#70yearsofpartition: 'गुरु की मस्जिद' जिसकी रखवाली करते हैं निहंग सिख

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मस्जिद जिसकी रक्षा कर रही है निहंग सिख की तलवार

मेहराबों पर लिखी आयतों की लकीरें मद्धम हो गई हैं, टाइल्स पर क़लमकारी से उकेरे गए बेल-बूटों के रंग जगह-जगह से उड़ गए हैं, मगर पास बने प्लास्टर और बिन प्लास्टर वाले घरों और पेड़ों के बीच से दिखते गुंबद इसके मस्जिद होने की गवाही साफ-साफ देते हैं.

पंजाब के हरगोबिंदपुर में मौजूद वो मस्जिद जिसका बंटवारे के वक़्त फैली वहशत के बावजूद बाल भी बांका न हुआ और जिसकी हिफ़ाज़त अपनी बहादुरी के लिए जाने जानेवाले निहंग सिख आधी सदी से ज़्यादा से कर रहे हैं.

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मस्जिद की देख-रेख

1947 और उसके पास के साल जब हिंदू, मुसलमान, सिख यानी मज़हब के नाम पर पड़ोसी-पड़ोसी का दुश्मन बन बैठा था, जब मंदिर, गुरुद्वारे और मस्जिद ढहाये जा रहे थे, निहंग सिखों के तरना दल के सरदार ने कहा, 'गुरु की बनाई मसीत को अगर कोई नुक़सान पहुंचाएगा तो हम उसे मार डालेंगे'- तबसे मस्जिद उनकी देख-रेख में है.

हालांकि तब सीमा के पास बसे इस शहर और पंजाब के दूसरे कई इलाक़े मुस्लिम आबादी से ख़ाली हो गए थे.

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मस्जिद के अहाते में नीले कपड़े में बंधा 50 फुट लंबा पोल जिसके ऊपर दोधारी तलवार लटक रही है, इस बात का एलान है कि मस्जिद की सुरक्षा अब निहंगों के हाथ है.

सिखों के छठे गुरु श्री हरगोबिंद ने जब 17वीं सदी में हरगोबिंदपुर (अब भारतीय पंजाब में) बसाया तो शहर के मुसलमानों के लिए इसकी तामीर करवाई.

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मस्जिद की सेवा

गुरु हरगोबिंद महज़ 11 साल के थे जब उनके पिता और सिखों के पांचवे गुरु अर्जन देव को मुग़ल बादशाह जहांगीर के हुक्म से क़त्ल कर दिया गया था.

और फिर गुरु हरगोबिंद छठवें गुरु बने.

पिछले 35 सालों से मस्जिद की सेवा कर रहे बाबा बलवंत सिंह कहते हैं, "यहां का चौधरी गुरु साहब को बहुत गालियां निकालता था. बहुत बुरा-भला कहता था छठवें पादशाह को. ऐसा साखियों में लिखा है. जंग हुई जिसमें वो हार गया और मारा गया. गुरु ने कहा यहां मंदिर नहीं बनेगा, गुरुद्वारा नहीं बनेगा और उस जगह पर मस्जिद की तामीर करवाई."

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Image caption मस्जिद की सेवा करने वाले बाबा बलवंत सिंह

लंबे क़द काठी और छरहरे शरीर के मालिक बाबा बलंवत दसवीं पास करने के बाद ही यहां आ गए थे और तबसे मस्जिद की देखभाल और 'सेवा' करते हैं.

गुरु की मसीत

मस्जिद के अहाते में तैयार नए हिस्से के एक कमरे में रहते हैं बाबा बलंवत सिंह, एक पुरानी रेफ्ऱीजरेटर, ग़ल्ले की एक बोरी, कुछ बर्तन और भंग घोटने के सामान के साथ. और, उनका ज़्यादातर वक़्त गुरुग्रंथ साहब के पाठ, 'मसीत की सेवा' और मस्जिद के दर्शन के लिए आनेवालों की देखरेख में बीतता है.

हालांकि गुरु की मसीत (मस्जिद) को देखनेवालों का सिलसिला पिछले कुछ सालों से ही शुरू हुआ है वरना साल 2000 तक तो हरगोबिंदपुर में ही पैदा और पले-बढ़े आकाश नंदा जैसे लोगों तक को नहीं मालूम था कि वहां कोई मस्जिद भी है और वो भी इतनी ऐतिहासिक!

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मस्जिद का पुननिर्माण

आकाश नंदा कहते हैं कि जब यूनेस्को ने यहां ख़स्ताहाल हो रही मस्जिद के पुनर्निमाण का काम शुरू करवाया तब जाकर शहरवालों को इल्म हुआ कि वहां किसी सिख गुरु की बनाई हुई मस्जिद भी मौजूद है.

बाबा बलवंत सिंह के साथ मौजूद रंजोत सिंह कहते हैं, गुरु श्री हरगोबिंद जुल्म के खिलाफ लड़े. मज़हब के लिए नहीं. इसलिए उन्होंने लोगों के लिए ये मसीत बनवाई.

हालांकि मस्जिद के पुनर्निमाण के बाद कुछ शहरी भी इसकी देख-रेख के लिए ज़्यादा चौकस हुए हैं, लेकिन हालात फिर भी बहुत बेहतर नहीं हुए हैं.

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बाबा बलवंत मुझसे कहते हैं कि कम से कम नलके का पानी तो लग जाए मसीत में वरना छोटे-छोटे कामों में भी तकलीफ़ उठानी पड़ती है.

अभी जो दौर जारी है उसमें मस्जिद के इस सेवादार की ख़्वाहिश को पूरी करने के साथ-साथ इस मसीत (मस्जिद) की हिफ़ाज़त भी ज़र-शोर से की जानी चाहिए - ये हिंदुस्तान की मिली-जुली तहज़ीब का एक अहम हिस्सा है.

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