नज़रिया: कांग्रेस को हक़ीक़त का आईना देखने की ज़रूरत!

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'कांग्रेस अस्तित्व के संकट से गुजर रही है.' कांग्रेस के वरिष्ठ नेता जयराम रमेश के इस बयान ने पार्टी के अंदर और बाहर कई सवाल खड़े कर दिए हैं.

सत्ता की राजनीति में हाशिये पर सिमट गई कांग्रेस अब विपक्ष की सियासत में भी चूकती हुई दिख रही है.

क्या सचमुच कांग्रेस की स्थिति इतनी खराब हो गई है?

कोच्चि में रविवार को जयराम रमेश ने समाचार एजेंसी पीटीआई से कहा, "कांग्रेस के सामने वजूद का संकट है. यह कोई चुनावी समस्या नहीं है. हमें ये समझना होगा कि हम नरेंद्र मोदी और अमित शाह के विरोध में खड़े हैं. और वे अलग तरह से सोचते हैं, अलग तरह से काम करते हैं. और अगर हमने अपने रवैये में लचीलापन नहीं लाया तो हम आप्रासंगिक हो जाएंगे."

बीबीसी हिंदी संवाददाता रेहान फ़ज़ल ने इसी मसले पर वरिष्ठ पत्रकार और फ़र्स्टपोस्ट के संपादक अजय सिंह से बात की.

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Image caption जयराम रमेश ने ये माना है कि मोदी और शाह अलग तरह से सोचते हैं, अलग तरह से काम करते हैं और उनसे मुकाबले के लिए कांग्रेस को लचीला रुख अपनाना होगा

अजय सिंह का नज़रिया

जयराम रमेश की टिप्पणी को साधारण ढंग से नहीं देखा जा सकता है. उसकी वजह ये है कि जयराम रमेश को पार्टी में बुद्धिजीवी माना जाता है.

दूसरी चीज़ ये है कि उन्होंने इंदिरा गांधी पर काफी काम भी किया है. हाल ही में उन्होंने एक किताब भी लिखी है.

कुल मिलाकर आप देखें तो उन्हें कांग्रेस के इतिहास से बारे में अच्छी जानकारी है.

कांग्रेस के इतिहास में जो उतार-चढ़ाव हुए हैं, उसे देखते हुए जयराम रमेश की टिप्पणी पर मेरा ये कहना है कि पार्टी को वाकई अपने भीतर झांकने की जरूरत है.

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जयराम रमेश का बयान

दिक्कत यही हो रही है कि पार्टी क्या वाकई में आत्मचिंतन के लिए तैयार है या वो राहुल गांधी को लाने के बारे में सोच रही है. पार्टी की रणनीति कहीं ये तो नहीं. अगर उसकी रणनीति सिर्फ़ यही है तो हमें ये लगेगा कि पार्टी ने ईमानदारी से अपनी स्थिति के बारे में नहीं सोचा.

लेकिन अगर वाकई में आत्मचिंतन किया जाता है और विपक्ष के जो हालात हैं उसे देखते हुए ये ज़रूर लगेगा कि विपक्ष में फिर से जान फूंकने की ज़रूरत है.

इसमें कांग्रेस चूंकि एक प्रमुख दल है इसलिए उसके साथ अस्तित्व का संकट साफ दिख रहा है.

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नेतृत्व का विकल्प

पार्टी में दूसरी पंक्ति तो छोड़िए पहली पंक्ति का ही नेतृत्व नहीं है. पहली पंक्ति में ही कोई ऐसा नहीं है जो विपक्ष की एक आवाज़ को लेकर चल सके.

जो ये बता सके कि विपक्ष किस दिशा में जाएगा. सरकार की गलतियों को जो मुद्दा बनाकर पेश कर सके. ऐसा तो कोई दिखता ही नहीं है.

कांग्रेस को ये सोचना पड़ेगा कि अभी तक वे जिस वर्चस्व वाली स्थिति में रहे थे, वो अब बीते दिनों की बात हो गई है.

और ये वर्चस्व आज से उनके हाथ से नहीं निकला है बल्कि बहुत दिनों से निकला हुआ है लेकिन उनको ये एहसास हो ही नहीं रहा है.

साठ के दशक में कांग्रेस की जो स्थिति थी, वही स्थिति आज भारतीय जनता पार्टी की है.

जब तक कांग्रेस को इस हकीकत का एहसास नहीं होगा और वे विपक्ष की एकता की ज़रूरत को गंभीरता से समझेंगे नहीं तब तक कोई भी रणनीति इनके लिए काम नहीं करने वाली है.

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