नज़रिया: 'देश में मुसलमानों में असुरक्षा का माहौल नहीं है'

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हाल में पूर्व उपराष्ट्रपति हामिद अंसारी ने देश में अल्पसंख्यकों की असहजता पर बयान दिया था जिसे लेकर सोशल मीडिया मे काफी हलचल दिखाई दी.

उप-राष्ट्रपति पद का कार्यकाल पूरा होने से पहले हामिद अंसारी ने एक टीवी चैनल को दिए अपने इंटरव्यू में कहा कि देश के मुसलमानों में बेचैनी और असुरक्षा की भावना दिखाई पड़ती है.

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कुछ उसी बात को आगे बढ़ाते हुए उन्होंने राज्यसभा में अपने विदाई भाषण में कहा, "मैं आज पूर्व राष्ट्रपति एस राधाकृष्णन के वही शब्द दोहराना चाहता हूँ जो मैंने 2012 में कहे थे. एक लोकतंत्र की पहचान इस बात से होती है कि वो अपने अल्पसंख्यकों को कितनी सुरक्षा दे सकता है."

प्रधानमंत्री मोदी ने राज्यसभा में कांग्रेस के साथ हामिद अंसारी के कार्यकाल को याद करते हुए कहा कि आपको शायद कभी बंधा हुआ महसूस हुआ हो, लेकिन अब आप आज़ाद हैं और आपको अपनी मूलभूत प्रवृत्ति के अनुसार कार्य करने, सोचने और बात बताने का अवसर मिलेगा.

इस मुद्दे पर अल्पसंख्यक आयोग के अध्यक्ष सैयद गय्यूर उल-हसन रिज़वी से बात की बीबीसी संवाददाता हरिता काण्डपाल ने.

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सैयद गय्यूर उल-हसन रिज़वी का नज़रिया

उपराष्ट्रपति पद पर रहने वाले इतने बड़े आदमी का अपने कार्यकाल के आख़िरी दिन ये कहना कि मुसलमान इस देश में सुरक्षित महसूस नहीं कर रहा है, ये ठीक नहीं है.

इसलिए क्योंकि अगर आप मुसलमानों में डर पैदा कर देंगे तो वो मुख्यधारा से कट जाएंगे.

सरकार उन्हें मुख्यधारा से जोड़ने की कोशिश कर रही है. इसके लिए तमाम योजनाएं चलाई हुई हैं.

लेकिन ऐसा कहने से मुसलमान मुख्यधारा से कट जाएगा और डर के मारे और फिर वो मुख्यधारा में आ नहीं पाएगा.

असुरक्षा का माहौल नहीं हैं, हां ये ज़रूर है कि कुछ घटनाएं घटी हैं. और, देश के प्रधानमंत्री ने इस तरह का माहौल पैदा करने की कोशिश करने वाले लोगों को तीन-तीन बार चेतावनी दी है.

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मुसलमानों को सोचना चाहिए और वो सोच भी रहा है कि जब देश का प्रधानमंत्री खुद ही इन मसलों पर चिंतित है तो इसमें असुरक्षा का भाव कहां पैदा होता है.

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मुसलमानों की समाज और सरकार से उम्मीदें

मुसलमान काफी पीछे रह गए हैं. उसकी ख़ास वजह ये रही कि वो पढ़ना नहीं चाहते. कुछ लोगों ने वोटबैंक की राजनीति कर उन्हें मुख्यधारा में आने नहीं दिया. मुसलमान शिक्षा, रोज़गार और नौकरियों में पिछड़ गया.

आज मुसलमान को तालीम और तिजारत की ज़रूरत है. इसके लिए सरकार और अल्पसंख्यक आयोग योजनाएं चला रहा है.

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उन्हें जागरूक करने की तमाम कोशिशें की जा रही हैं कि फिज़ूल की बातों में ना पड़िए, छोटे-मोटे वाकयात हो रहे हैं उनमें ना पड़िए, और मुख्यधारा में आ कर सरकारी योजनाएं का लाभ उठाइए.

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देश के विकास में योगदान

सबसे अच्छी बात ये है कि लगभग 83 से 84 मुसलमान बच्चे इस बार एलाएड सर्विसेस में आए हैं. ये बड़ी कामयाबी है और इसे इस तरह से देखा जाना चाहिए कि मुसलमान भी कंधे से कंधा मिला कर देश के विकास में योगदान दे रहे हैं.

सरकार मुसलमानों को मुख्यधारा में शामिल करने की बहुत कोशिश कर रही है और इस बार उन्होंने इसके लिए 40,00 करोड़ की आर्थिक मदद देने का फ़ैसला किया है.

ये आज़ादी के बाद अल्पसंख्यकों को दी गई सबसे बड़ी आर्थिक मदद है.

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वोटबैंक की राजनीति में फंसे मुसलमान

आज़ादी से 70 साल बाद भी देश की तमाम राजनीतिक पार्टियों ने मुसलमान को वोटबैंक माना है और उसे मुख्यधारा में लाने की कोशिश नहीं की गई.

इस कारण उन्हें जितना विकास करना था वो उतना नहीं कर पाए, उन्हें जितनी शिक्षा मिलनी चाहिए थी वो नहीं मिल पाई, जितना रोज़गार मिलना चाहिए था नहीं मिल पाया. इस कारण वो मुख्यधारा से पीछे रह गया.

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उनके मन में डर पैदा करना कि उनके साथ मत जाओ बुरा हो जाएगा, इससे मुसलमान भ्रमित हो गया. अब उन्हें डरना नहीं चाहिए, उन्हें तुष्टीकरण से सशक्तिकरण की ओर बढ़े.

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Image caption उत्तर प्रदेश के नौएडा से सटे दादरी में 2015 में गोहत्या और गोमांस खाने की अफ़वाह पर भीड़ के हाथों मोहम्मद अख़लाक़ की हत्या की गई थी.

अल्पसंख्यकों के ख़िलाफ़

जुनैद, पहलू ख़ान और अख़लाक की पीट-पीट कर हत्या होने जैसी घटनाएं परेशान करने वाली हैं. ऐसी घटनाओं से एक संदेश ज़रूर जाता है कि अल्पसंख्यक के ख़िलाफ़, उनमें डर पैदा करने की कोशिशें हैं.

जो संस्थाएं या लोग इस तरह की घटनाओं को अंजाम दे रहे हैं उनको देश के प्रधानमंत्री ने आगाह किया है कि इस तरह की हरकतों से बाज़ आना चाहिए.

लेकिन अगर इस तरह के दो-चार मामले या दस मामले भी आ रहे हैं तो पूरे मुसलमानों को डरना नहीं चाहिए, उन्हें आगे बढ़ना चाहिए.

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