नज़रिया: अहमद पटेल मामले में मुख्य चुनाव आयुक्त का बोल्ड और निष्पक्ष फ़ैसला

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गुजरात की राज्यसभा की सीटों के लिए मंगलवर को मतदान हुआ, लेकिन वोटिंग की गिनती नहीं हो पाई.

एक सीट पर जहां कांग्रेस के अहमद पटेल चुनाव लड़ रहे थे, वहां से कांग्रेस ने आपत्ति जताई और चुनाव आयोग से गुहार लगाई कि दो विधायकों ने मतदान से पहले अपने मतपत्र ग़ैरआधिकारिक लोगों को दिखाए हैं और ये मत रद्द किए जाने चाहिए.

बीजेपी ने इसका विरोध किया और इसे चुनाव आयोग के सामने दोनों दलों के दिग्गज नेता पहुंचे और लगभग आधी रात फ़ैसला आया जिसमें चुनाव आयोग ने इन दो मतों को रद्द कर दिया. मतों की गिनती शुरू कराई गई जिसके बाद इस सीट से अहमद पटेल जीते.

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चुनाव आयोग की भूमिका

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लोगों में थोड़ा संदेह था कि मौजूदा चुनाव आयुक्त (अचल कुमार जोती) जो हैं वो बीजेपी के नियुक्त किए गए हैं और इससे पहले गुजरात में बीजेपी की सरकार के दौरान वहां चीफ़ सेक्रेटरी भी रह चुके हैं.

लेकिन चुनाव आयोग ने उन सभी अटकलों पर लगाम लगा दी है. इसके साथ ना केवल इस बार के लिए बल्कि हमेशा के लिए इस तरह की अटकलें अब ख़त्म हो जानी चाहिए.

ये बड़ा ही ठीक फ़ैसला उन्होंने लिया, ये एक बोल्ड और बिल्कुल निष्पक्ष फ़ैसला था. इसके अलावा कोई और फ़ैसला संभव भी नहीं था.

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टीएन शेषन की याद दिला

मंगलवार को कांग्रेस तीसरी बार चुनाव आयोग के दरवाज़े पर पहुंची और बीजेपी भी वहां पहुंची. आरोप प्रत्यारोप के दौर चलते रहे और चुनाव आयोग को सामने से नेताओं का प्रेस से बात करना भी चलता रहा.

ऐसे में माना जा रहा था कि चुनाव आयोग के लिए फ़ैसला लेना मुश्किल रहा होगा. चुनाव आयोग के पास पार्टियों के प्रतिनिधि दल आए दिन पहुंचते ही रहते हैं लेकिन इससे चुनाव आयोग पर किसी तरह का कोई दवाब नहीं पहुंचता.

पूर्व चुनाव आयुक्त टीएन सेशन सरकार के ख़िलाफ़ कदम उठाने के लिए जाने जाते हैं. मंगलवार हुए प्रकरण ने एक तरह से टीएन शेषन की याद दिला दी.

उस ज़माने की बात करें तो शेषन उस समय की ज़रूरत थे और आज भी चुनाव आयोग उनके नक्शेकदमों पर चलता रहा है.

आज का चुनाव आयोग उस समय के मुक़ाबले देखा जाए तो पहले से दस क़दम मज़बूत और बढ़िया है और इस कारण हिन्दुस्तान के सभी संस्थाओं में से चुनाव आयोग का सम्मान सबसे ऊपर है.

(बीबीसी संवाददाता मानसी दाश के साथ बातचीत पर आधारित)

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