आधुनिक संगीत के पहले नायक: अनिल विश्वास

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अनिल विश्वास का संगीत सुन कर लोग कुर्सियों पर खड़े हो जाते थे

अनिल विश्वास हिन्दी फ़िल्म संगीत के पुरोधा के रूप में जाने जाते हैं. बोलती फ़िल्मों का दौर जब से आरम्भ हुआ और उसमें गीत-संगीत के आगमन का रोचक इतिहास बस बनना शुरू ही हुआ था, उस समय अनिल विश्वास जैसे संगीतकार को बेहद प्रमुखता से संगीत के आधुनिक प्रणेता के रूप में आदर मिला.

शुरुआती दिनों में, जो कि बीसवीं शताब्दी का चौथा दशक था, उस समय संगीत के आरंभिक संगीतकारों में जिन लोगों को जाना जाता है, उनमें प्रमुख रूप से हम फ़िरोज़ शाह मिस्त्री, मास्टर अली बक्श, जद्दनबाई, लल्लू भाई नायक, प्राण सुख नायक, बृजलाल वर्मा, वज़ीर खां, सुन्दर दास भाटिया, गोविन्द राव टेम्बे, केशव राव भोले, झंडे खां, बन्ने खां, राम गोपाल पांडे, सुरेश बाबू माने के साथ अनिल विश्वास को याद कर सकते हैं.

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अनगिनत आरंभिक संगीतकारों की जमात में अनिल विश्वास की तरह जिन संगीतकारों का नाम उल्लेखनीय रूप से चालीस के दशक में उभरा, उनमें हम आर. सी. बोराल, पंकज मलिक, तिमिर बरन, के. सी. डे, रफ़ीक गजनवी, एच. सी. बाली, शान्ति कुमार देसाई, मास्टर कृष्ण राव, अशोक घोष, सरस्वती देवी, ज्ञान दत्त एवं रामचन्द्र पाल के नाम ले सकते हैं.

हर तरह के संगीत का ज्ञान था

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इस मायने में अनिल विश्वास को हमेशा याद किया जाएगा कि वे ऐसे विरले संगीतकार रहे हैं, जिन्होंने ख्याल, ठुमरी, दादरा, वैष्णव संकीर्तन, रवीन्द्र-संगीत, नज़रुल गीति के साथ-साथ लोक-संगीत का भी ज्ञान अर्जित किया था.

वे ऐसे शुरुआती संगीतकारों में भी बड़े सम्मान से याद किये जाते हैं, जिन लोगों ने पहली बार ऑर्केस्ट्रेशन पर आधारित गीतों के साथ-साथ कोरस गीतों का भी संयोजन शुरू किया.

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कव्वाली और मुजरे के उस्ताद रोशन

अपनी वामपंथी राजनीति का रचनात्मक रूप उन्होंने समूह और क्रान्तिकारी गीतों के माध्यम से भी व्यक्त किया है, जो आज उनकी एक विशिष्ट पहचान के रूप में कायम है.

इतना ही नहीं, वे अपनी धुनों में जिन पाश्चात्य वाद्यों के सहमेल से एक बिलकुल नए किस्म का आधुनिक संगीत रच रहे थे, उनमें हवाईयन गिटार, ट्रम्पेट, मैंडोलिन, चेलो और ओबो की भूमिकाएं शामिल हैं.

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अनिल विश्वास के कॅरियर में 'क़िस्मत' मील का पत्थर मानी जाती है. इस फ़िल्म की अपार सफलता तक पहुंचने से पूर्व अनिल विश्वास ने आरम्भिक सफलता का स्वाद जिन फ़िल्मों के माध्यम से चखा था, उन्हें व्यापक तौर पर वैसी स्वीकृति नहीं मिल पायी थी, जिस तरह वह 'क़िस्मत' के सभी गीतों को हासिल हुई.

इस फ़िल्म से पूर्व उनके द्वारा संगीतबद्ध कुछ महत्वपूर्ण गाने ही आज याद किये जाते हैं, जो कि उन फ़िल्मों की थोड़ी बहुत लोकप्रियता का भी आधार बन सके.

