ख़ुफ़िया कांग्रेस रेडियो की अनकही दास्तान

रेडियो इमेज कॉपीरइट Getty Images
Image caption प्रतीकात्मक तस्वीर

'भारत छोड़ो' आंदोलन के ठीक पांच दिन बाद बंबई के गोवालिया टैंक इलाक़े में एक और घटना हुई. 14 अगस्त, 1942 को. उस प्रयोग ने भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन को दुनिया का अग्रणी देश बना दिया. औपनिवेशिक सत्ता के ख़िलाफ़ ऐसे प्रयोग दस से बीस साल बाद क्यूबा और दक्षिण अफ्रीका में दोहराए गए.

यह घटना थी आज़ादी के आंदोलन में अत्याधुनिक टेक्नोलॉजी वाली दूरसंचार प्रणाली रेडियो का इस्तेमाल. इस लिहाज़ से यह कांग्रेस रेडियो की पचहत्तरवीं सालगिरह है.

कांग्रेस अधिवेशन में महात्मा गांधी के संबोधन और 'करो या मरो' प्रस्ताव के कुछ घंटे बाद पुलिस-प्रशासन ने आंदोलनकारियों की धर-पकड़ शुरू कर दी. पूरे देश में जिला और पंचायत स्तर तक अलग-अलग स्थानों से हज़ारों की संख्या में गिरफ़्तारियां हुईं. इसी के साथ प्रशासन ने अख़बारों पर कई तरह की पाबंदियां लगा दीं.

'हर व्यक्ति नेता है'

इमेज कॉपीरइट Getty Images

कांग्रेस नेताओं का एक छोटा-सा समूह गिरफ़्तारी से बच गया. जयप्रकाश नारायण, अच्युत पटवर्धन और राममनोहर लोहिया जैसे नेता भूमिगत हो गए और आंदोलन चलाते रहे. महात्मा गांधी ने अपने भाषण में कह दिया था कि आज से 'हर व्यक्ति अपने ढंग से फ़ैसला करने के लिए आज़ाद है. हर व्यक्ति नेता है.'

ब्रितानी हुकूमत को चिंता थी कि 'हर व्यक्ति की आज़ादी' का अर्थ अंत में क्या होगा? देश में अराजकता फैलेगी, हिंसा होगी, खून-ख़राबा होगा. उससे बड़ा डर अफ़वाहों का था.

अफ़वाहें कांग्रेस के लिए भी घातक हो सकती थीं. सवाल यह था कि आंदोलन और उससे जुड़े नेताओं की पुष्ट ख़बरें लोगों तक कैसे पहुंचाई जाएं?

नौजवानों का आइडिया

उसी समय, 9 अगस्त, 1942 की शाम बंबई में कुछ युवा कांग्रेस समर्थकों ने बैठक की जिसमें रेडियो टेक्नोलॉजी की समझ रखने वाले लोग भी थे. उनका मानना था कि नया अख़बार निकालना इसका विकल्प नहीं हो सकता क्योंकि पुलिस दमन के अलावा उसकी पहुंच सीमित होगी.

आमराय थी कांग्रेस के अधिकतर नेता भाषणों के ज़रिए लोगों से सीधा संवाद करते हैं इसलिए उनकी आवाज़ आम लोगों तक पहुंचाना बेहतर विकल्प होगा.

हालांकि महात्मा गांधी की आवाज़ बहुत अच्छी नहीं थी, शब्दों के चयन और उनके प्रति ईमानदारी इतनी पारदर्शी थी कि बात सीधे लोगों के दिलों में उतर जाती थी. नेहरू, बोस और पटेल ने वक्तृत्व कला में महारत हासिल कर ली थी. कांग्रेस के कुछ युवा नेता जनता से सीधा संवाद करते थे. लोहिया प्रभावशाली वक्ता के रूप में सबसे आगे थे.

लेकिन बीस से तीस साल की उम्र की उस युवा ब्रिगेड को रास्ता मिल गया. बैठक में मुख्य रूप से चार लोग थे- बाबूभाई खाखड़, विट्ठलदास झवेरी, ऊषा मेहता और नरीमन अबराबाद प्रिंटर.

'द वॉयस ऑफ़ फ्रीडम'

इमेज कॉपीरइट Getty Images

सबकी नज़रें प्रिंटर पर थीं. इंग्लैंड से रेडियो टेक्नोलॉजी सीखकर आया प्रिंटर ट्रांसमीटर बनाने के लिए तैयार हो गया, प्रसारण का कोई अनुभव न होने के बावजूद बाईस बरस की ऊषा मेहता और एक अन्य प्रसारक बनने को राज़ी हो गए और कांग्रेस कार्यकर्ता अजित देसाई ने मदद की.

रेडियो स्टेशन का नाम 'द वॉयस ऑफ़ फ्रीडम' रखा गया और थोड़ी हीला-हवाली के बाद उसी दिन प्रिंटर ने गराज से निकला अपना पुराना ट्रांसमीटर जोड़-तोड़कर उपयोग लायक बनाना शुरू कर दिया.

