#70yearsofpartition: 'न भारत में, न पाकिस्तान में...'

नाव

गनिये के बेट का सफ़र लंबा है. पहले रावी की तेज़ धार, फिर नदी के किनारे फैली रेत. और हां, बॉर्डर सिक्योरिटी फ़ोर्स की पोस्ट भी तो है, जहां मौजूद जवान आपकी पहचान रजिस्टर में दर्ज करते हैं.

इन सबको लांघते और बचते-बचाते जब हम जसवंत सिंह 'फ़ौजी' के घर पहुंचे तो मुस्कुराते हुए वो कहते हैं, "बोलते हैं न दूर कौन जो दरिया के पार. कब बेड़ी पड़े, कब पानी आ जाए. कोई पता नहीं. एक मौत क़ुदरत देती है, यहां हर रोज़ मौत होती है."

'फ़ौजी' तक पहुंचने के लिए हमें तक़रीबन किलोमीटर भर लंबी फैली लाल रेत के मैदान को पहले पैदल और फिर मोटरसाइकिल पर सवार होकर पार करना पड़ा. नाव की सवारी से छुटकारा भला कैसे मुमकिन था!

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Image caption अपने ट्रैक्टर पर सवार जसवंत सिंह 'फ़ौजी'

पाकिस्तान का नारोवाल शहर

"दिक्क़तें बहुत हैं, बताने से बाहर हैं. सही पूछो न, तो दिक्क़तें इतनी हैं कि इंसानी ज़िंदगी ख़त्म हो जाती है." फ़ौजी ये बात भी दूसरी बातों की तरह लबों पर दबी-दबी सी मुस्कुराहट के साथ कह जाते हैं लेकिन उनकी बात पूरी होने तक ये बात समझ में आ जाती है कि इन हालात में मुस्कुराना आसान नहीं.

पाकिस्तान की सीमा पर बसे गनिये के बेट से सबसे नज़दीक हिंदुस्तानी शहर डेरा बाबा नानक, जो उसकी तहसील भी है, 14 किलोमीटर दूर है. पुरानी तहसील बटाला तो 30 किलोमीटर से भी ज़्यादा दूर थी.

पाकिस्तान का नारोवाल शहर यहां से महज़ आठ किलोमीटर के फ़ासले पर है.

सैलाब के दिनों में जब रावी उफ़ान पर होती है तो गनिये का बेट भारत से कटकर 'नो मैंस लैंड' में तब्दील हो जाता है. यहां पाकिस्तान से लगी सीमा पर कंटीले बाड़ लगे हैं.

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बहुत मुसीबत है...

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सैलाब के दिनों में जब रावी उफ़ान पर होती है तो गनिये का बेट 'नो मैंस लैंड' बन जाता है.

सरपंच सुखदेव सिंह कहते हैं, "जब बाढ़ आती है तो हमारा पेंड हिंदुस्तान से कट जाता है. कोई उधर अटका रहता है कोई इधर अटका रहता है. बहुत मुसीबत है जी उन दिनों में."

और अगर कोई बीमार पड़ जाये तो? सुखदेव सिंह कहते हैं, ''बीमार, फिर तो रब के आसरे है जी."

गांव के अस्पताल के आगे हमें मेजर सिंह मिलते हैं जिन्हें एक एकड़ ज़मीन में धान की बुआई के लिए 2500-2600 रुपये मिल रहे हैं.

पूछने पर कहते हैं कि ये 'बॉर्डर एरिया का रेट' है. दूसरी जगहों पर उन्हें इसी काम के 2200 रुपये मिलेंगे. अगर तार के पार जाएंगे तो रेट और बढ़ जाते हैं - 2800 तक.'

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Image caption यहां एक एकड़ ज़मीन में धान की बुआई के लिए 2500-2600 रुपये मिल जाते हैं

मज़दूरी की मांग

गुरु इक़बाल सिंह कहते हैं कि सीमावर्ती इलाक़ा होने की वजह से यहां मज़दूरों का पहचान पत्र बनवाने और सिक्यूरिटी के दूसरे झंझटों में कोई नहीं फंसना चाहता.

वह कहते है, 'पहले तो यहां कोई आने को तैयार नहीं होता है और आने पर ज़्यादा मज़दूरी की मांग करता है.'

मंडी गांव से लगभग 20 किलोमीटर दूर है. माल को पहले नाव पर डालकर नदी पार करनी होती है, तब जाकर फिर मंडी पहुंचते हैं. इससे खेती में आनेवाला ख़र्च बढ़ जाता है.

