भारत चीन तनाव में क्या साल 1962 वाला ही रुख दिखाएगा नेपाल?

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भारत और चीन के बीच जारी गतिरोध कितने दिन तक चलेगा और इसका अंत कैसे होगा, इसे लेकर संशय कायम है. रविवार को भारतीय मीडिया में ख़बर चली कि इस मामले में चीन नेपाल से संपर्क करेगा और उसे हालात के बारे में बताएगा.

आख़िर दो बड़े देशों के बीच के इस गतिरोध में नेपाल कहां खड़ा है? नेपाल के लिए किसी का पक्ष लेना कितना आसान है? 1962 में भारत और चीन के बीच जब युद्ध हुआ था तो नेपाल का रुख क्या था? जो नेपाल का रुख था क्या करीब छह दशक बाद भी वहीं रहेगा?

ऐसे ही कई सवाल बीबीसी संवादाता रजनीश कुमार ने नेपाल में वरिष्ठ पत्रकार युवराज घिमिरे और जेएनयू में दक्षिण एशिया स्टडीज सेटंर की प्रोफ़ेसर सबिता पांडे के सामने रखे. इन दोनों के जवाब उन्हीं के शब्दों में पढ़िए-

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युबराज घिमिरे नेपाल से वरिष्ठ पत्रकार

भारत से जारी गतिरोध के बीच चीन का नेपाल से संपर्क को लेकर औपचारिक रूप से कुछ भी पता नहीं चला है. एक बात यह सामने आ रही है कि नेपाल के पूर्व प्रधानमंत्री केपी ओली चीन के आमंत्रण पर नासा गए थे.

यही अनुमान लगाया जा रहा है कि केपी ओली को चीन ने भारत से तनाव के बारे में ब्रीफ किया है. केपी ओली नेपाल के नेता प्रतिपक्ष हैं. हालांकि ये अनाधिकारिक रूप से कहा है जा रहा है क्योंकि नेपाल की तरफ़ से ऐसी किसी बात की पुष्टि नहीं की गई है. नेपाल चाहता है कि दोनों देशों में जारी तनाव के बीच उसे लेकर कोई ग़लत समझ नहीं बने.

1962 के युद्ध में नेपाल तटस्थ रहा था

भारत और चीन में तनाव पर नेपाल ने औपचारिक रूप से कुछ भी नहीं कहा है. नेपाल पहले भी और अब भी इस बात को मानता रहा है कि दो बड़े पड़ोसी देशों के बीच संबंध मधुर रहेगा तो उसे फ़ायदा होगा. ऐसा इसलिए है कि तनाव बढ़ेगा तो नेपाल में ज़रूरी चीज़ों की आपूर्ति को लेकर समस्या बढ़ेगी.

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1962 में भारत और चीन के बीच जब युद्ध हुआ था तब भी नेपाल पूरी तरह से तटस्थ था. उसने किसी का पक्ष नहीं लिया था. हालांकि नेपाल के गोरखा भारत की तरफ़ से चीन के ख़िलाफ़ लड़ रहे थे लेकिन नेपाली सरकार पूरी तरह से तटस्थ थी.

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तब भारत ने भी नेपाल का उस तरह से इस्तेमाल नहीं किया था. 1962 के बाद दारचुला के पास कालापानी एक जगह है जिसे लेकर भारत और नेपाल के बीच विवाद हुआ था. नेपाल इस क्षेत्र को अपना भूभाग मानता है और वहां भारतीय सैनिक मौजूद हैं.

23 अगस्त को दिल्ली पहुंच रहे हैं नेपाली पीएम

प्रधानमंत्री शेरबहादुर देउबा 23 अगस्त को दिल्ली पहुंचने वाले हैं. नेपाली प्रधानमंत्री कालापानी को लेकर भारत से आग्रह करेंगे के इस मामले को जल्दी से निपटाया जाए. इसे लेकर नेपाल की राजनीतिक पार्टियों का शेरबहादुर देउबा पर भारी दबाव है.

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इसमें कोई शक नहीं है कि नेपाल में भारत विरोधी भावना बढ़ी है और तो दूसरी तरफ वहां चीन की मौजूदगी बढ़ी है. 2005 और 2006 के बाद नेपाल में राजनीतिक परिवर्तन हुआ.

इस परिवर्तन के बाद नेपाल एक रेडिकल एजेंडे के साथ आगे बढ़ा है. जब नेपाल संक्रमण काल से गुज़र रहा है तब भारत ने ग़लतियां कीं. ऐसे में भारत बुरी तरह से नेपाल में एक्सपोज हो गया.

नेपाल में राजतंत्र ख़त्म होने के बाद एक किस्म की राजनीतिक शून्यता रही है. उस शून्यता और अभी जो यहां संक्रमण का दौर है, उसमें चीन एक बड़े प्लेयर के तौर पर सामने आया है.

इससे पहले चीन की नेपाल में कोई दिलचस्पी नहीं रही है. नेपाल के साथ चीन का तिब्बत को लेकर मामूली संपर्क रहता था क्योंकि दोनों की सीमा लगी हुई है. आज की तारीख़ में चीन का नेपाल में प्रभाव काफ़ी बढ़ गया है.

चीन ऐसा मानता है कि नेपाल में लंबे समय तक राजनीतिक अस्थिरता रही तो यह उसके ख़िलाफ़ जा सकता है.

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1962 की तुलना में नेपाली जनता और सरकार की भावना आज की तारीख़ में कितनी बदली है?

