दहेज कानून पर नए निर्देश, आगे होगा क्या?

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सुप्रीम कोर्ट से तो ऐसी उम्मीद शायद ही रही हो. हालांकि इसके संकेत गाहे-ब-गाहे ज़रूर मिलते थे. मगर यह तो इंसानी हुकूक की हिफाज़त के नाम पर बेहाल-परेशान करोड़ों महिलाओं की नीयत पर शक़ की मुहर लगाने जैसा है. उनकी हिफाज़ती ढाल को ही खींच लेना है.

पिछले दिनों सुप्रीम कोर्ट ने पति और ससुरालियों के उत्पीड़न से महिलाओं को बचाने वाली भारतीय दंड संहिता की मशहूर धारा 498-ए पर अहम निर्देश जारी किए हैं.

इनमें सबसे अहम निर्देश है कि पुलिस ऐसी किसी भी शि‍कायत पर तुरंत गिरफ़्तारी नहीं करेगी. महिला की शि‍कायत सही है या नहीं, पहले इसकी पड़ताल होगी. पड़ताल तीन लोगों की एक अलग नई बनने वाली समिति करेगी. यह समिति पुलिस की नहीं होगी.

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इस नई समिति का नाम परिवार कल्याण समिति होगा. उसकी रिपोर्ट आने तक पुलिस को गिरफ़्तारी जैसी कार्रवाई नहीं करनी है.

वैसे इस समिति की रिपोर्ट को मानना शि‍कायत की जांच कर रहे अफ़सर या मजिस्ट्रेट पर लाजिमी नहीं होगा.

विदेश में रहने वालों का पासपोर्ट आमतौर पर ज़ब्त नहीं होगा. बाहर रहने वालों को पेशी पर आने से छूट दी जा सकती है. वीडियो कांफ्रेंस के ज़रिए पेशी की जा सकती है.

सुप्रीम कोर्ट के दो जजों जस्टिस आदर्श कुमार गोयल और जस्टिस उदय उमेश ललित ने ये निर्देश 27 जुलाई 2017 को एक मामले की सुनवाई करते हुए दिए.

इस निर्देश से किसे फ़ायदा होगा?

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बीस पन्नों के फ़ैसले की पहली लाइन ही इशारा करती है कि अदालत इस बात पर यकीन करती है कि '498ए' का दुरुपयोग हो रहा है.

महिलाएं इसका ग़लत इस्तेमाल कर रही हैं. झूठे केस दर्ज हो रहे हैं. हिंसा के ठोस सुबूत के बिना इस धारा का बद-इस्तेमाल बढ़ता जा रहा है.

महिलाओं की बढ़ा-चढ़ाकर कर पेश की गई शि‍कायतों में बेकसूर परिवारजनों को फंसा दिया जाता है.

नतीजतन वे परेशान होते हैं और कई बार उनकी गिरफ़्तारी भी हो जाती है. नतीजतन, इसलिए इस 'दुरुपयोग' को रोकने के लिए यह निर्देश दिए जा रहे हैं.

इसलिए यह तो तय है कि इससे पीड़ित महिलाओं को कतई फ़ायदा नहीं होने जा रहा है. बल्कि यह कहना तो शायद इस निर्देश के वज़न को कम करना है.

इसके नतीजे जब दिखेंगे, तब दिखेंगे. अभी तो यह साफ़ दिख रहा है कि यह क़दम महिलाओं को हिंसा से आज़ाद ज़िंदगी देने के वादे से पीछे हटने वाला है.

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फ़ैसले की कई परतें

इस फ़ैसले को कई पहलुओं से देखे जाने की ज़रूरत है. अगर इस पर आज आम बहस नहीं हुई तो आने वाले दिन में लम्बे जद्दोजहद के बाद हासिल की गई क़ानूनी हिफाज़त महिलाओं के लिए बेमानी हो सकती हैं.

यहां इसके सभी पहलुओं पर गौर करना मुमकिन नहीं है. मगर एक पहलू पर गौर करना ज़रूरी है.

वह है, क्या वाकई महिलाएं इस कानून का दुरुपयोग यानी बद-इस्तेमाल यानी पतियों/ससुरालियों को तंग करने के लिए झूठ बोल रही हैं?