सुखदेव सिंह कहते हैं, 'देखिये इस बार नाव छोटी है. ट्रैक्टर लोड नहीं होता है और मोटरसाइकिल चढ़ाने में भी दिक्क़त होती है.'

वो सवाल करते हैं, 'अब अगर ट्रैक्टर ख़राब हो जाए तो उसे ठीक करवाने के लिए दूसरी तरफ कैसे ले जाएं?'

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Image caption अस्पताल की हालत कुछ ऐसी है

स्कूल की हालत

मज़दूरों ने सामान अस्पताल के बरामदे में रखा हुआ है. बिल्कुल सामने एक छोटा सा टेंट भी लगाया गया है.

अस्पताल के कमरों के दरवाज़ों में हल्के ज़ंग लगे ताले पड़े हैं - जैसे काफ़ी दिनों से खुले ही न हों.

ग्रामीण अमरीक सिंह कहते हैं, "डाक्टर दो चार महीनों में दो-एक घंटों के लिए आ जाते हैं. जब दिल हुआ आए, जब दिल नहीं हुआ नहीं आए."

मवेशी अस्पताल और गांव के स्कूल की हालत भी अस्पताल से अलग नहीं है.

कुलजीत सिंह कहते हैं कि उनकी बच्ची तो धर्मकोट पढ़ने जाती है, लेकिन गांव के सभी बच्चे बाहर नहीं जा सकते हैं. सबके पास उतने पैसे नहीं हैं."

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Image caption रावी में उफ़ान आने पर कट जाता है यह गांव

साक्षरता दर

सीमावर्ती इलाक़े में साक्षरता की दर पंजाब के दूसरे इलाकों की बनिस्बत ... कम है.

जाने माने समाजशास्त्री प्रोफेसर जगरुप सिंह शेखों के ज़रिये की गई एक स्टडी में कहा गया है कि बार्डर एरिया में साक्षरता की दर पंजाब के दूसरे इलाक़ों से कम है.

सीमा के क्षेत्र में किए गए शोध में ये सामने आया कि इनमेंं साक्षरता की दर इनके ज़िलों के अंदरूनी इलाक़ों से भी कम है.

जैसे 2001 की जनगण्ना के अनुसार जहां अम़तसर और फिरोज़पुर में साक्षरता दर 67.85 फ़ीसद और 61.4 फ़ीसद थी.

इन्हीं ज़िलों के बार्डर क्षेत्र में इनका प्रतिशत 56 और 57.6 प्रतिशत पाया गया.

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Image caption लोगों को लंबे समय से पुल तैयार न होने पाने का मलाल है

डेरा बाबा नानक में...

अवतार सिंह इसी गांव के हैं और आजकल वो छुट्टियों में दुबई से, जहां वो ट्राली चलाते हैं, गांव आए हैं.

वो कहते हैं, पहले यहां सात गांव होते थे लेकिन अब सिर्फ गनिये के बेट ही बच गया है.

कहते हैं यहां सिर्फ बूढ़े-बूढ़े लोग रह गये हैं जो घरों की देखभाल कर रहे हैं. बाक़ी लोग शिफ्ट हो गए हैं, जो सुबह आते हैं शाम को चले जाते हैं

अवतार सिंह ख़ुद परिवार के साथ डेरा बाबा नानक में रहते हैं.

भारतीय सेना की सेवंथ कैवेलरी का हिस्सा रहे जसवंत सिंह फ़ौजी के बेटे भी बटाला शिफ्ट हो चुके हैं. वहां वो स्कूल चलाते हैं.

बंटवारे के बाद ना पाकिस्तान खुश ना भारत

आख़िरी वक्त पर क्यों बदली पंजाब की लकीर?

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70 साल पहले एक शख्स को एक मुल्क के बंटवारे की जिम्मेदारी दी गई थी.

मगर जसवंत कहते हैं उन्हें यहां की आदत हो गई है.

कभी टैंक चलाने वाले जसवंत सिंह पूरे इलाक़े में अपना ट्रैक्टर दौड़ाते रहते हैं.

हमें भी उसपर बिठाकर वो पुल दिखाने ले जाते हैं जो सालों से तैयार हो रहा है और जिसके बनने के बाद यहां के लोगों की ज़िंदगियां आसान हो जाएंगी. लेकिन पुल है कि तैयार ही नहीं हो रहा...

हंसते हुए पंजाबी में वो एक कहावत सुनाते हैं- जितना आदमी तरक्की कर रहा है, दिक्कतें बढ़ती जा रही हैं. यह कहते वक़्त उनकी निगाह पुल की तरफ़ है.

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भारत-पाकिस्तान बंटवारे पर बीबीसी की स्पेशल सिरीज़- बंटवारे की लकीर

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