गोरखपुर त्रासदी: 'आठ साल बाद ज़ुड़वाँ बच्चे हुए थे, आठ दिन भी नहीं रहे'

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Image caption ब्रह्मदेव यादव के जुड़वाँ बच्चे.

गोरखपुर के बीआरडी अस्पताल में अपने जुड़वाँ बच्चों को ख़ोने वाले एक परिवार ने दर्द बयां किया है.

''एक हफ़्ता मेरे बच्चों को अस्पताल में भर्ती रखे, मुझे और बच्चों की माँ तक को मिलने नहीं दिया जाता था, रोज़ दो सीरिंज ख़ून निकालते थे डॉक्टर. ख़ून कम हो गया तो हमने अपना ख़ून दिया लेकिन फिर भी उन्हें बचा नहीं पाया.''

गोरखपुर के बाघागाड़ा गांव के रहने वाले ब्रह्मदेव यादव नौ अगस्त की रात को याद करते हुए रो पड़ते हैं.

पेशे से किसान तीस साल के ब्रह्मदेव यादव के क़रीब आठ साल बाद जुड़वाँ बच्चे पैदा हुए थे जिनमें एक बेटा था और एक बेटी थी.

पैदा होने के एक दिन बाद ही बुखार होने पर उन्होंने बच्चों को गोरखपुर के बीआरडी मेडिकल कॉलेज में दाख़िल कराया था.

ब्रह्मदेव यादव बताते हैं, ''प्राइवेट डॉक्टर बोले कि यहां ज़्यादा ख़र्चा लगेगा इसलिए हम मेडिकल कॉलेज ले गए. वहां डॉक्टरों ने आईसीयू में भर्ती कर लिया. लेकिन हम लोगों को वहां जाने नहीं देते थे.''

''ये पूछने पर कि क्या हुआ है, कुछ बताते भी नहीं थे. नौ तारीख़ को रात आठ बजे अचानक एक डॉक्टर बाहर आए और बोले के तुम्हारा बेटा मर गया है और बेटी की हालत भी गंभीर है.''

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Image caption ब्रह्मदेव यादव

''सभी बच्चों को लगे थे ऑक्सीजन बैग''

ब्रह्मदेव यादव कहते हैं कि उसके बाद भी डॉक्टर ने बच्चे के मरने की वजह नहीं बताई और देर रात मेरी बेटी भी की मौत हो गई.

ब्रह्मदेव यादव के दोनों बच्चे भी बीआरडी मेडिकल कॉलेज के उसी वॉर्ड में भर्ती थे जहां नौ और दस तारीख़ को दर्जनों बच्चों ने कथित तौर पर ऑक्सीजन की कमी से दम तोड़ दिया था.

ये वही दिन था जब उसी मेडिकल कॉलेज में मुख्यमंत्री आदित्यनाथ योगी समीक्षा बैठक करने गए थे. गोरखपुर मुख्यमंत्री का गृह जनपद भी है और लंबे समय तक वो यहां से सांसद रहे हैं.

ब्रह्मदेव यादव बताते हैं कि वॉर्ड में क़रीब डेढ़ सौ बच्चे भर्ती थे और उनमें से सभी बच्चों के मुंह में ऑक्सीजन का बैग लगा था.

उनके मुताबिक़, ''ऑक्सीजन की बात किसी को बताई नहीं गई थी, लेकिन मेरी बच्ची के मुंह से जब ख़ून निकलने लगा तो समझ में आया कि वो दम घुटने से मरी है. इसी तरह दूसरे बच्चों की भी मौत हुई. सब रोते-चिल्लाते बच्चों को गोद में लेकर घर जा रहे थे, और करते भी क्या?''

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''डांटते थे डॉक्टर''

ब्रह्मदेव यादव चार भाई हैं और सभी या तो खेती करते हैं या फिर छोटा-मोटा काम करके आजीविका चलाते हैं.

उनकी माँ बताती हैं कि ब्रह्मदेव की पत्नी इस घटना के बाद से ही विक्षिप्त जैसी हो गई है.

वो कहती हैं, ''आठ साल बाद भगवान ने हमारे घर में आम और इमली दोनों दिया, लेकिन हम लोग उन बच्चों के साथ दो दिन भी नहीं रह पाए.''

उन्होंने कहा, ''डॉक्टरों ने न तो ठीक से इलाज किया, न माँ-बाप को बच्चों से मिलने दिया और न ही उन लोगों का व्यवहार ठीक था. बहुत गंदे तरीक़े से बात करते थे और कुछ भी पूछने पर डाँट देते थे. बहू हमारी जैसे पगला गई है, किसी से बात ही नहीं कर रही है.''

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Image caption ब्रह्मदेव यादव की मां ने अस्पताल प्रशासन को कोसा

''हमें पता भी नहीं कैसे मरे बच्चे''

दस अगस्त के बाद गोरखपुर मेडिकल कॉलेज में बच्चों की मौत की ये घटना सुर्खियों में आ गई और फिर राजनीतिक दलों के नेताओं का भी मेडिकल कॉलेज का दौरा शुरू हो गया.

घटना के दो दिन बाद मुख्यमंत्री योगी भी आए और मुख्य सचिव के नेतृत्व में जांच के आदेश देकर गए, लेकिन पीड़ित परिवारों से न तो मिलने गए और न ही उनका कोई हाल लिया.

अस्पताल में आस-पास के ज़िलों के अलावा बिहार के भी कई ज़िलों से लोग गोरखपुर मेडिकल कॉलेज में इलाज के लिए आते हैं, ख़ासकर इंसेफ़ेलाइटिस के इलाज के लिए.

ब्रह्मदेव यादव कहते हैं कि उन्हें तो पता भी नहीं कि उनके बच्चे इंसेफ़ेलाइटिस के कारण मरे या फिर और किसी वजह से.

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Image caption ब्रह्मदेव यादव के गांव का हाल

कौन देगा जवाब?

बीबीसी से बातचीत में उन्होंने कहा, ''दोनों बच्चों को हमने घर के पास में ही दफ़नाया है और ज़रूरत पड़ने पर उनका पोस्टमॉर्टम कराने को भी तैयार हूं.''

दरअसल, इस घटना पर कई तरह के सवाल उठ रहे हैं जिनमें ऑक्सीजन सप्लाई की कमी, सप्लाई करने वाली कंपनी को अस्पताल प्रशासन की ओर से पैसा न देने का मामला और अस्पताल और डॉक्टरों की लापरवाही भी शामिल है.

मुख्यमंत्री की बनाई गई जांच टीम इन सारे मामलों की जांच करेगी और क्या सुधार किए जाएं, इस पर भी रोशनी डालेगी. लेकिन जिन लोगों ने अपने मासूमों को खो दिया है, उसकी क्षतिपूर्ति कैसे होगी, इसका जवाब शायद ही कोई दे सके.

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