तब नेपाल में चीन कहीं नहीं था लेकिन आज वह हर जगह है. पहले हर मामले में नेपाल भारत पर निर्भर था. इसमें बड़ा परिवर्तन 2005-06 के बाद हुआ है. माओवादियों को भारत ने आतंकवादी तक कहा था. बाद में भारत ने उन्हीं माओवादियों का समर्थन किया और मध्यस्थता की भूमिका अदा की.

नेपाल ने नया संविधान अपनाया, लोकतंत्र आया, धर्मनिरपेक्ष राज्य बना या गणतंत्र बना लेकिन नेपाली जनता इस पूरी प्रक्रिया में शामिल नहीं रही. भारत ने इस चीज़ का ख़्याल बिल्कुल नहीं रखा. भारत ने सात राजनीतिक दलों और माओवादियों के बीच मध्यस्थता की थी.

2015 में जब नेपाली संविधान आ रहा था तब जिस पार्टी को भारत के सहयोग से नेपाल की सत्ता मिली उसी ने कहा कि भारत नेपाल के आंतरिक मामलों में हस्तक्षेप कर रहा है. एक तरह से उन्होंने भारत विरोधी रुख का परिचय दिया.

नेपाल में भूकंप के बाद भारत ने नाकेबंदी शुरू की और उससे स्थिति बिगड़ गई. नाकेबंदी के कारण नेपाल की आम जनता भी भारत को संदेह से देखने लगी. आज की तारीख़ में नेपाल में चीन की सक्रियता काफ़ी है.

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वह नेपाल में भारी निवेश भी कर रहा है. ऐसा कहा जा सकता है चीन नेपाल के साथ बहुत नजदीक हो गया है. चीन ने हमेशा यह बात दोहराई है कि वह नेपाल की संप्रभुता का आदर करता है. ऐसे में नेपाल की आम जनता में भी चीन को लेकर सहानुभूति पैदा हुई है.

इसके बावजूद सरकार वास्तविक रुख अपनाएगी और दोनों देशों के तनाव की सूरत में तटस्थ रहेगी. हम कह सकते हैं कि 1962 के युद्ध में नेपाल की जनता और सरकार की सहानुभूति भारत के साथ थी जो आज की तारीख़ में नहीं है.

1962 में भारत और नेपाल इतने करीब थे कि चीन के लिए कोई जगह ही नहीं थी.

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सविता पांडे (जेएनयू में दक्षिण एशिया स्टडीज सेटंर की प्रोफ़ेसर)

भारत और चीन में गतिरोध या युद्ध की स्थिति में नेपाल किसी की तरफ़दारी करेगा, ऐसा कहुना मुश्किल है. नेपाल ख़ुद ही राजनीतिक अस्थिरता से जूझ रहा है.

ये केवल भारत और चीन का ही मामला नहीं है. इसमें एक और देश है भूटान. ऐसे में नेपाल ऐसा कुछ भी नहीं करेगा जो भूटान को भारत के और करीब लाए. इसलिए नेपाल भारत और चीन के मामले में ख़ुद को अलग ही रखेगा.

नेपाल के भूटान से संबध अच्छे नहीं हैं. नेपाल और भूटान के बीच जो शरणार्थियों की समस्या है उसमें भारत ने दोनों देशों से सामान्य दूरी बनाई रखी.

भूटान के साथ नेपाल की अपनी समस्याएं हैं. भूटान ने नेपाली मूल के लोगों को निकाल-बाहर किया है. ऐसे में वह कभी नहीं चाहेगा कि भूटान से भारत के अच्छे ताल्लुकात कायम हो.

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गुटनिरपेक्ष देशों ने किसी का साथ नहीं दिया

एक ऐतिहासिक तथ्य यह भी है कि गुटनिरपेक्ष देशों ने कभी भारत का साथ नहीं दिया. 1962 के बाद भी गुटनिरपेक्ष सम्मेलन हुआ और युद्ध पर ही हुआ था लेकिन किसी का पक्ष नहीं लिया.

उस सम्मेलन में चीन बहुत आक्रामक था लेकिन कोई स्टैंड नहीं दिखा था. मुझे लगता है कि अभी चीन का हौव्वा खड़ा किया गया है.

भारत के जितने पड़ोसी देश हैं और जिनकी सीमाएं लगती हैं वे भारत पर बुनियादी ज़रूरतों के लिए निर्भर हैं. इन ज़रूरतों को कोई और देश पूरा नहीं कर सकता है.

इनके लिए जो भारत कर सकता है वो चीन कभी नहीं कर सकता. इसमें भूटान, नेपाल, बांग्लादेश और श्रीलंका के लिए भारत का कोई दूसरा देश विकल्प नहीं हो सकता. ऐसे में इन ज़रूरतों का ख़्याल रखते हुए ये वैसा कुछ भी नहीं करेंगे जिससे भारत उनके ख़िलाफ़ हो जाए.

1962 में नेपाल की स्थिति बिल्कुल अलग थी. उस वक़्त नेपाल के लिए चीन बड़ा फैक्टर नहीं था. नेपाल को भारत और चीन में से किसी एक को चुनना होगा तो वह किसी के भी साथ नहीं जाएगा.

1962 में नेपाल गुटनिरपेक्ष देशों के साथ ही चला था. उसने कोई स्टैंड नहीं लिया था. 1962 में सबसे ज़्यादा भूमिका गुटनिरपेक्ष देशों की थी. उसे वक़्त कोलंबो में सम्मेलन हुआ था और भारत के पक्ष में नहीं रहा था.

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