आ़ख‍िर 498-ए है क्या?

हमारे देश में अस्‍सी के दशक में महिलाओं के ख़िलाफ़ हिंसा बड़ा मुद्दा बन गया था.

ऐसा पाया गया कि परिवार नाम के दायरे के अंदर महिलाओं के खिलाफ हिंसा की प्रमुख वजहों में से एक दहेज भी है. इसी वक्त मुल्‍क में दहेज हत्‍याओं के ख़िलाफ़ भी जबरदस्‍त आवाज़ उठी.

इसी पसमंजर में महिला आंदोलन के दबाव में भारतीय दंड संहिता (आईपीसी) में '498-ए' वजूद में आया.

धारा 498-ए यानी किसी महिला पर शौहर या शौहर के रिश्‍तेदारों द्वारा क्रूरता करने की हालत में बचाने वाला क़ानून. यह क़ानून क्रूरता की परिभाषा भी बताता है.

इसके मुताबिक़ क्रूरता का मतलब ये होगा...

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इस धारा को आम ज़बान में दहेज के लिए प्रताड़ना के नाम से भी जाना जाता है.

सुप्रीम कोर्ट से उम्मीद

कोई भी चाहे वह महिला का शौहर हो या अन्‍य ससुराली, अगर किसी महिला के साथ क्रूरता का सुलूक करते हैं तो वे तीन साल तक की सजा और जुर्माना के भागीदर होंगे.

अरसे बिना किसी क़ानूनी सहारे के हिंसा सहने वाली महिलाओं को इससे हिफाज़त मिलने की उम्मीद जगी.

लेकिन जैसे ही, परिवार नाम के पाक दायरे में हिंसा की शि‍कार महिलाओं ने इस धारा का इस्तेमाल शुरू किया, इस पर इस या उस बहाने से एतराज़ होने शुरू हो गए.

अगर कहा जाए कि 498ए भारतीय दण्ड संहिता की एक बदनाम कर दी गई धारा है, तो ग़लत न होगा.

मर्दाना निज़ाम ने इस धारा के ख़िलाफ़ इतना प्रचार किया है कि आम सोच यही है. हम इसे कहीं भी किसी से भी परख सकते हैं.

महिलाओं की हिंसा और उसके क़ानूनी बचाव पर बात शुरू हुई नहीं कि उसके बद-इस्तेमाल की चर्चा शुरू हो जाती है.

लेकिन न्यायापालिका और वह भी सुप्रीम कोर्ट से तो यह उम्मीद की जा सकती है कि वह बात करेगी तो समाज के हालात पर भी गौर करेगी.

यही नहीं, वह संविधान, महिलाओं के साथ भेदभाव और हिंसा दूर करने वाले अंतरराष्ट्रीय समझौतों और इंसानी हुकूक के दायरे में भी महिलाओं के मामले देखेगी.

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कितना दुरुपयोग?

हालांकि, दुरुपयोग का शोर इतना जबरदस्त है, विधायिका और अब न्यायपालिका भी नहीं बची है. मगर आंकड़े कुछ और बताते हैं.

गृह राज्‍य मंत्री हरिभाई परथीभाई ने पिछले साल मई में एक सवाल के जवाब में राज्‍यसभा को बताया था कि महिलाओं के प्रति क्रूरता या प्रताड़ना से जुड़े नौ फ़ीसदी मामले या तो ग़लत थे या इनमें तथ्य की भूल रह गयी थी या ये क़ानून के मुताबिक खरे नहीं थे. (ध्यान रहे, ये सभी पूरे 9 फ़ीसदी मामले ग़लत नहीं हैं.)

हालांकि, उन्‍होंने साफ़-साफ़ कहा कि इस बात के कोई सीधे प्रमाण नहीं मिलते या ऐसा कोई अध्‍ययन नहीं है कि 498ए का देश में सबसे ज़्यादा दुरुपयोग होता है.

498-ए के तहत 2013 में 1,18,866, 2012 में 1,06,527 और 2011 में 99,135 मामले दर्ज हुए.

