झारखंड में बीजेपी ने ज्यां द्रेज को बोलने क्यों नहीं दिया?

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Image caption कार्यक्रम के दौरान केंद्रीय कृषि मंत्री राधा मोहन सिंह के पीछे खड़े हैं ज्यां द्रेज

झारखंड की बीजेपी सरकार ने पहले अख़बारों में 11 अगस्त को धर्मांतरण के मुद्दे पर एक विज्ञापन दिया और उसमें गांधी को उद्धरित किया गया.

इसके अगले दिन 12 अगस्त को राज्य सरकार ने विवादास्पद धर्मांतरण पर रोक संबंधी विधेयक को विधानसभा में पारित कर दिया. इसके अगले दिन 13 अगस्त को रांची में प्रभात ख़बर अख़बार के एक कार्यक्रम में ज्यां द्रेज को बोलने से रोक दिया गया.

स्थानीय पत्रकार नीरज सिन्हा के मुताबिक इस आयोजन में अर्थशास्त्री ज्यां द्रेज ने राज्य की मौजूदा स्थिति पर बात करते हुए राज्य सरकार के इस विज्ञापन पर आपत्ति जताते हुए यह कहा की कि गांधी को ग़लत उद्धरित किया गया है, तो कार्यक्रम में मौजूद राज्य के कृषि मंत्री रणधीर सिंह भड़क गए.

वे ज्यां द्रेज को कार्यक्रम से हटाने की बात कहने लगे. इसके साथ ही वहां मौजूद बीजेपी के कई नेता- कार्यकर्ता भी ज्यां द्रेज का विरोध करने लगे.

नीरज सिन्हा के मुताबिक इसके बाद ज्यां द्रेज को बोलने नहीं दिया गया और केंद्रीय कृषि मंत्री राधा मोहन सिंह ने उनके हाथ से माइक लेकर ग़ुस्साए मंत्री और बीजेपी नेताओं को शांत कराने की कोशिशें की.

इसके बाद केंद्रीय मंत्री ने 'हरिजन पत्रिका' के हवाले गांधी जी के उद्धरण की चर्चा की और उसी आधार पर कई बार कहा कि सरकार का विज्ञापन सही है. इस कार्यक्रम में राज्य के मुख्यमंत्री रघुवर दास और पूर्व मुख्यमंत्री बाबू लाल मरांडी भी मौजूद थे.

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इस पूरे मामले पर बीबीसी ने ज्यां द्रेज से कुछ सवाल पूछे जिसका उन्होंने जवाब दिया.

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Image caption ज्यां द्रेज पर कार्यक्रम में मौजूद राज्य के कृषि मंत्री रणधीर सिंह बिगड़ गए

क्या है पूरा मामला? आप क्या मुद्दा उठाना चाहते थे?

मैं प्रभात ख़बर द्वारा आयोजित कॉनक्लेव "झारखंड 2025" में बोल रहा था. झारखंड जिन चुनौतियों का सामना कर रहा है उनमें से एक सांप्रदायिकता पर मैंने चर्चा की.

मैंने दलील दी कि जब राज्य खुद ही विभिन्न समुदायों के बीच मनमुटाव पैदा कर रहा हो, तो सांप्रदायिकता विशेष रूप से ख़तरनाक है. इसे समझने के लिए, मैंने हाल ही में झारखंड सरकार के उस पूरे पेज के विज्ञापन की चर्चा की जिसमें महात्मा गांधी की बात का ग़लत हवाला दिया गया है.

इस विज्ञापन ने ईसाइयों के ख़िलाफ़ लोगों को, ख़ास तौर पर आदिवासियों को भड़काने का काम किया. कथित उद्धरण, जो न केवल मिशनरियों के लिए बल्कि दलितों और आदिवासियों के लिए अपमान है, वास्तव में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) के प्रचारक देवेंद्र स्वरूप की किताब से लिया गया है.

इस विज्ञापन की भ्रामक प्रकृति का "द वायर" में अपूर्वानंद ने बढ़िया विश्लेषण किया है.

स्थिति कब नियंत्रण से बाहर हो गई?

हालात तब बेकाबू हो गए जब मैंने कहा कि गांधी का ग़लत उद्धरण दिया गया है. लेकिन मंत्री रणधीर सिंह को क्या परेशानी हुई इसका मुझे पता नहीं, जिन्होंने विरोध का नेतृत्व किया और मुझसे माफ़ी मांगने की मांग की.

बाद में एक इंटरव्यू के दौरान उन्होंने आरएसएस पर मेरी टिप्पणी की जिस आधार पर आपत्ति की उसकी मुझे कोई जानकारी नहीं थी. मुझे आरएसएस के विषय में अधिक जान कर ख़ुशी होगी, लेकिन मैं पहले से ही वीर सावरकर और एम. एस. गोलवलकर जैसे उनकी विचारधारा से जुड़ी किताबें पढ़ रखा हूं.

ये हिन्दू राष्ट्रवाद के संस्थापक हैं, जो आज की तारीख़ में आरएसएस के सिद्धांत हैं और झारखंड सरकार की नीतियों पर इनका काफ़ी मज़बूत प्रभाव लगता है. अल्पसंख्यकों के ख़िलाफ़ झारखंड सरकार के हालिया कार्यों जैसे, इस विज्ञापन का प्रकाशन और बूचड़खानों पर कार्रवाई को देखकर मुझे लगता है कि राज्य की नीतियां आरएसएस की विचारधारा से प्रभावित हैं.

मैं ग़लत हो सकता हूं, और अगर ऐसा है तो अलग विचारों को सुनें, लेकिन हमें ऐसे मुद्दों पर कम से कम चर्चा करने से तो डरना नहीं चाहिए.

Image caption दैनिक भास्कर समेत कई अख़बारों में 11 अगस्त को झारखंड सरकार द्वारा दिया गया विवादित विज्ञापन

क्या आपको वहां अपनी सुरक्षा का ख़तरा भी महसूस हुआ?

नहीं. अगर वहां किसी को ख़तरा है तो मुझे नहीं बल्कि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को है. केंद्रीय मंत्री राधा मोहन सिंह ने विरोधियों को शांत रहने को कहा, लेकिन इसके बाद उन्होंने मेरे कहे का विरोध किया और मुझे भाषण को समाप्त करने का अवसर तक नहीं दिया.

अगले वक्ता जयंत सिन्हा मामले को ठंडा करने के लहजे में बोले, लेकिन उन्होंने तर्क दिया कि मैं बोलने के दौरान बहुत आगे निकल गया जबकि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की अपनी सीमा होती है.

वहां प्रभात ख़बर के पूर्व संपादक और राज्यसभा के वर्तमान सांसद हरिवंश ही केवल ऐसे व्यक्ति थे जिन्होंने अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के अधिकार का बचाव किया. यह घटना असहमति की आवाज़ के प्रति न केवल झारखंड बल्कि देश के अन्य जगहों पर भी बढ़ते असहिष्णुता का एक और उदाहरण है.

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