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इनमें प्रमुख रूप से 'भारत की बेटी' (1935) का 'तेरे पूजन को भगवान बना मन मन्दिर आलीशान', 'मनमोहन' (1936) का 'तुम्हीं ने मुझको प्रेम सिखाया', 'ग्रामोफोन सिंगर' (1938) का 'मैं तेरे गले की माला', 'हमारी बात' (1943) का 'बादल सा निकल चला यह दल मतवाला रे', 'मैं उनकी बन जाऊँ रे', 'बसंत' (1942) का 'कांटा लागो रे सजनवा मोसे राह चली ना जाये' एवं 'नैया' (1947) का 'सावन भादों नयन हमारे बरस रहे दिन रात' जैसे गीत सुनने में उतने ही ताजे और कर्णप्रिय लगते हैं.

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यह देखना भी इतिहास की दृष्टि से ज़रूरी है कि पारुल घोष ने अधिकांश गाने अनिल विश्वास के संगीत निर्देशन में ही गाये हैं. चूंकि वे संगीतकार की अपनी बहन भी थीं इस कारण भी संगीत को लेकर दोनों के बीच मैत्री और आपसी रिश्तों की ऐसी खनकदार उपस्थिति सुलभ रही होगी, जिसके चलते पारुल घोष और अनिल विश्वास की जुगलबन्दी ने कुछ अत्यंत अमर गीतों की रचना की.

नज़रूल गीति एवं रवीन्द्र संगीत से प्रभावित थे

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हिंदी फिल्मों के अजातशत्रु संगीतकार रवि

'क़िस्मत' के अलावा पारुल घोष ने 'हमारी बात' ,'ज्वार -भाटा ','पहली नज़र','मिलन 'और 'बसंत' में अनेक यादगार गीत गाये. 'पपीहा रे' मूलतः बंगाल की कीर्तन शैली पर आधारित ऐसा गाना था, जिसमें लोक-संगीत की छाया भी दिखाई पड़ती है.

हमें 'पपीहा रे' जैसे गीतों को विश्लेषित करते समय इस बात का भी ध्यान रखना चाहिए कि अनिल विश्वास का संगीतकार बंगाल के लोक संगीत से प्रभावित होने के साथ-साथ नज़रूल गीति एवं रवीन्द्र संगीत के भी अत्यंत निकट था.

स्वयं अनिल विश्वास ने यह स्वीकारा है कि 'बसंत' का एक गीत 'हुआ क्या कुसूर जो हमसे हो दूर' को नज़रूल गीति पर आधारित करके उन्होंने रचा था.

'पपीहा रे 'की ही तरह एक दूसरी ज़मीन पर अमीरबाई कर्नाटकी का गाया बेहद सुंदर भजन 'अब तेरे सिवा कौन मेरा कृष्ण कन्हैया' भी 'किस्मत' फ़िल्म का एक यादगार गीत है.

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यह कम लोग जानते होगें कि 'क़िस्मत' से पूर्व अमीरबाई कर्नाटकी ने चन्द फिल्मों में भी अभिनय किया था और उन फ़िल्मों में अपने गाने स्वयं गाये थे. वे उन दिनों की चर्चित अभिनेत्री गौहर कर्नाटकी की बहन थीं.

यह वाकया भी अनिल विश्वास के खाते में दर्ज़ हो पाया है कि सबसे पहले अमीरबाई की आवाज़ की विशिष्टता को उन्होंने पहचान कर 'क़िस्मत' के सभी प्रमुख छह गानों के लिए अनुबन्धित किया.

इस फ़िल्म से फ़िर उनकी किस्मत का सितारा ऐसा बुलन्द हुआ कि वे चालीस के दशक की सबसे सम्भावनाशील और महत्वपूर्ण स्त्री आवाज़ बनकर उभर सकीं.

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एक ऐसा कलाकार, जिसकी स्तरीयता को सितार के क्षेत्र में विश्व स्तरीय प्रशंसा प्राप्त है.

'अब तेरे सिवा कौन मेरा कृष्ण कन्हैया' में भी अनिल विश्वास बंगाल के उसी लोक-संगीत के आश्रय में डूबते हैं, जिसके गहरे तल में बाऊल लोगों के कीर्तन का बेजोड़ संसार बसा हुआ है.

