फेल बच्चा नहीं होता, व्यवस्था होती है: जेएस राजपूत

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केंद्रीय मंत्रिमंडल ने बुधवार आठवीं कक्षा तक के छात्रों को फेल न करने की नीति खत्म करने को मंजूरी दे दी है. सरकार का कहना है कि वो इसके लिए 'बच्चों के लिए मुफ्त एवं अनिवार्य शिक्षा संशोधन विधेयक' लाएगी.

साल 2010 में भारत सरकार ने बच्चों के लिए मुफ्त एवं अनिवार्य शिक्षा क़ानून लागू किया था जिसके तहत 6 से 14 साल के बच्चों को मुफ़्त और अनिवार्य शिक्षा देने की बात कही गई थी. साथ ही आठवीं तक बच्चों को फेल ना करने की नीति यानी नो डिटेंशन पॉलिसी भी अपनाई गई थी.

इस क़ानून को 10 साल भी पूरे नहीं हुए हैं और इसमें बदलाव किए जा रहे हैं.

आख़िर ऐसा करने की ज़रूरत क्यों पड़ी? इस पर पद्मश्री प्रोफ़ेसर जेएस राजपूत से बात की बीबीसी संवाददाता मानसी दाश ने

जेएस राजपूत के अनुसार जब हमने बच्चों को फेल ना करने या किसी क्लास में उसे ना रोकने का नियम लागू किया तो धीरे-धीरे पाया गया कि उसका सबसे अधिक असर बच्चों के ना सीखने पर पड़ रहा है.

हमारे यहां स्कूलों की जो स्थितियां हो वो ऐसी नहीं हैं कि हम बच्चों को ना फेल करने की बात कर सकें या पास फेल को बिल्कल समाप्त कर दें.

अगर हमारे यहां फिनलैंड जैसी स्थिति होती, सारे अध्यापक प्रशिक्षित होते, शिक्षक-छात्रों का अनुपात सही होता, स्कूलों में आवश्यक सुविधाएं होतीं, स्कूल के अध्यापकों को ग़ैर-शिक्षकीय काम ना करने पड़ते होते तो निश्चित तौर पर मैं कहता कि स्कीलों में नो डिटेंशन पॉलिसी ही चलनी चाहिए.

हम मानते हैं कि बच्चे के सीखने की सही मूल्यांकन उसका शिक्षक ही कर सकता है.

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ऊंची कक्षाओं में बड़े-बड़े विश्वविद्यालयों में ये बात लागू होती है कि जो शिक्षक बच्चों को प्रोजेक्ट देता है, पढ़ाता है वही उसका मूल्यांकन करता है.

मगर यहां ऐसा नहीं है. हमारे सरकारी स्कूलों को ले कर विशेष समस्या थी.

इन्हीं स्कूलों में आर्थिक रूप से कमज़ोर वर्ग के बच्चे पढ़ते ज़्यादा हैं. वो जब, मान लीजिए कक्षा तीन या चार में हैं और वे कक्षा एक की पुस्तक नहीं पढ़ पाते हैं तो ऐसे बच्चे को अगर आप कक्षा छह या सात में ले जाते हैं तो उसे एक बहुत बड़े मानसिक संत्रास से गुज़रना पड़ेगा.

उसकी शिक्षा लगभग समाप्त हो जाएगी औक कक्षा सात0आठ तक आते आते वो पढ़ाई छोड़ देगा.

सरकारी स्कूलों की स्थिति ख़राब है

जब ये फ़ैसला लिया गया था तब मुख्य रूप से इसके कुछ राजनीतिक कारण भी थे.

उस समय स्थिति ये थी कि फ़ैसला होना चाहिए था शिक्षकों की नियुक्ति प्रशिक्षण. लेकिन ऐसा कोई फ़ैसला नहीं लिया गया और ये फ़ैसला लागू कर दिया गया कि बच्चे को रोका नहीं जाएगा.

हमारे यहां अनेकों स्कूल ऐसे हैं जहां दो शिक्षक हैं और सौ छात्र हैं, उस स्कूल का एक शिक्षक हमेशी किसी ना किसी सरकारी काम से ग़ैर-शिक्षकीय काम में लगा रहता है, एक है जो स्कूल आता है. बहुत जगह पर पच्चीस फीसदी हमारे शिक्षक जाते ही नहीं. हमारी कार्य संस्कृति बहुत कमज़ोर है.

जब शिक्षक को इस बात पर कोई नियंत्रण ही नहीं है कि उसके कितने बच्चे पास हुए कितने नहीं तो वो शिथिल हो जाता है और इसकी असर बच्चे पर पड़ता है तो पढ़ाई से दूर होता जाता है.

इसीलिए परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए मुझे लगता है कि कक्षा पांच के बाद से साल में एक बार छात्रों का मूल्यांकन होना चाहिए.

अगर बच्चे में कोई कमी रहती है तो उसे पूरा करने के लिए पूरी कोशिश की जानी चाहिए और उसे एक दूसरा अवसर दिया जाना चाहिए.

