नज़रिया: केरल में भी कुछ कर बैठेंगे अमित शाह?

इमेज कॉपीरइट Getty Images
Image caption बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह

भारत का दक्षिणी राज्य केरल बीते कुछ वर्षों में वैचारिक लड़ाई के हिंसक संघर्ष का गवाह रहा है.

बीते हफ़्ते राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के कार्यकर्ता राजेश एडावाकोड की हत्या के बाद से वहां सियासत गर्म हो गई है.

संघ ने इस हत्या के लिए सीपीएम कार्यकर्ताओं को ज़िम्मेदार ठहराया है. मुख्यमंत्री पिनरई विजयन ने रविवार को ऑल पार्टी पीस मीट बुलाई है.

वहीं रिपोर्टों के मुताबिक, केंद्रीय वित्त मंत्री अरुण जेटली भी रविवार को राजेश एडावाकोड के परिवार से मिलने तिरुवनंतपुरम जा रहे हैं.

केरल में जारी संघर्ष को लेकर बीबीसी संवाददाता हरिता काण्डपाल ने वरिष्ठ पत्रकार राधिका रामाशेषन से बात की और पूछा कि केरल का वैचारिक संघर्ष किस मोड़ पर है. पढ़िए राधिका रामाशेषन की राय:

पुराना है संघर्षों का इतिहास

केरल में यह संघर्ष आजकल की बात नहीं हैं, वह बरसों से है. जब से वाम दल वहां मज़बूत हुए हैं और जब से वहां संघ की मौजूदगी है. उत्तरी केरल के कर्नाटक से सटे इलाक़े, मसलन कन्नूर, कोझिकोड, कासरगोड में संघ का ठीक-ठाक असर रहा है.

लेकिन यह संघर्ष अब अपने चरम बिंदु पर आ गया है क्योंकि केंद्र में बीजेपी की सरकार है और वह केरल में अपना जनाधार मज़बूत करना चाह रही है. उत्तरी केरल में संघ की मज़बूती का बीजेपी को कोई फ़ायदा नहीं मिल सका.

अब जाकर उन्हें एक विधायक मिला. ओ राजगोपालाचारी काफ़ी पुराने नेता हैं और चुनाव लड़ते लड़ते उन्होंने ज़िंदगी काट दी है और अब विधायक बने हैं. लेकिन बीजेपी कार्यकर्ताओं का हौसला इससे बढ़ा है और संघ के काम का बीजेपी फ़ायदा उठाना चाह रही है.

पढ़ें: केरल में संघ और वाम समर्थकों में हिंसक टकराव क्यों

अमित शाह ख़ुद ले रहे दिलचस्पी

इमेज कॉपीरइट Getty Images

जहां तक पार्टियों की शांति बैठकों का सवाल है, ऐसी बैठकें अक्सर केरल में होती रहती हैं, लेकिन उनका ख़ास असर नहीं होता. हफ़्ते भर बाद फिर संघर्ष शुरू हो जाते हैं. अब तो संघर्ष उत्तरी केरल से बाहर आकर तिरुवनंतपुरम तक होने लगे हैं. मतलब मामला गंभीर है और बहुत जल्दी सुलझने वाला नहीं है.

हालांकि इस बार एक फर्क़ ज़रूर है कि कुछ कर दिखाने के लिए मशहूर अमित शाह ख़ुद केरल में रुचि ले रहे हैं. ये सिर्फ़ राजनीतिक नहीं, विचारधारा की भी लड़ाई है.

केरल में कांग्रेस की अगुवाई वाला यूडीएफ यहां मुख्य विपक्ष है, लेकिन माकपा ने यहां कांग्रेस और मु्स्लिम लीग और यहां तक कि सीपीआई के कार्यकर्ताओं को भी निशाने पर लिया है.

पढ़ें: वामपंथ को मिटाने की कसम क्यों खा रहा है आरएसएस?

कमज़ोर हो रही कांग्रेस

इमेज कॉपीरइट Getty Images

ऐसे में इस लड़ाई में कांग्रेस कहीं न कहीं फंस गई है. उसकी सेक्युलर मजबूरियां है. राष्ट्रीय स्तर पर उसे बीजेपी से लड़ना है तो वाम दलों का भी सहारा चाहिए. बीजेपी के अपनी स्थिति मज़बूत करने तक वही मुख्य प्रतिद्वंद्वी है, लेकिन वह इतनी कमज़ोर हो गई है कि कहीं अगले विधानसभा चुनाव में कहीं बीजेपी और कांग्रेस बराबर न आ जाएं.

जहां तक वोट की बात है तो बीजेपी सिर्फ हिंदू वोटों में ही सेंध लगा सकती है. केरल में ओबीसी वोट हैं, ख़ास तौर से ताड़ी का काम करने वालों का समाज है जो सियासी तौर पर अहम माने जाते हैं. बीते चुनाव में बीजेपी ने एक छोटी पार्टी एसएनडीपी से समझौता किया, लेकिन फिर भी उन्हें ये वोट नहीं मिले. वो कांग्रेस और वाम दलों में बंट गए.

पढ़ें: अमित शाह जहाँ जाते हैं, क्यों गिरते हैं इस्तीफ़े?

लेकिन यहां नहीं चलता है हिंदू कार्ड

केरल में नायर वोट है, जो सवर्णों में गिने जाते हैं. ब्राह्मण वोट दक्षिण भारत में ख़ास राजनीतिक अहमियत नहीं रखता. दलितों की अच्छी ख़ासी तादाद है. तटीय इलाकों में मछुआरा समुदाय बहुत अहमियत रखता है और बीजेपी उन पर बहुत काम कर रही है.

बीजेपी की उम्मीद हिंदू वोटों पर ही टिकी है, लेकिन यहां जातीय समीकरण बनाना बिल्कुल आसान नहीं है. अभी तक हमने देखा है कि केरल में हिंदू कार्ड बिल्कुल नहीं चलता है. एक तरह से सीपीएम वहां हिंदू पार्टी मानी जाती है और चर्च और मुसलमानों के वोट कांग्रेस की अगुवाई वाले यूडीएफ़ को जाते हैं.

लिहाज़ा बीजेपी के लिए वहां गणित जमाना थोड़ा मुश्किल होगा. लेकिन अमित शाह जातीय समीकरण बनाने में इतने माहिर हैं कि शायद कुछ कर बैठें.

(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए यहां क्लिक करें. आप हमें फ़ेसबुक और ट्विटर पर भी फ़ॉलो कर सकते हैं.)

मिलते-जुलते मुद्दे