गृह राज्‍य मंत्री के मुताबिक पुलिस की जांच पड़ताल के बाद 2011 में 10,193, 2012 में 10,235, 2013 में 10,864 मामले या ग़लत मिले या जिनमें तथ्‍यों की कुछ ग़लतियां थीं या क़ानून के पैमाने पर‍ फ़िट नहीं मिले.

सुप्रीम कोर्ट के फ़ैसले में भी राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (एनसीआरबी) के आंकड़े हैं.

एनसीआरबी के ताजा आंकड़े के मुताबिक 2015 में एक लाख 13 हजार 403 महिलाओं का 498ए के तहत मामला दर्ज हुआ है.

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पिछले कुछ सालों के 498-ए के आंकड़े हम नीचे देख सकते हैं.

झूठे केस का सच

हमारे मुल्‍क में पुलिस की जांच पड़ताल कैसे होती है, हम सब जानते हैं. अगर मामला महिलाओं से जुड़ा है तब जांच पड़ताल कैसे की जाती है, यह भी बताने की बात नहीं है.

इसके बाद भी सरकारी आंकड़ा मानता है कि पति या उसके रिश्‍तेदार की क्रूरता के 91 फ़ीसदी से ज़्यादा आरोप पुलिस की पड़ताल में सही मिले हैं.

एनसीआरबी का एक ताज़ा आंकडा गौर करने लायक है.

2015 की रिपोर्ट के मुताबिक पिछले सालों के बकाया मामलों को मिलाकर पुलिस ने 498-ए के तहत एक लाख 12 हजार 107 मामलों की पड़ताल की और 7458 मामलों में केस झूठ पाया.

यानी पुलिस ने 2015 में जितने मामले जांच किए उनमें से सिर्फ 6.65 झूठ पाए गए.

अगर इसमें उन 3314 मामलों को भी मिला लिया जाए जो झूठे नहीं थे, बल्क‍ि जांच के दौरान इनमें तथ्यों की भूल मिली या कानूनी आधार पर पूरी तरह फ़िट नहीं पाए गए तब भी एक लाख एक हजार 335 मामले यानी लगभग 90.4 फीसदी आरोप पुलिस की जांच-पड़ताल में सही पाए गए.

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तो क्या सुप्रीम कोर्ट को गौर नहीं करना चाहिए

आज भी 498-ए के तहत मामले दर्ज कराने में महिलाओं के पसीने छूट जाते हैं. जहां तक गिरफ़्तारी की बात है, तो गिरफ़्तारी अब भी तुरंत कहां होती है.

आम तौर पर एक केस दर्ज होने में चार से छह महीने लग ही जाते हैं. इससे पहले मध्यस्थता की प्रक्रिया चलती रहती है.

सुप्रीम कोर्ट की बात पवित्र मानी जाती है. इसलिए उसके इस फैसले/निर्देश से इस बात को भी सच मान लिया जाएगा कि वाक़ई में महिलाएं 498-ए का दुरुपयोग करती हैं.

वैसे, इस मुल्क में किस क़ानून का दुरुपयोग नहीं होता है? महिला आंदोलन भी दुरुपयोग करने वालों की हिमायती नहीं रही है.

यही नहीं दुरुपयोग करने वालों के ख़िलाफ़ कार्रवाई करने का भी क़ानून है. फिर भी यह दुरुपयोग हल्ला क्यों?

इसलिए दुरुपयोग, दुरुपयोग का शोर वास्‍तव में महिलाओं की प्रताड़ना से मुंह मोड़ने की कोशिश है.

यह इस बात की कोशिश है कि हिंसा का चक्र चलता रहे और उस हिंसा के चक्र में महिलाओं की ज़िंदगी फंसी रहे.

हिंसा और उत्पीड़न की शि‍कार महिलाओं का आख‍़िरी आसरा क़ानून ही होता है और आख़िरी चौखट अदालत.

अब उस चौखट ने भी हिंसा की शि‍कार महिलाओं पर शक जाहिर करते हुए, उनसे मुंह मोड़ लिया है. क्या माननीय सुप्रीम कोर्ट को इस फ़ैसले पर फिर से गौर करना चाहिए?

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