इसके बाद किसी को शिकायत नहीं होनी चाहिए क्योंकि इसके बाद बच्चों की शिक्षा शुरू होगी तो उन्हें रोकने वालों की संख्या कम होगी.

शिक्षकों पर होना चाहिए ख़ास ध्यान

साथ ही हमें अपने शिक्षकों की तरफ भी ध्यान देना होगा. यदि एक बच्चा फेल होता है तो उसका साथ साथ उसके शिक्षक को भी उत्तरदायी माना जाना चाहिए. सरकार जिस तरीके से ठीक समझें उन्हें बताए कि उनके अध्यापन के तरीके में, कार्यक्षमता में कोई कमी रह गई है.

बच्चे के पढ़ाई में कम ध्यान होने के कई कारण होते हैं- शौचालय का ना होना या काम ना करना, पीने के पानी का ना होना, शिक्षक का ना आना - इस संबंध में आंकड़े को बढ़े है लेकिन वास्तविकता में देखने पर पता चलता है कि अभी भी इस दिशा में कमी है.

बच्चा कभी असफल नहीं होता ये तो व्यवस्था है जो असफल होती है.

जब तक बच्चा शैक्षणिक स्तर पर दूसरे बच्चों की बराबरी ना कर सके उसको ऊंची कक्षा में साथ बैठाना उसके साथ अन्याय करना है.

मैं मानता हूं कि किसी बच्चे को रोका जाएगा तो उसके आत्मसम्मान को ठेस पहुंचेगी. लेकिन इस प्रकार के परिवर्तन आवश्यक थे और राज्य सरकार और शिक्षकों के अनुरोध पर ये बदलाव किए गए हैं.

हमें कुछ वर्षों तक इन्हें लागू कर के इसके परिणाम देखने चाहिए.

बच्चों पर असर क्या पड़ेगा?

बच्चों पर हमेशा असर पड़ता था और इस फ़ैसले का भी सीधा असर पड़ेगा. मैं जानता हूं कि अनेक बच्चे स्कूल इसीलिए छोड़ देते थे क्योंकि अंग्रेज़ी में पिछड़ जाते थे, ख़ास कर उनके मुक़ाबले जिनके घर में अंग्रेज़ी में पढ़ाने वाले हों.

कक्षा में वो दूसरे बच्चों के सामने अंग्रेज़ी के छोटे-छ्टे वाक्य नही बोल पाते थे और इससे उनका अपमान होता था, इससे बचने का एक रास्ता था कि वो स्कूल छोड़ देते थे.

साठ-सत्तर के दशक में करोड़ों बच्चों ने शिक्षा केवल इसीलिए छोड़ी है कि वो अंग्रेज़ी में कमज़ोर थे. उस अपमान की स्थिति को भी हमें सोचना चाहिए.

जब तक हम अच्छे शिक्षक नहीं देंगे और बच्चों का आत्मविश्वास बढ़ाने के लिए उनकी अलग से कोचिंग नहीं करेंगे, तब तक केवल कक्षा में आगे बढ़ाते रहने से वो अधिक अपमान के भागीदार होंगे.

जब राइट टू एजूकेशन क़ानून बना था, संविधान में जो प्रावधान किया गया था तब उसमें लिखा था कि राज्य सरकार को 14 साल तक के बच्चों को मुफ्त शिक्षा मुहैया करानी होगी. उसमें ये नहीं लिखा था 'से 14'.

प्रीस्कूल की उम्र में ही पिछड़ जाते हैं बच्चे

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लेकिन सरकारों ने अनेक कारणों से जिनमें संभवत: राजनीतिक और संसाधन से जुड़े कारण भी हो सकते हैं, उसके छह से 14 कर दिया था. मेरा मानना है कि सरकार को छह साल के कम उम्र के बच्चों की ज़िम्मेदारी भी लेनी चाहिए. निजी स्कूलों में प्रीस्कूल में बच्चों को जो सुविधाएं और सीखने के अवसर मिल रही हैं वो सरकारी स्कूलों के बच्चों को नहीं मिलतीं.

तो ऐसे में साधनविहीन परिवारों के बच्चों और संसाधन वाले परिवारों के बच्चों में छह साल पहले ही एक फर्क आ जाता है. आगे बढ़ कर एक प्रतिस्पर्धात्मक दुनिया में दोनों कैसे एक दूसरे की बराबरी कर सकते हैं?

सरकार को प्रीस्कूल शिक्षा की व्यवस्था भी हर बच्चे के लिए करनी चाहिए. इसमें जितना निवेश होगा देश के लिए उतना ही अच्छा है.

विश्व भर में अधिकांश विकसित देशों में इस पर अध्ययन हो चुका है और उस भावना के साथ सरकारी स्कूलों में युद्ध स्तर पर सुधार करने के प्रयासों की ज़रूरत है.

इस तरह के सुधारों का केंद्रबिंदु होगा शिक्षक जो लगनशील हो, जिसे इस बात का आभास हो कि वो भविष्य की भारत की पीढ़ी तैयार कर रहा है, भारत के निर्माण में हिस्सेदारी कर रहा है.

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