डाकिया योजना : आदिवासियों को नहीं मिल रहा राशन

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Image caption गंगू पहाड़िया अपने बेटे के साथ

'हम लोगों को 35 किलो चावल मिलना चाहिए था. तीसे (तीस) किलो मिलता है. ऊ भी (वो भी) दो महीना बीत जाता है, तब एक महीना का देता है. इसके बाद चीनी भी नहीं मिलता है. किरासन तेल तो कभी देता है, कभी नहीं देता है. पैदले (पैदल ही) जाते हैं मंडरो. वहां से ले आते हैं. अनाज घर पर नहीं पहुंचाता है कभी. हमीं लोगों को जाना पड़ता है राशन लेने.'

यह गंगू पहाड़िया की व्यथा है, जो उन्होंने बीबीसी हिंदी से बातचीत के दौरान बताई.

आधार कार्ड होने पर भी नहीं मिल रहा राशन

वे झारखंड के सुदूर साहिबगंज ज़िले के मंडरो प्रखंड के तारा पहाड़ नामक गांव में रहते हैं. ये उन पहाड़िया आदिवासियों का गांव है, जिनकी संख्या लगातार घट रही है. सरकार उन्हें आदिम जनजाति मानती है. इनके संरक्षण के लिए झारखंड में बड़ी धनराशि खर्च की जा रही है.

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Image caption गंगू पहाड़िया का घर

चावल घर भेजने की योजना

आदिम जनजातियों के लिए सरकार ने पीटीजी डाकिया योजना लागू की है. इसके तहत हर परिवार को उनके घर पर ही 35 किलो चावल हर महीने पहुंचाया जाना है.

मुख्यमंत्री रघुवर दास ने कुछ महीने पहले पड़ोसी पाकुड़ ज़िले के लिट्टीपाड़ा से इसकी शुरुआत की थी.

तब उन्होंने पहाड़िया परिवारों के बीच अपने हाथ से चावल के पैकेट बांटे थे. इसके बाद अलग-अलग ज़िलों मे मंत्रियों ने इस योजना की शुरुआत की. साहिबगंज ज़िले में कृषि मंत्री रणधीर सिंह ने इसकी शुरुआत की थी.

आर्मी राशन ने बदला आपका खाना

तारा पहाड़ गांव के 22 घरों में करीब 100 लोग रहते हैं. ये पहाड़िया आदिवासी हैं. इनमें से किसी को भी उनके घर पर चावल नहीं मिलता.

ग्रामीणों ने बताया कि उन्हें अपना राशन लेने पंचायत भवन तक जाना पड़ता है. तारा पहाड़ उस सिमड़ा पंचायत का एक गांव है, जहां पिछले महीने अर्थशास्त्री ज्यां द्रेज़ और उनकी टीम ने राशन वितरण को लेकर सर्वे किया था. इसमें राशन वितरण की कई गड़बड़ियां उजागर हुई थीं.

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योजना का लाभ नहीं

चांदनी पहाड़िया बुज़ुर्ग महिला हैं. वे अपने परिवार के सदस्यों का खाना मिट्टी के चूल्हे पर बनाती हैं.

गांव की दूसरी महिलाएं भी लकड़ी-मिट्टी के चूल्हे पर ही खाना बनाती हैं. उन्हें प्रधानमंत्री की महत्वाकांक्षी उज्ज्वला योजना के तहत गैस का चूल्हा नहीं मिला.

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चांदनी पहाड़िया ने बीबीसी से कहा, "हम तो मिट्टी के चूल्हे पर ही खाना बनाते रहे हैं. मैंने गैस का चूल्हा नहीं देखा. जंगल से लकड़ी काट कर लाते हैं और उसी से खाना बनता है. इसमें बहुत धुंआ निकलता है लेकिन मेरी आदत हो गई है. धुआं और खांसी की."

झरने का पानी पीते हैं

गांव के लोग पास के झरने का पानी पीते हैं. यहां कोई हैंडपंप नहीं है. गांव मे लगा बोर्ड दावा करता है कि यह ओडीएफ गांव है. मतलब यहां कोई भी आदमी खुले में शौच नहीं करता. बिजन पहाड़िया ने बताया कि पीने और शौच दोनों के लिए पानी लाने झरने तक जाना होता है.

गंगू पहाड़िया बताते हैं कि उनके गांव में आज तक कोई भी अफसर यह पता करने नहीं आया कि उन्हें राशन कैसे मिलता है. या फिर गांव के लोग किन समस्याओं से जूझ रहे हैं.

दोपहर तीन बजे जब मैं मंडरो प्रखंड कार्यालय पहुंचता हूं तो वहां का स्टाफ बताता है कि बीडीओ साहब साहिबगंज निकल गए. वे फोन भी नहीं उठाते. लिहाज़ा उनका पक्ष नहीं मिल पाया.

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Image caption मंडरो जाने वाला रास्ता

क्या कहती है सरकार?

इधर, झारखंड सरकार के खाद्य, सार्वजनिक वितरण और उपभोक्ता मामले के सचिव विनय चौबे ने दावा किया है कि झारखंड में आदिम जनजातियों के घरों पर चावल के पैकेट पहुंचाए जा रहे हैं. इसके लिए सखी मंडल की महिलाओं को लगाया गया है.

इस बीच झारखंड सरकार तारा पहाड़ मे जीवाश्म पार्क बनाने जा रही है क्योंकि इस गांव समेत साबिहगंज और पाकुड़ ज़िले के कई गांवों में डायनासोर युग के जीवाश्म बहुतायत में मिले हैं.

ऐसे मे यह जानना महत्वपूर्ण है कि इन 'जीवाश्मों' के बीच रह रहे 'जीवों' के गुजर-बसर के लिए सरकार कितनी प्रतिबद्ध है.

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