इंडिया का नाम जंबूद्वीप रखना बुरा आइडिया नहीं!

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ये असरानी फैक्टर है या ओएलऐक्स फैक्टर कि आजकल हर बंदा कहता फिरता है कि नाम बदल दो, गाम बदल दो. ये बदल दो, वो बदल दो और कुछ नहीं तो मेक अप करवा लो!

कोई बीस-पच्चीस साल पहले की बात होगी कि टीवी के विज्ञापन में असरानी भैया दुलकी चाल से एक परचून की दुकान पर बल्ब लेने पहुंचते थे. दुकानदार हर बार उनको समझाता था कि पुराना बल्ब छोड़ो ये नए ब्रांड वाला ले जाओ. असरानी जी खुश होकर नाचने लगते थे, अच्छा ये बात है- तब सारे घर के बदल डालूंगा!

फ़ैसला अब हुआ, बन पहले ही गया था दीनदयाल नगर

जब से सुना है कि मुग़लसराय स्टेशन का नाम पंडित दीनदयाल उपध्याय स्टेशन होने जा रहा है तब से लग रहा है कि यह राजनीति का असरानी फैक्टर है जो अभी तो मुग़लसराय को ही बदल रहा है. एक दिन कह उठेगा, सारे घर के बदल डालूंगा!

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Image caption अभिनेता असरानी

नोटबंदी से जीएसटी तक सबमें असरानी फैक्टर

या मुझे लगता है कि ये आजकल ओएलेक्स फैक्टर है जो दिन रात कहता रहता है कि पुराना बेच दो नया ले लो!

भगवान जी ही जानें कि किसका फैक्टर है, मगर हमें तो ऐसा लगता है कि नोटबंदी से लेकर जीएसटी तक जो बदल रहा है सबमें असरानी फैक्टर है या ओएलऐक्स फ़ैक्टर काम कर रहा है!

मैं तो शुद्ध भारतीय संस्कृति का पुजारी हूं. जो भारतीय संस्कृति सनातनता में यकीन करती है, जल्दी जल्दी बदलने में नहीं. और अपनी तो पांच हज़ार साल पुरानी है. यही अपनी शाश्वतता है.

मुग़लसराय स्टेशन का नाम बदलकर क्या हासिल होगा

कलजुग के प्रभाव में आकर आजकल कुछ लोग जल्दी-जल्दी बदलाव के चक्कर में आ जाते हैं तो हमारे जैसे भारतीय संस्कृति में रचे-पगे को बड़ा कष्ट होता है. ऐसा लगता है कि हर बंदा विज्ञापन वाला असरानी हुआ जा रहा है. उसे ये भी ख़याल नहीं कि जिस ब्रांड के बल्ब लेकर असरानी चहकते थे कि 'सारे घर के बदल डालूंगा' आज उस कंपनी का नाम तक कोई नहीं जानता!

माना 'परिवर्तन शाश्वत है' मगर है तो वो भी शाश्वत! यानी परिवर्तन ऊपरी होता है, शाश्वत शाश्वत रहता है!!

बदल दूं की बात करना कुछ मुआ कलजुगी

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यूं भारतीय संस्कृति बदलाव की विरोधी नहीं. बदलाव का मतलब इधर सिर्फ 'चोला बदल' है. आत्मा तो अजर अमर सनातन है वो कभी नहीं बदलती. बदलता है तो बाहरी रूप बदलता है, शरीर बदलता है आत्मा नहीं. कहा भी हैः'यथा शरीराय विहाय जीर्णानि---' यानी जैसे जीर्ण वस्त्रों को त्याग कर शरीर नए वस्त्र धारण करता है, उसी तरह आत्मा नए-नए रूप धारण करती रहती है---

ऐसे में ये बदल दूं वो बदल दूं की बात करना कुछ मुआ कलजुगी, और कुछ पच्छिमी कुलक्षण लगता है-

गोरे लोग जल्दी-जल्दी बदलने के शौकीन थे. पहले कंपनी बनाई फिर कंपनी बदली फिर सत्ता बदली फिर भाषा बदली फिर शिक्षा बदली धोती-पाजामा के जगह पेंट-शर्ट सूट-बूट दे दिए, मुक्त कंठ भारत के कंठ में लटका दिए एक कंठ लंगोट!

