अटल यूनिवर्सिटी में टूटा हिन्दी का तिलिस्म?

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अटल बिहारी वाजपेयी हिंदी विश्वविद्यालय देश का एकमात्र ऐसा विश्वविद्यालय है जहां हिंदी में इंजीनियरिंग की पढ़ाई कराई जाती है. इसकी शुरुआत पिछले साल से की गई थी.

लेकिन अब प्रतीत होता है कि हिंदी में इंजीनियरिंग करने में किसी की भी रुचि नही है. पिछले साल जहां 8 बच्चों ने प्रवेश लिया था वही इस साल कोई भी दाखिला नही हुआ है.

इंजीनियरिंग के तीन पाठ्यक्रमों- सिविल, इलेक्ट्रिकल और मैकेनिकल के लिए 30-30 सीटें निर्धारित की गई थी. इन कोर्स में पिछले साल 8 छात्रों ने प्रवेश लिया था. लेकिन परीक्षा मात्र चार छात्रों ने ही दी. इस साल पहले सेमेस्टर में प्रवेश के लिए कोई भी छात्र नही आया है.

इस विश्वविद्यालय में पढ़ रहे छात्र संजय झा इसकी वजह कुछ और ही मानते है. उन्होंने बीबीसी को बताया, "हिंदी माध्यम से पढ़ाई करने वालों की कोई कमी नही है. लेकिन विश्वविद्यालय ने प्रचार-प्रसार सही तरीक़े से नही किया है. यही वजह है कि लोगों को मालूम ही नही है कि कोई ऐसा भी विश्वविद्यालय है जहां पर पूरी पढ़ाई हिंदी में कराई जाती है."

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'हिंदी में नौकरी के अवसर कम'

वही विश्वविद्यालय के कुछ छात्रों का यह भी मानना है कि हिंदी माध्यम से पढ़ने की वजह से नौकरी के अवसर कम हो जाते है. इस विश्वविद्यालय में पढ़ रही छात्रा प्राची ने बताया, "हां, यह बात सही है कि हिंदी की वजह से नौकरी मिलने में ज़रूर दिक्क़त होती है. यही वजह है कि कई छात्रों को पढ़ाने का अवसर इसी विश्वविद्यालय में मिल सकता है."

विश्वविद्यालय के कोर्डिनेटर ब्रज मोहन बुधोलिया मानते है कि विश्वविद्यालय अपने उद्देश्य को पाने में काफ़ी हद तक सफल हो चुका है.

उन्होंने कहा, "ऐसे बहुत से विषय हैं जिन्हें हिंदी माध्यम वाले लड़के पढ़ने के लिए प्रवेश तो ले लेते थे लेकिन कुछ ही वक़्त बाद असफल होकर छोड़ देते है. लेकिन इस विश्वविद्यालय में उन्हें अपने मनपसंद विषय को मातृभाषा में पढ़ने का मौक़ा मिल रहा था."

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सुविधाओं की कमी

विश्वविद्यालय के कुलपति प्रोफ़ेसर रामदेव भारद्वाज मानते है कि इंजीनियरिंग के छात्रों के लिये विश्वविद्यालय में सही व्यवस्था नही होने की वजह से प्रवेश लेने में छात्रों की ज्यादा रुचि नही है. लेकिन इसके बावजूद भी वो लोग कोशिश कर रहे है कि इसमें प्रवेश बढ़े.

उन्होंने बताया," इस बात को मानने में कोई बुराई नही है कि इंजीनियरिंग की पढ़ाई में ज़्यादा बच्चें नही हैं. इसकी वजह यह है कि हमारे पास प्रयोगशाला नही है. वहीं शिक्षक भी उस अनुपात में नही है. हिंदी में सामग्री छात्रों को उपलब्ध कराई गई है लेकिन अभी वैसी व्यवस्था नही है जैसी होनी चाहिए."

अटल बिहारी वाजपेयी हिन्दी विश्वविद्यालय की स्थापना 2011 में की गई थी. लेकिन अभी यह विश्वविद्यालय किराए की बिल्डिंग में चल रहा है. इसका प्रशासकीय परिसर और शैक्षणिक परिसर अलग-अलग है.

वही इसकी शैक्षणिक परिसर की स्थिती भी ख़राब है. इससे पता चलता है कि सरकार ने भले ही निजी विश्वविद्यालय की स्थापना तो कर दी लेकिन सुविधाएं उपलब्ध नही कराईं.

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