मोदी में माद्दा है, वो ट्रंप को भी चुनौती दे सकते हैं: सुषमा स्वराज

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राज्यसभा में मोदी सरकारी की विदेशी नीति पर हुई बहस का जवाब विदेश मंत्री सुषमा स्वराज ने आक्रामक तेवर में दिया. सुषमा स्वराज ने विपक्षी दलों के सांसदों के हर सवालों का जवाब दिया और कहा कि मोदी सरकार में विदेश नीति काफ़ी ऊंचाई पर है.

समाजवादी पार्टी के सांसद रामगोपाल यादव ने सदन में कहा था कि भारत को सामरिक ताक़त बढ़ानी चाहिए और युद्ध के लिए तैयार रहना चाहिए.

'सामरिक नहीं आर्थिक क्षमता की ज़रूरत'

इस पर सुषमा स्वराज ने कहा, ''अब युग बदल गया है. अब कोई देश सामरिक ताक़त से नहीं बल्कि आर्थिक ताक़त से जाना जाता है. हमें सामरिक ताक़त से ज़्यादा आर्थिक ताक़त बढ़ाने की ज़रूरत है. हमारे पड़ोसी भी आर्थिक क्षमता के कारण ही हमारे साथ आएंगे. सामरिक क्षमता से हमारे पड़ोसी डरेंगे और आर्थिक क्षमता से हमारे साथ आना चाहेंगे.''

सुषमा ने कहा कि भारत की आर्थिक क्षमता को बढ़ाने में चीन की भी भूमिका है. उन्होंने कहा कि चीन के साथ आज की तारीख़ में भारत का 160 बिलियन डॉलर का व्यापार है और यह लगातार बढ़ रहा है.

सुषमा स्वराज ने कहा कि भारत की विेदेश नीति स्पष्ट है और किसी से डरने की बात ही नहीं है.

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मोदी में माद्दा है

भारतीय विदेश मंत्री ने कहा कि मोदी में डोनल्ड ट्रंप को भी चुनौती देने का माद्दा है. सुषमा ने कहा, ''जब अमरीकी राष्ट्रपति ने कहा कि पेरिस जलवायु समझौते से चीन और भारत को अरबों डॉलर मिलेंगे तो पीएम मोदी ने साफ़ कहा कि जलवायु समझौते पर भारत ने पैसे पाने के लिए हस्ताक्षर नहीं किया है बल्कि जलवायु के प्रति हमारी पांच हज़ार साल पुरानी प्रतिबद्धता है.''

सुषमा ने कहा, ''पीएम मोदी ने भारत को सम्मान दिलाया है. राज्यसभा में 16 सांसदों ने चीन, रूस, पाकिस्तान, डोकलाम और इसराइल का मुद्दा उभारा. हम मित्र किसे कहते हैं? जब कोई देश संकट में पड़ा है और वह सबसे पहले मदद करने पहुंचता है तो वह मित्र की श्रेणी में रहेगा. श्रीलंका में बाढ़ आई तो भारत पहुंचा. नेपाल में भूकंप आया तो भारत पहुंचा. नेपाल के निर्माण में भारत ने सबसे ज़्यादा पैसे दिए.''

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कांग्रेस ख़ुद की विदेश नीति पर सोचे

नेपाल पर राज्यसभा में कांग्रेस नेता आनंद शर्मा के सवालों का जवाब देते हुए सुषमा ने कहा, ''पीएम मोदी के पहले नेपाल 17 सालों तक कोई पीएम नहीं गया था. राजीव गांधी की नाकेबंदी कांग्रेस को याद होगी. ग्वादर, हम्बनटोटा, कोलंबो तीनों में चीन ने पोर्ट बनाया है. हम्बनटोटा में 2008 में चीन ने काम शुरू किया और 2011 में पूरा हुआ. कोलंबो में 2011 में शुरू किया और 2014 में ख़त्म हुआ. 2004 में ग्वादर की याद कांग्रेस को क्यों नहीं आई?''

सुषमा ने कांग्रेस पर तीखा हमला बोलते हुए कहा, ''आज आप हमारी विदेशी नीति पर बोल रहे हैं. आपकी सरकार ने जिन समस्याओं को जन्म लेते हुए चुपचाप देखती रही उसी से चिंता उपजी है. हमने हम्बनटोटा में कांग्रेस की पैदा की गई समस्या को अपने पक्ष में किया. प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने बांग्लादेश के साथ जो डील किया, उसको हमने भी आगे बढ़ाया. भूटान केवल दोस्त ही नहीं बल्कि जो डियरेस्ट होता है, वो है हमारा भूटान.''

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पाकिस्तान अब आतंकवाद बंद करे

सुषमा ने कहा, ''मोदी सरकार ने पाकिस्तान का रोडमैप तो सत्ता संभालने से पहले ही घोषित कर दिया था. हमने सार्क देशों को शपथग्रह्ण समारोह में बुलाया. 9 दिसंबर 2015 को मैं जब इस्लामाबाद गई तो नवाज़ शरीफ़ ने सरताज अज़ीज़ को पास बैठाकर कहा कि जो ये कह रहीं हैं उस हिसाब से बातचीत शुरू करो.''

सुषमा ने कहा, ''प्रधानमंत्री का क़ाबुल से लाहौर जाना आउट ऑफ बॉक्स क़दम था. रिश्तों की ऊंचाई ऐसी थी कि हमने प्रोटोकॉल का ख़्याल नहीं रखा. पठानकोट के बाद भी हम सहयोग कर रहे थे. स्थिति बुरहान वानी के मारे जाने के बाद बिगड़ी. नवाज शरीफ ने बुरहान वानी को शहीद घोषित कर दिया था. जब वो आतंकवाद बंद करेंगे तो बात शुरू होगी.''