उस समय तक रेडियो से जुड़े कुछ अन्य तथ्यों पर नज़र डालना दिलचस्प होगा. 'एंपायर रेडियो' पर समाचारों के पहले प्रसारण के चार साल बाद रेडियो भारत पहुंच गया. इसी का नाम बदलकर बाद में बीबीसी हो गया.

पहले दो रेडियो स्टेशन बंबई और कलकत्ता में लगाए गए और कुछ जगह निजी लोगों को प्रसारण के अधिकार दिए गए. मद्रास रेडियो निजी लाइसेंस पर पहले से चल रहा था.

'यह कांग्रेस रेडियो है'

प्रिंटर के पास रेडियो ट्रांसमीटर लगाने का लाइसेंस था, लेकिन दूसरा विश्वयुद्ध शुरू होते ही सारे निजी लाइसेंस ज़ब्त कर लिए गए. आदेश था कि सभी ट्रांसमीटर नष्ट कर दिए जाएं और उन्हें थाने में जमा करा दिया जाए.

बाबूभाई को मालूम था कि प्रिंटर ने अपना ट्रांसमीटर नष्ट तो किया पर थाने में जमा नहीं किया है. बाबूभाई की मदद से नए पुर्ज़े खरीदे गए और प्रिंटर ने ट्रांसमीटर चार दिन में, 13 अगस्त को तैयार कर दिया.

उसी रात ट्रांसमीटर को चौपाटी में 'सी व्यू बिल्डिंग' में किराए के घर तक ले जाया गया. तेरह अगस्त की रात प्रायोगिक तौर पर उसे चलाया गया और 14 अगस्त को प्रसारक की आवाज़ गूंजी: 'यह कांग्रेस रेडियो है. 42.34 मीटर बैंड्स पर आप हमें भारत में किसी स्थान से सुन रहे हैं.'

रेडियो के मुखिया लोहिया के लिए जवाबदेह

इमेज कॉपीरइट Getty Images
Image caption प्रतीकात्मक तस्वीर

यह आवाज़ ऊषा मेहता की नहीं थी. सरकारी और अदालती दस्तावेजों में दर्ज है कि यह प्रसारण प्रिंटर के साथ अपना नाम ज़ाहिर न करने की शर्त पर 'किसी पारसी महिला' ने किया. ऊषा मेहता ने चार दिन बाद ज़िम्मेदारी संभाली और गिरफ़्तारी तक उसे निभाया.

प्रसारण शुरू होने पर कांग्रेस के कुछ नेताओं ने 'द वायस ऑफ़ फ्रीडम' से संपर्क किया. कुछ ही दिन में उनकी भेंट राममनोहर लोहिया से हुई. लोहिया ने उनकी मदद की. मधु लिमये के मुताबिक़ 'बाद के दिनों में रेडियो के मुखिया सिर्फ़ लोहिया के प्रति जवाबदेह थे. आवश्यक धन उन्हीं से मिलता था.'

कांग्रेस रेडियो का प्रसारण बमुश्किल 80 दिन चला. पुलिस की दबिश लगातार जारी थी और इन अस्सी दिनों में ट्रांसमीटर छह अलग-अलग जगहों पर ले जाना पड़ा. पहले चौपाटी में सी व्यू बिल्डिंग, फिर वालकेश्वर रोड पर रतन महल और वहां से अजित विला होते हुए गिरगांव बैंक रोड पर पारेख वाड़ी.

प्रिंटर बन गए सरकारी गवाह

आख़िरी मुकाम महालक्ष्मी के पास पैराडाइज़ बंगला था. यहीं पुलिस ने 12 नवंबर, 1942 को छापा मारकर कांग्रेस रेडियो के सारे लोगों को गिरफ़्तार किया. अजित विला पर छापे के दौरान पुलिस ने प्रिंटर को गिरफ़्तार कर लिया था. पूछताछ में वह टूटकर मुख़बिर बन गया.

पुलिस ने मामले की जांच पूरी की. मामला अदालत में पेश हुआ तो उसमें पांच लोगों के नाम थे. विशेष न्यायाधीश जस्टिस एनएस लोकुर की अदालत में सुनवाई हुई और 14 मई, 1943 को फ़ैसला आया.

जज ने बाबूभाई खाखड़, चंद्रकांत झवेरी और ऊषा मेहता को जेल की सज़ा सुनाई, लेकिन विट्ठलदास झवेरी और शिकागोराडियो कंपनी के नानक मोटवानी को सारे आरोपों से बरी कर दिया.

न्यायमूर्ति लोकुर ने कहा, "अफ़सोस की बात है कि मामले के सबसे प्रमुख किरदार नरीमन प्रिंटर को मैं सज़ा नहीं दे पा रहा हूं. सारा किया-धरा उसका था, लेकिन वह सरकारी गवाह बन गया."

(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉयड ऐप के लिए यहां क्लिक करें. आप हमें फ़ेसबुक और ट्विटर पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)

मिलते-जुलते मुद्दे