नज़रिया: अहमद पटेल को हराने के लिए बीजेपी इतनी मेहनत क्यों कर रही है?

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चार बार राज्यसभा में पहुंचे कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी के राजनीतिक सलाहकार अहमद पटेल के लिए अब तक यह सफ़र बेहद आसान था लेकिन पांचवीं बार उनकी राह कठिन है.

कांग्रेस के मज़बूत नेताओं में से एक अहमद पटेल को चुनाव में जीत दिलाने के लिए पार्टी ने विधायकों को बंगलुरु ले जाकर एक रिसॉर्ट में ठहरा दिया ताकि 8 अगस्त को होने वाली वोटिंग में मज़बूत रहे.

गुजरात विधानसभा से तीन राज्यसभा सांसदों को चुना जाना है, जिसके लिए चार उम्मीदवार मैदान में हैं.

बीजेपी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह ने गुजरात विधानसभा से निकलकर राज्यसभा जाने का मन बनाया है. उनके अलावा स्मृति ईरानी भी गुजरात से राज्यसभा जाने की तैयारी में हैं.

साधारण परिस्थिति में अहमद पटेल का राज्यसभा में जाना आसान था लेकिन गुजरात में कांग्रेस के नेता विपक्ष शंकरसिंह वाघेला ने अपना पद छोड़ दिया और राज्यसभा चुनाव के बाद पार्टी छोड़ने की भी घोषणा कर दी.

अहमद पटेल इस बार अपनी पार्टी की अंदरूनी कलह का शिकार बने हैं. उन्होंने और उनकी पार्टी ने दोनों फ्रंट पर वोटों का गणित सही से लगाया नहीं.

पहला, शंकरसिंह वाघेला के पिछले रिकॉर्ड नज़रअंदाज करते हुए उन्होंने कांग्रेस के अंदर उनके प्रभाव को हल्के में लिया.

उन्होंने 1995-96 में गुजरात में पहली बार सत्ता में आई बीजेपी सरकार के दो मुख्यमंत्रियों केशुभाई पटेल और सुरेश मेहता को सत्ता से बाहर कर दिया था.

दूसरा, साजिशों और हल्की राजनीति की वजह से कांग्रेस प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और उनके ख़ास अमित शाह के बिछाए जाल में फंस गई.

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बीजेपी का दांव

अब सवाल ये आता है कि सोनिया गांधी के राजनीतिक सलाहकार को हराने के लिए बीजेपी के पास क्या बड़ी चाल है?

राष्ट्रीय स्तर पर राजनीति में अप्रत्याशित सफलता बीजेपी के काम आने वाली है और कांग्रेस के लिए यह अपमानजनक होगा.

बीजेपी की मज़बूती का सबूत इसी से मिल जाता है कि कांग्रेस हॉर्स ट्रेडिंग के डर से अपने विधायकों को राज्य से बाहर ले जाने को मजबूर हो गई.

इसके अलावा पार्टी के छह विधायकों ने अहमद पटेल के नामांकन भरने के तुरंत बाद इस्तीफ़ा दे दिया. इनमें से तीन बीजेपी में शामिल हो गए.

कांग्रेस से आए बलवंतसिंह राजपूत को बीजेपी की ओर से तीसरे उम्मीदवार हैं, जिनकी वजह से अहमद पटेल की दावेदारी ख़तरे में है.

यहां तक कि कांग्रेस ने अपने विधायकों को बंगलुरु ले जाकर रिसॉर्ट में सुरक्षित कर लिया लेकिन वहां भी मोदी सरकार ने उनका पीछा नहीं छोड़ा.

सरकार ने कर्नाटक सरकार के उस मंत्री के यहां इनकम टैक्स विभाग की छापेमारी करवाई जो गुजरात के विधायकों की देखभाल कर रहे थे. इससे इशारा साफ़ था कि मोदी सरकार नरम पड़ने वाली नहीं है.

मोदी और शाह की जोड़ी गुजरात की राजनीतिक स्थिति से अच्छी तरह वाकिफ़ है. उन्हें यह भी पता है कि कांग्रेस के अंदर कौन से गुट हैं जो आपस में लड़ रहे हैं.

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कांग्रेस की मुश्किल

कांग्रेस के अर्जुन मोढवाडिया, शक्तिसिंह गोहिल, सिद्धार्थ पटेल जैसे बड़े नाम नरेंद्र मोदी के 13 साल के शासन में अपनी सीट भी नहीं बचा पाए.

यहां तक कि पूर्व मुख्यमंत्री माधवसिंह सोलंकी के बेटे और वर्तमान प्रदेश कांग्रेस प्रमुख भारतसिंह सोलंकी आधी भी सीटें नहीं जुटा पाए. उनके पिता के नाम 1985 के चुनाव में 182 में से 149 सीटें जीतने का रिकॉर्ड है.