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सुषमा का राहुल पर निशाना

कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी को आड़े हाथों लेते हुए सुषमा स्वराज ने कहा, ''1962 में अटल जी ने नेहरू जी को को पत्र लिखकर सदन बुलाने को कहा था और उन्होंने बुलाया था. देश की सबसे बड़ी विपक्षी पार्टी के नेता ने सदन बुलाने के बजाय चीनी दूतावास के अधिकारियों को बुलाया. उम्मीद थी कि विपक्ष सदन बुलाता, लेकिन चीनी दूतावास को बुलाया. राहुल गांधी चीनी दूतावास के अधिकारियों से मिले थे. पहले विपक्ष को भारत का दृष्टिकोण समझना चाहिए था तब चीन से बात करनी चाहिए थी.''

सुषमा ने कहा, ''हमने अपनी तरफ़ से सोचा कि सभी विपक्षियों के इसके बारे में सूचित किया जाना चाहिए. हमने दो दिनों तक बैठक की और सारी चीज़ें बताईं. हमने पूरी तरह से विपक्ष को संतुष्ट कर भेजा था. मैं कहती हूं धैर्य, संयम और भाषा का संयम बहुत ज़रूरी चीज़ है. हम उकसाने का काम नहीं करते. हमारा जो स्टैंड होता है वो लिखित होता है. हमने अपनी ओर से पहल की.''

'अमरीका से वीज़ा में कमी नहीं'

सुषमा स्वराज ने कहा कि 'अटल जी की सरकार में एक लाख 95 हज़ार एचबी-1 वीज़ा जारी होता था. यूपीए की सरकार में यह संख्या 65 हज़ार हो गई. अभी इस वीज़ा में कोई कमी नहीं आई है. हमारी विदेश नीति की ही सफलता है कि रूस भी हमारे साथ है और अमरीका भी. आज दोनों हमारे साथ हैं.'

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मोदी की इसराइल यात्रा

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की इसराइल यात्रा पर सुषमा ने कहा, '' इसराइल हमारा मित्र ज़रूर है ,लेकिन फ़लस्तीनियों की चिंता को हम कभी ख़ारिज नहीं करेंगे. पहली बार हमने जेसीएम बनाया. मैं पहले फ़लस्तीन गई तब इसराइल गई थी. तब राष्ट्रपति प्रणव मुखर्जी ने भी ऐसा ही किया. फ़लस्तीन के राष्ट्रपति अब्बास भारत आए थे तब मोदी इसराइल गए. अब्बास ने कहा कि इसराइल के साथ आपका जो दोस्ताना संबंध है उसका इस्तेमाल कीजिए और मसला सुलझाइए.''

सुषमा ने कहा, ''मोदी सरकार के बाद चिंता जताई गई कि अरब देशों से संबंध ख़राब हो जाएगा क्योंकि ज़्यादातर मुस्लिम देश हैं. लेकिन सच यह है कि हमारे संबंध और अच्छे हुए. जब सऊदी अरब हमारे पीएम गए तो वहां का सर्वोच्च नागरिक सम्मान मिला.''

सुषमा ने कहा, ''हमने यमन से अपने नागरिकों को सऊदी अरब की मदद से निकाला. जिस विदेश नीति की इतनी ज्यादा प्रशंसा की जानी चाहिए उस पर विपक्ष उंगली उठा रहा है.''

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राजीव शुक्ला पर भड़कीं सुषमा

चीन पर विपक्ष के आरोपों के जवाब में सुषमा ने कहा, `'चीन के साथ हमारे कई मतभेद हैं, लेकिन विवाद में नहीं बदलने देंगे. राजीव शुक्ला पर हैरानी है. सीपीईसी (चाइना पाकिस्तान इकॉनमिक कॉरीडोर) कहां से जा रहा है राजीव शुक्ला को ख़बर है. वो कह रहे हैं कि ओबीओर में क्यों नहीं गए. क्या हम इस बात को मान लें कि पीओके हमारा नहीं है? कांग्रेस प्रमुख विपक्षी पार्टी है और उसका नेता कह रहा है कि सीपीईसी में क्यों नहीं गए? क्या आपकी पार्टी में इतना ज़्यादा लोकतंत्र है कि ओबीओआर पर सबकी अलग-अलग राय होगी? कैसे बोलने दिया राजीव शुक्ला को. क्या कांग्रेस पार्टी को बात समझ में नहीं आती?''

ख़ुद पर बोलीं सुषमा

विदेश मंत्रालय के कामकाज पर सुषमा ने कहा, ''हमारे कुछ साथियों को झगड़ा लगाने की आदत हैं. विपक्ष के लोग कहते हैं कि मेरा उपयोग नहीं हो रहा. मैं मनमोहन सिंह से पूछना चाहती हूं कि वो विदेशी दौरे पर कितनी बार सलमान खुर्शीद को ले गए, एसएम कृष्णा को ले गए. जब मैं यात्रा करती हूं तो केवल विदेश मंत्री से ही मिलकर नहीं आ जाती. कहा जाता है कि पीएम सब कुछ चला रहे हैं. मेरे से पूर्व के विदेश मंत्री पता नहीं कैसा भाग्य लेकर आए थे. मैं सौभाग्यशाली हूं कि जहां ऐसे प्रधानमंत्री का नेतृत्व मिला है.''

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