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सब कलजुग की माया! और इन 'माया मेडम' के क्या कहने? सिर्फ कबीर जी ने इनको पहचाना था कि 'माया महा ठगिनि हम जानी'! वही आजकल कान में कहती रहती हैः बदल-बदल-बदल-बदल!

कैसे समझाऊं कि भइया जी! आप मालिक हैं. आप रूप बदल सकते हैं, नाम बदल सकते हैं, कपड़े बदल सकते हैं, मेक अप बदल सकते हैं, प्लास्टिक सर्जरी से चेहरा बदल सकते हैं, लेकिन आत्मा का मेक अप कैसे करेंगे? वो तो गुरुजी ने बताया ही नहीं!

अगर मुग़लसराय स्टेशन का नाम बदलकर पंडित दीनदयाल उपाध्याय स्टेशन रख दिया तो क्या वाकई कुछ बदल गया भाई जी?

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Image caption मुग़लसराय स्टेशन पर दीनदयाल उपाध्याय की लाश मिली थी

भाई जी कहेंगे कि पंडित दीनदयाल जी की लाश इसी स्टेशन के एक खंभे के नीचे मिली थी इसलिए ये उनको समर्पित किया जा रहा है! मुग़लसराय नाम पढ़ते ही 'मुग़ल शासन' याद आने लगता है. लोग दीनदयाल जी का नाम पढ़ेंगे तो दीनदयाल जी याद आएंगे. गूगल करेंगे तो उनको मालूम पड़ेगा कि वे संघ के महान कार्यकर्ता और जनसंघ के यशस्वी अध्यक्ष थे. जनसंघ ही आज की भाजपा है और इस तरह वे हमारे तक पहुंचेगे, यही नया प्रतीकवाद है.

'नाम बदलने से विकास होता, तो बेरोज़गार अपना नाम अंबानी रख लें'

आप पांच हज़ार साल पुराने आइटम हैं

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मैंने कहा, तुरंत बदलिए. कांग्रेस ने क्या-क्या नहीं बदला? कनॉट प्लेस का नाम राजीव चौक कर दिया (जो ज़ुबान तक पर नहीं चढ़ता) तो आप क्यों पीछे रहें? जब कलकत्ता, कोलकाता हो गया. मद्रास चेन्नई हो गया, बेंगलोर बेंगलुरू हो गया, पॉंडिचेरी पुड्डूचेरी हो गया, जब इतना 'डिकोलोनाइज़ेशन' पहले ही हो गया तो आप पीछे क्यों रहें हुज़ूर!

आप तो पांच हज़ार साल पुराने आइटम हैं. आप पांच हज़ार साल के लंबे अतीत में गोता लगा सकते हैं और नए-नए नाम निकालकर ला सकते हैं. आप क्यों चूकें मालिक? वो डिकोलोनइज़ कर सकते हैं आप 'डि-इस्लामाइज़ेशन' क्यों नहीं कर सकते? कर दीजिए!

ये मुग़ल नाम आपका ज़ायका ख़राब करते हैं बुरे दिनों की याद दिलाते हैं इसलिए अपने पूरे इतिहास को ही बदल दीजिए! बदलने के लिए, मेक अप करने के लिए आपके सामने सारा देश पड़ा है.

दिल्ली को इंद्रप्रस्थ कर दें. इस देश का नाम इंडिया की जगह सिर्फ 'भारत' कर दें. यूं 'जंबूद्वीप' बुरा आइडिया न होगा. नहीं तो आर्यावर्त भी चल सकता है- चॉयस इज़ योर्स सरजी!

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