्षाबलों को अपने पूर्व सहयोगियों की जानकारियां मुहैया करा रहे हों.

हालांकि, कश्मीर पर नज़र रखने वाले कुछ अन्य विशेषज्ञों का मानना है कि वहां के लोगों का अलगाववादी राजनीति से धीरे-धीरे मोहभंग हो रहा है. हाल ही में एनआईए द्वारा चरमपंथियों को फ़ंडिंग मुहैया कराने के आरोप में कई अलगाववादी नेताओं की गिरफ़्तारी के बाद यह मोहभंग और भी बढ़ गया है.

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एनआईए एक निजी चैनल के उस स्टिंग ऑपरेशन के बाद हरकत में आया जिसमें अलगावादी हुर्रियत नेता यह स्वीकार कर रहे हैं कि उन्हें स्कूल जलाने और कश्मीर में अराजकता फैलाने के लिए पैसे मिलते हैं.

हालांकि ये नेता इस बात को सिरे से ख़ारिज कर चुके हैं, लेकिन यहां के अधिकांश लोग अब उनकी बातों को नहीं सुन रहे.

कश्मीर पर नज़र रखने वालों का मानना है कि यहां के लोग इस बात पर यक़ीन करते हैं कि यह चरमपंथ है जो अलगाववादी हुर्रियत नेताओं और उनकी राजनीति को प्रासंगिक बनाए रखता है और इसलिए चरमपंथ के ख़िलाफ़ अब उन्होंने सुरक्षाबलों का साथ देना शुरू कर दिया है.

(ये लेखक के निजी विचार हैं)

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