नज़रिया: 'नरेंद्र मोदी का वो इंटरव्यू तो प्रसारित हुआ था'

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सामान्य तौर पर, कोई शख़्स साढ़े चार साल तक जिस संस्था का नेतृत्व कर चुका हो वह उससे जुड़े किसी विवाद से दूर ही रहना चाहेगा, लेकिन जब मामला भारत की लोकतांत्रिक परंपराओं और इसकी संघीय राजनीति से जुड़ा हो तो मैं इस मामले में कुछ बातें स्पष्ट करना चाहता हूं.

जो हो रहा है, वो इमरजेंसी के समय होता था: माणिक सरकार

आरोप ये है कि भारत के सार्वजनिक प्रसारणकर्ता ने त्रिपुरा के मुख्यमंत्री का स्वतंत्रता दिवस पर दिया उनका भाषण प्रसारित करने से मना कर दिया.

जो सवाल सबसे पहले हमारे दिमाग़ में आता है, वह यह कि क्या ऐसा करना सार्वजनिक प्रसारणकर्ता के दायरे में आता है.

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Image caption माणिक सरकार

वाजपेयी के समय भी नहीं लगी रोक

मेरे कार्यकाल के दौरान मुझे ऐसी कोई भी घटना याद नहीं आती जब किसी मुख्यमंत्री के भाषण पर सवाल उठाए गए हों या उसमें कांट-छांट की गई हो. पहले के शासन के दौरान ऐसी निगरानी या प्रयास वहां नहीं दिखाई देता है.

अटल बिहारी वाजपेयी के कार्यकाल समेत पिछली सरकारों के दौरान भी ऐसा देखने को नहीं मिलता जब राजनीतिक रूप से सतर्क रहे हों या किसी विपक्ष के नेता द्वारा आलोचना करने पर उसको कष्ट पहुंचाया गया हो. इसका साफ़ मतलब है कि संघवाद पर्याप्त स्थान दिए जाने की जो मांग करता है, उसको लेकर वे अधिक सहिष्णु या अधिक सतर्क थे.

इसके अलावा, लोकतंत्र यह भी मानता है कि विपरीत आवाज़ें जो कड़वी भी हों उसे सुना जाना चाहिए. इसलिए हमारी नज़र में यह घटना कम से कम पहला मामला ज़रूर है.

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निष्पक्ष रहने के लिए सुप्रीम कोर्ट ने कहा

सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय से संबंधित एक मामले में 1995 में जस्टिस सावंत की सुप्रीम कोर्ट बेंच ने ऐतिहासिक फैसला सुनाया था. उसमें कहा गया था, "यह लाज़िमी है कि संसद एक सार्वजनिक या कॉर्पोरेट कंपनी के हाथों में प्रसारण मीडिया को रखने का कानून बनाती है... तो ऐसा आवश्यक है कि उसका संविधान और संयोजन राजनीतिक, आर्थिक, सामाजिक और दूसरे सभी सार्वजनिक मामलों में अपनी निष्पक्षता सुनिश्चित करे."

इसके बाद प्रसार भारती एक्ट लागू हुआ और अब इस संस्था को यह सुनिश्चित करना है कि यह क़ानूनी संस्था के तौर पर बरक़रार रहे जिसको बड़ी चालाकी से बदला जा रहा है. त्रिपुरा के मुख्यमंत्री के भाषण का मामला एक नमूना है और यह दिखाता है कि सार्वजनिक प्रसारणकर्ता को किस तरह प्रभावित किया जा रहा है.

तथ्य यह है कि दूरदर्शन और आकाशवाणी मुख्यमंत्री का स्वतंत्रता दिवस पर दिया संबोधन प्रसारित करते हैं इसका मतलब ये नहीं है कि वे वे उसका प्रसारण रोक सकते हैं.

मुख्यमंत्री के बयान में 'साज़िश' जैसे शब्द

सुप्रीम कोर्ट ने सार्वजनिक प्रसारणकर्ता को साफ़ निर्देश दिए थे कि बहुलवाद विचार और उसकी विविधता सुनिश्चित होनी चाहिए और इस माध्यम का लाभ उठाने के लिए सभी नागरिकों और समूहों को समान अवसर प्रदान करें.

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इस संदर्भ में देखें तो कड़े शब्दों का प्रयोग करने वाले मुख्यमंत्री के भाषण को कैसे दिखाया जाए, इसके लिए कोई विशेष प्रक्रिया नहीं है. बशर्ते वह जो कह रहे हैं, वह ठीक हो.

इसमें एक दुखद तथ्य यह भी शामिल है कि देश के सत्तारुढ़ दल को जिस संगठन ने पैदा किया उसने कभी भारत के स्वतंत्रता संग्राम में भाग ही नहीं लिया. किसी को त्रिपुरा के मुख्यमंत्री के बयान में 'साज़िश' जैसे शब्दों का इस्तेमाल नज़र आ सकता है लेकिन उनकी कही अधिकांश बातें सत्य ही हैं.

उन्होंने कहा कि "धर्म, जाति और समुदाय के नाम पर हमारी राष्ट्रीय चेतना पर आक्रमण हो रहा है औऱ हमारे समाज में जटिलता और विभाजन पैदा करने के प्रयास किए जा रहे हैं." हालिया तथ्य और घटनाएं इस ओर ध्यान भी दिलाते हैं.

'सोनिया परिवार पर मोदी ने बोला था'

इसी तरह की घटना का एक उदाहरण याद आता है. 2014 के आम चुनाव के दौरान दूरदर्शन ने नरेंद्र मोदी का इंटरव्यू किया था. वह उस समय विपक्ष के उम्मीदवार थे लेकिन अज्ञात कारणों से यह प्रसारित नहीं किया जा रहा था.

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सोनिया गांधी के परिवार पर मोदी के कुछ शब्दों के कारण दूरदर्शन के न्यूज़ विंग के महानिदेशक चिंतित हो गए थे लेकिन प्रसार भारती को इस बात का पता चला और हमने दूरदर्शन को इंटरव्यू प्रसारित करने के निर्देश दिए.

दूरदर्शन ने एडिट करके इंटरव्यू प्रसारित किया लेकिन बीजेपी ने इसे सेंसरशिप बताया था. इसके बाद दूरदर्शन ने लिखित निर्देश जारी कर कहा कि बिना एडिट किए इंटरव्यू प्रसारित किया जाए.

'बीजेपी आरएसएस की सम्पत्ति नहीं है दूरदर्शन'

यहां तक कि मोदी ने ख़ुद भी आपातकाल का जिक्र करते हुए सार्वजनिक प्रसारणकर्ता में पत्रकारिता की स्वतंत्रता में गिरावट की बात की है. उन्होंने विश्व प्रेस स्वतंत्रता दिवस पर ट्वीट कर कहा था कि उन्हें यह देखकर दुख होता है कि राष्ट्रीय चैनल अपनी पेशेवर स्वतंत्रता बनाए रखने के लिए संघर्ष कर रहा है.

यह ट्वीट 3 मई 2014 को किया गया था और तब से अब तक समय का पहिया पूरा घूम चुका है.

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