नज़रिया- 'मोदी के पास कुछ कर दिखाने के सिर्फ़ 16 महीने'

नरेंद्र मोदी इमेज कॉपीरइट Getty Images

आज़ादी का जश्न के बाद यानी 15 अगस्त के बाद मोदी सरकार तीसरी बार कैबिनेट में फेरबदल कर सकती है.

सत्तारूढ़ मोदी सरकार अपने कार्यकाल के तीन साल ख़त्म कर चुकी है. मोदी के प्रधानमंत्री बनने के बाद से सरकार इस दौरान 2014 और 2016 में दो बार कैबिनेट में फेरबदल कर चुकी है.

एक तरफ कई राज्यों में विधानसभा चुनाव होने वाले हैं और 2019 में लोकसभा चुनाव भी हैं जिसके मद्देनज़र इस बार के कैबिनेट फेरबदल को बेहद अहम माना जा रहा है, तो दूसरी तरफ माना जा रहा है कि ये भाजपा की गठबंधन के अपने साथियों को खुश करने की कवायद हो सकती है.

मोदी के दुख जताने पर चीनी क्यों भड़के?

'मोदी का मुकाबला करने की क्षमता किसी में नहीं'

कैबिनेट में फेरबदल की क्या है ज़रूरत?

इमेज कॉपीरइट AFP

कैबिनेट में फेरबदल इसलिए ज़रूरी है क्योंकि सरकार का आधा वक्त ख़त्म हो चुका है और इस समय 2019 के चुनाव सामने हैं. इतनी घोषणाएं हुई हैं लेकिन ज़मीन पर इस घोषणाओं का कितना क्या दिख रहा है यही चुनावों में मुद्दा बनेगा.

हिंदुत्व का मुद्दा, वंदे मातरम और बाकी मुद्दे को अगरबत्ती दिखाने जैसे हैं. मूल प्रश्न को यही होगा कि विकास कितना हुआ है, जैसे स्मार्ट सिटी प्रोजेक्ट कितना आगे बढ़ा, स्किल डेवेलपमेंट होना, नौकरियां कितनी बढ़ीं.

मोदी में माद्दा है, वो ट्रंप को भी चुनौती दे सकते हैं: सुषमा

'मोदी के रास्ते का आख़िरी कांटा निकल चुका है'

सरकार के पास इस साल के 4 महीने और अगले साल के 12 महीने- यानी कुल मिला कर 16 महीने हैं सरकार के पास कुछ कर दिखाने के लिए.

चार क्षेत्र ख़ास कर, कृषि क्षेत्र में क्या क्या हुआ है, इंडस्ट्री में कितनी नई नौकरियां बनी हैं, देश में जो निवेश आ रहा है उसका असर कहां और कितना दिख रहा है, गरीबी हटाने के लिए शुरू किए गए कार्यक्रम जैसे डायरेक्ट ट्रांसफर, गैस चूल्हा बांटना जैसे कार्यक्रमों के असर को भी देखने की ज़रूरत है.

सरकार को अभी ऐसे मंत्री चाहिए जो केवल दिल्ली में ना बैठें बल्कि चाबुक चलाएं और काम पूरा करें.

इमेज कॉपीरइट Reuters
Image caption जीएसटी के विरोध में दिल्ली के जंतर मंतर पर हुए प्रदर्शनों के दौरान एक पोस्टर

सरकार को लगता है कि सिस्टम काम में मदद नहीं कर रहा है, सिस्टम में कमियां हैं जिस कारण जनता के लिए शुरू किए गए कार्यक्रमों का लाभ उन तक समय से नहीं पहुंच पा रहा है. पीएम मोदी की यही चिंता है कि इतने कार्यक्रम हुए, घोषणाएं हुईं लेकिन ज़मीन पर कुछ दिखे.

30 फीसदी कार्यक्रमों का लाभ भी ज़मीन पर दिखे तो सरकार निश्चिंत रहेगी.

जदयू नेताओं को भी मिल सकते हैं दो पद

कुछ मंत्रियों का काम काफी अच्छा रहा है जबकि अधिकतर मंत्री काम उस हिसाब से नहीं कर रहे, ऐसे मंत्रियों को रखना है या नहीं इस पर भी फ़ैसला होगा. नए मंत्रियों को कैबिनेट में जगह दी जा सकती है.

इमेज कॉपीरइट Reuters

बिहार चुनाव अब ख़त्म हो चुके हैं, पहले बिहार को देखते हुए नौ मंत्री रखे गए थे. अब हाल में भाजपा ने जदयू से हाथ मिलाया है तो उन्हें भी दो पद देने होंगे, ऐसे में उनके लिए भी पद निकालने होंगे.

ऐसा भी है कि कुछ मंत्री राजनीतिक काम के लिए ठीक हैं जबकि मंत्री पद के काम के लिए ठीक नहीं है उन्हें भी उपयुक्त जगह पर रखना होगा.