इस भजन को सुनते हुए अनिल विश्वास द्वारा संगीतबद्ध कुछ और अमर गीत याद आते हैं, जो उनकी शैली के बड़े रेंज को व्यक्त करने में सक्षम हैं. उदाहरण के तौर पर 'मुहब्बत तर्क की मैंने' (दोराहा), 'बेईमान तोरे नैनवा' (तराना), 'राही मतवाले' (वारिस), 'आ मुहब्बत की बस्ती बसायेंगे हम' (फ़रेब), 'रसिया रे मन बसिया रे' (परदेसी), 'कच्ची है उमरिया' (चार दिल चार राहें) एवं 'जा मैं तोसे नाहीं बोलूं' (सौतेला भाई) को याद किया जा सकता है.

'फ़िल्मी गीत के ज़रिए ब्रिटिश सरकार को ललकारा'

कवि प्रदीप के द्वारा लिखा 'दूर हटो ऐ दुनिया वालों, हिन्दुस्तान हमारा है' को शायद ही कोई संगीतप्रेमी और सिने अध्येता आज भी भुला पाया होगा. गीत पूरी तरह ब्रिटिश हुकूमत के खिलाफ बग़ावती तेवर में रची गयी अत्यंत ओजपूर्ण रचना है.

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इसकी शब्दावली को ध्यानपूर्वक सुनकर महसूस किया जा सकता है कि 1943 में किस तरह भारतवासियों ने अपने को रोमांचित और कर्तव्यबोध से भरा हुआ पाया होगा, जब अमीरबाई कर्नाटकी और अन्य सामूहिक स्वरों के साथ यह गीत चित्रपट पर अभिनेत्री मुमताज शान्ति के माध्यम से व्यक्त हुआ.

'पाकीज़ा' का अमर संगीत रचने वाला फ़नकार

वसंत देसाई: जिनकी 'अंखियां भूल गईं सोना'

इस गीत की एक दिलचस्प बात यह भी है कि बीच-बीच में आने वाले 'दूर हटो, दूर हटो, दूर हटो ऐ दुनिया वालों, हिन्दुस्तान हमारा है' में नारे की शक्ल में आने वाली अनेकों पुरुष आवाज़ें स्वयं संगीतकार अनिल विश्वास, गीतकार कवि प्रदीप और पार्श्व गायक अरुण कुमार की थीं, जिसका असर यह हुआ कि सिनेमाघरों में यह गाना शुरू होते ही दर्शक उत्तेजित हो जाते और कुर्सियों पर खड़े होकर नाचने लगते थे.

ब्रिटिश शासन को ललकारने वाला यह सभवतः पहला गाना था, जो किसी फ़िल्म के माध्यम से पहली दफा व्यक्त हो रहा था.

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पार्श्व गायक मुकेश को उनके कॅरियर का पहला (दिल जलता है तो जलने दे : पहली नज़र) गीत देने की बात हो या लता मंगेशकर के आरम्भिक दिनों में 'गजरे', 'लाडली', 'जीत', 'तराना', 'मान', 'आराम' और 'मेहमान' जैसी फ़िल्मों के माध्यम से बेहद स्तरीय अर्थों में स्थापित करने का काम..... अमीरबाई कर्नाटकी, पारुल घोष, तलत महमूद, मीना कपूर और राजकुमारी जैसे दिग्गज फ़नकारों को उनके सर्वश्रेष्ठ गीत सुलभ कराने का मामला.... अनिल विश्वास हर जगह अव्वल रहे और अपनी गरिमामयी सांगीतिक उपस्थिति से फ़िल्म संगीत को लोक और शास्त्रीय रंग में रंगकर संवारते रहे.

सलिल चौधरी : जन सरोकारों भरा संगीत रचने वाला फ़नकार

हिन्दी फ़िल्म संगीत अपने इस पुरोधा संगीतकार के लिए हमेशा ऋणी रहेगा और कोरस व ऑर्केस्ट्रा संगीत के प्रभावों के लिए हमेशा याद करेगा.

(ये लेखक के निजी विचार हैं. यतीन्द्र मिश्र लता मंगेशकर पर 'लता: सुरगाथा' नाम से किताब लिख चुके हैं.)

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