नरेंद्र मोदी भी यह रिकॉर्ड नहीं तोड़ पाए और अब 2017 के चुनाव में उन्होंने 150 सीटों का लक्ष्य रखा है.

बीजेपी यह जानती थी कि गुजरात कांग्रेस के बड़े नेता वाघेला से अलग मत रखते हैं. आरएसएस से आने वाले वाघेला के बारे में बीजेपी यह भी जानती थी कि उन्हें उनकी आंतरिक स्थिति अच्छे से पता हैं और आने वाले चुनाव में वह बाधा बन सकते हैं.

मोदी और वाघेला एक-दूसरे पर भरोसा नहीं करते. एक ओर जहां मोदी ने गुजरात की सत्ता के ज़रिए अपने लिए देश की सत्ता का रास्ता बनाया, वहीं, अहमद पटेल पर आरोप लगते रहे कि उन्होंने अपनी ही पार्टी के मजबूत नेताओं को आगे नहीं बढ़ने दिया.

कांग्रेस बीते 33 साल से गुजरात की सत्ता से बाहर है. आख़िरी बार 1985 में कांग्रेस की सरकार बनी थी.

कांग्रेस ने पिछले दरवाज़े से सत्ता में आने की कोशिश 1990 में चिमनभाई पटेल की अगुवाई वाली जनता दल सरकार और 1996 में वाघेला की अगुवाई में बनी सरकार के दौरान की, लेकिन कामयाब नहीं रही.

कहा जाता है कि अहमद पटेल के कहने पर पार्टी आलाकमान ने लगातार वाघेला को नज़रअंदाज़ किया. पटेल के कहने पर पार्टी ने दिल्ली में मधुसूदन मिस्त्री को बड़ी ज़िम्मेदारी दे दी, जो कि वाघेला के करीबी माने जाते थे.

वाघेला अपने लिए पार्टी में अमरिंदर सिंह जैसी भूमिका चाहते थे, लेकिन लगातार नज़रअंदाज़ किए जाने के बाद वाघेला ने बाहर निकलना बेहतर समझा.

गुजरात कांग्रेस नेतृत्व ने इस बात का भरोसा जताया कि वाघेला के जाने से पार्टी को ज़्यादा नुकसान नहीं होगा. अब स्थिति यह है कि अहमद पटेल को चुनाव जीतने के लिए 46 वोटों की ज़रूरत है.

कांग्रेस के पास अब 57 की जगह 51 वोट ही हैं. इसके अलावा पार्टी के पास एनसीपी के दो और एक जेडीयू विधायक का भी समर्थन है.

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वाघेला के हाथ चाभी

दिलचस्प बात ये है कि 51 विधायकों में शंकरसिंह वाघेला और उनके बेटे महेंद्र सिंह के अलावा वो विधायक भी शामिल हैं जो वाघेला के ख़ास हैं.

हालांकि कांग्रेस ने यह भरोसा जताया है कि चुनाव मे अहमद पटेल ही जीतेंगे, लेकिन विडम्बना यह है कि सब कुछ वाघेला के हाथों में है. अपने एक बयान में वाघेला ने कहा था, ''बापू कभी रिटायर नहीं होते.''

राष्ट्रीय स्तर पर अहमद पटेल के चुनाव परिणाम के स्थिति के असर के साथ, यह चुनाव नवंबर-दिसंबर 2017 में होने वाले राज्य के विधानसभा चुनावों के लिए भी ट्रेंड सेट करेगा.

राज्य का चुनावी माहौल कांग्रेस के हित में नहीं होता अगर वहां पाटीदारों का प्रदर्शन, दलितों का ग़ुस्सा और ओबीसी वोटर में बीजेपी के ख़िलाफ गुस्सा नहीं दिख रहा होता.

एंटी-इनकंबेसी भी कांग्रेस के लिए फ़ायदेमंद हो सकती है और सत्ताधारी बीजेपी के ख़िलाफ माहौल बना रही है.

वाघेला का जाना और पटेल की हार राज्य में विपक्षी पार्टी के लिए चुनावी रण में बड़ी चुनौती बन सकते हैं. सवाल उठता है कि अहमद पटेल को हराने के लिए बीजेपी इतनी मेहनत क्यों कर रही है?

क्योंकि पार्टी यहां मोदी के जाने के बाद ख़राब हुए हालात को सुधारना चाहती है. मोदी जानते हैं कि गुजरात चुनावों में हार उनके 2019 में केंद्र की सत्ता में वापसी के प्लान में बाधा बन सकती है.

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