पीएम मोदी ने खुद ही 'प्रगति सिस्टम' शुरू किया था जिसमें वो सभी मंत्रियों, ख़ास कर मंत्रालयों के काम की जांच करते हैं. बीते दो सालों में वो कैबिनेट सक्रेटरी के साथ और पीएमओ के साथ बैठ कर वो पता कर रहे हैं कि विकास कार्यक्रमों का और कैबिनेट के फ़ैसलों का क्या हुआ, इतना सब कुछ यहीं से फॉलो करना पड़ रहा है.

क्या नरेंद्र मोदी केवल गुजरात के प्रधानमंत्री हैं?

साथ ही पीएमओ में भी उन्होंने एक सेल बनाया जहां हर मंत्री और मंत्रालय का परफॉर्मेंन्स देखा जा रहा है. ये सभी काम इसीलिए चल रहे हैं क्योंकि पीएम के पास समय कम हैं और यही उनके सामने चैलेंज है.

इमेज कॉपीरइट AFP
Image caption मोदी, इस साल गुजरात में आए बाढ़ से हुए नुक़सान का हवाई सर्वेक्षण करते हुए

पीएम को ऐसे लोग चाहिए जो कार्यक्रमों को आगे बढ़ा सकें और ज़मीन पर उन्हें उतार सकें. क्योंकि आख़िर में चुनाव का मुद्दा यही रहेगा कि पांच साल सरकार ने क्या किया. सरकार को इन सवालों का जवाब ढ़ूंढना पड़ेगा.

अमित शाह संसद में क्यों पहुंचना चाहते हैं?

अरुण जेटली को मिल सकती है राहत

फिलहाल कुछ पद खाली पड़े हैं, वेंकैया नायडू के उप राष्ट्रपति बनने से शहरी विकास मंत्रालय में उनका पद अब खाली है. अरुण जेटली दो मंत्रालय (वित्त विभाग और रक्षा विभाग) का कार्यभार संभाल रहे हैं.

इमेज कॉपीरइट EPA

देखा जाए तो ये एक ज़रूरी मुद्दा है कि देश में रक्षा विभाग देखने के लिए पूरे तौर पर एक मंत्री नहीं हैं. लेकिन जीएसटी के लागू करने के बाद फिलहाल अरुण जेटली के पास थोड़ा समय है.

अब उनके सामने एक बड़ा मुद्दा है आर्थिक साल को बदलना, सरकार अप्रैल-मार्च तक चलने वाला आर्थिक साल बदल कर जनवरी-दिसंबर करना चाहते हैं.

अरुण जेटली रक्षा मंत्रालय भी संभालेंगे

इस दिशा में सरकार ने इस साल एक महीना पहले बजट पेश किया ताकि साल की शुरुआत में सरकार के पास अपने कार्यक्रम शुरू करने के लिए पैसा होगा. सरकार ऐसा करना चाहती है तो वित्त मंत्री पर अधिक ज़िम्मेदारी होगी.

कैबिनेट में नए चेहरों के आने की भी उम्मीद की जा रही है.

कलराज मिश्र को ही देख लें. इस बार कलराज मिश्र को भी गवर्नर बनाया जा सकता है.

इमेज कॉपीरइट PRAKASH SINGH/AFP/Getty Image

सरकार में एक अनकही बात दिखी है वो ये कि ऐसे मंत्री जो 75 साल से अधिक उम्र के हैं उन्हें मंत्रिमंडल से हटा देते हैं. जैसे पिछले कैबिनेट फेरबदल में नजमा हेपतुल्ला को गवर्नर बना दिया गया था.

भाजपा के पास पहली बार सांसद बने काफी नेता हैं उन्हें भी काम दिया जा सकता है. ऐसे सांसदों में काम करने की इच्छा और ऊर्जा भी है जिसकी सरकार को ज़रूरत है.

नजमा का इस्तीफ़ा, अल्पसंख्यक मामले नकवी के ज़िम्मे

ये भी संभव है कि ऐसे नेता जो मंत्री के रूप में अधिक कारगर नहीं हैं उन्हें पार्टी में लौटा लिया जाए जबकि पार्टी से कुछ लोगों को मंत्रिमंडल में ले लिया जाए. ऐसा अटल बिहारी वाजपेयी के वक्त में भी हो चुका है जब प्रमोद महाजन और अरूण जेटली सरकार छोड़ कर पार्टी में आ गए थे.

कुल मिला कर कहें तो आने वाले चुनावों में भाजपा पार्टी के लिए जिस तरह की भूमि सरकार तैयार करना चाहती है उसी को देखते हुए कैबिनेट में फेरबदल किए जाएंगे.

(बीबीसी संवाददाता मानसी दाश से बातचीत पर आधारित.)

(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक और ट्विटर पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)