तो चीन पर इस कदर निर्भर है भारत..

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डोकलाम सरहद पर भारत और चीन के बीच जारी गतिरोध का अंत कैसे और कब होगा यह किसी को पता नहीं है. गुरुवार को विदेश मंत्री सुषमा स्वराज ने संसद में मोदी सरकार की विदेश नीति पर विपक्ष के सवालों का बड़े तल्ख अंदाज में जवाब दिया.

सुषमा स्वराज ने चीन के साथ तनाव पर कहा कि भारत का डोकलाम पर रुख बिल्कुल स्पष्ट है. विपक्षी नेता रामगोपाल यादव ने चीन से तनाव के बीच युद्ध की तैयारी और सामरिक शक्ति बढ़ाने की सलाह दी थी.

भारत के विकास में चीन की भूमिका

सुषमा स्वराज ने इस सलाह को ख़ारिज कर दिया था और कहा था कि युग बदल गया है. सुषमा ने कहा था कि किसी देश की शक्ति की पहचान सामरिक नहीं बल्कि आर्थिक होती है. भारतीय विदेश मंत्री ने यहां तक कहा कि भारत की आर्थिक प्रगति में चीन की भी भूमिका है और समाधान युद्ध से नहीं बातचीत से होगा.

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सुषमा स्वराज का कहना है कि संबंधों का विस्तार व्यापार के ज़रिए हो रहा है. चीन और भारत के बीच अरबों डॉलर का व्यापार है. सुषमा ने गुरुवार को संसद में यही इशारा किया और कहा कि भारत की प्रगति में चीन की भी भूमिका है.

विदेश मंत्री सुषमा स्वराज ने कहा, ''2014 में चीन ने भारत में 116 बिलियन डॉलर का निवेश किया जो आज की तारीख़ में 160 बिलियन डॉलर हो गया है. चीन ने इतना ज़्यादा भारत में निवेश किया है. हमारी आर्थिक क्षमता बढ़ाने में चीन भी मदद कर रहा है. मामला केवल डोकलाम का नहीं है.''

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2008 में चीन भारत का सबसे बड़ा बिज़नेस पार्टनर बन गया था. जिस देश में चीन इतना ज़्यादा निवेश कर रहा है क्या उस देश से युद्ध चाहेगा?

चीन के लिए भार बड़ा बाज़ार

जेएनयू में सेंटर फोर चाइनीज़ स्टडीज सेंटर के प्रोफ़ेसर बीआर दीपक ने बीबीसी संवाददाता रजनीश कुमार से कहा, ''ज़ाहिर है भारत चीन के लिए उभरता हुआ बाज़ार है. इस बाज़ार की चीन उपेक्षा नहीं कर सकता है. भारत में चीनी टेलिकॉम कंपनी 1999 से ही हैं और वे काफ़ी पैसा कमा रही हैं. इनसे भारत को भी फ़ायदा हुआ है.''

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उन्होंने कहा, ''भारत में चीनी मोबाइल का मार्केट भी बहुत बड़ा है. मोबाइल मार्केट में चीन का 55 से 56 फ़ीसदी का कब्ज़ा है. अब सैमसंग पीछे छूट गई है. चीन दिल्ली मेट्रो में भी लगा हुआ है. दिल्ली मेट्रो में एसयूजीसी (शंघाई अर्बन ग्रुप कॉर्पोरेशन) नाम की कंपनी काम कर रही है.''

कई क्षेत्रों में चीन पर निर्भर है भारत

दीपक ने कहा, ''भारतीय सोलर मार्केट चीनी उत्पाद पर निर्भर है. इसका दो बिलियन डॉलर का व्यापार है. भारत का थर्मल पावर भी चीनियों पर ही निर्भर हैं. पावर सेक्टर के 70 से 80 फीसदी उत्पाद चीन से आते हैं. मेडिसिन के रॉ मटीरियल का आयात भी भारत चीन से ही करता है. इस मामले में भी भारत पूरी तरह से चीन पर निर्भर है. पिछले चार दशक में पश्चिमी तकनीक को चीन ने कॉपी किया और सस्ते में बेचता है. चीन ने 20 हज़ार किलोमीटर की हाई स्पीड लाइन बनाई है जो अब तक का विश्व रिकॉर्ड है.''

प्रोफ़ेसर दीपक का मानना है कि चीन के साथ व्यापार भारत के हक़ में नहीं है. उन्होंने कहा कि 'बैलेंस ऑफ ट्रेड' भारत के पक्ष में नहीं है.

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उन्होंने कहा, ''चीन से भारत सालाना 53 बिलियन डॉलर का आयात करता हैं जबकि चीन महज 16 बिलियन डॉलर का ही भारत से आयात करता है. चीन भारत से मुख्य रूप से कृषि उत्पाद और रॉ मटीरियल आयात करता है.''

चीन के मुकाबले भारत कहीं नहीं

चीन की अर्थव्यवस्था का आकार 11.5 ट्रिलियन डॉलर का है जबकि भारत का चीन के मुकाबले पांच गुना छोटा है. भारत की अर्थव्यवस्था 2.3 ट्रिलियन डॉलर की है. प्रोफ़ेसर दीपक ने कहा, ''चीन और जापान के बीच 300 बिलियन डॉलर का व्यापार है. दोनों में इस कदर दुश्मनी है फिर भी युद्ध नहीं होता है. इसकी वजह व्यापार का आकार है. इस मामले में भारत कहीं नहीं ठहरता है.''

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प्रोफ़ेसर दीपक ने कहा, ''चीन का विश्व के आर्थिक विकास में 33 फ़ीसदी योगदान है. अमरीका के साथ चीन का सालाना व्यापार 429 बिलियन डॉलर का है. ऐसे में भारत से चीन का 70 बिलियन डॉलर का व्यापार कहीं ठहरता नहीं है. अगर 11.5 ट्रिलियन डॉलर से भारत का छोटा हिस्सा निकल भी जाए तो चीन को कई फ़र्क नहीं पड़ेगा.''

उन्होंने कहा, 'भारत का मुंबई के पास जो नवशेरा पोर्ट है उसकी क्षमता तीन मिलियन टन की है. वहीं शंघाई पोर्ट की 33 मिलयन टन कंटेनर की क्षमता है. दोनों की क्षमता में भारी फ़र्क है और इसी से पता चलता है कि हम चीन के सामने कहां हैं. चीन ने हिन्दी पढ़ने पर ज़ोर दिया है और हिन्दी के ज़रिए हमें समझ रहा है. चीन की 15 यूनिवर्सिटी में हिन्दी पढ़ाई जा रही है जबकि भारत की इक्के-दुक्के यूनिवर्सिटी में ही चीनी भाषा पढ़ाई जाती है.''

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