नज़रियाः बंगाल में विपक्ष की कुर्सी की ओर बढ़ती भाजपा

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कई बार छोटी-छोटी बातें भविष्य की बड़ी घटनाओं का संकेत देती हैं. राजनीति के क्षेत्र में भी यही बात लागू होती है. पश्चिम बंगाल में सात शहरी निकायों के लिए हाल में हुए चुनावों के नतीजों को भी इसी संदर्भ में देखा जा सकता है.

वैसे, जिस राज्य में सात नगर निगम और 119 नगरपालिकाएं हों, वहां सात नगरपालिकाओं के चुनावी नतीजे कोई ख़ास मायने नहीं रखते. लेकिन कई लिहाज़ से इन नतीजों के गहरे निहितार्थ हैं.

इन नतीजों ने जहां साफ़ कर दिया है कि तमाम आरोपों और घोटालों के बावजूद सत्तारूढ़ तृणमूल कांग्रेस के पैरों तले की ज़मीन बेहद मज़बूत है. वहीं, विपक्ष की खाली कुर्सी पर धीरे-धीरे ही सही भाजपा का कब्ज़ा हो रहा है.

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Image caption टीएमसी की ज़मीन मज़बूत

वामपंथियों के लिए नहीं रहा बंगाल अब लालकिला?

यह विडंबना ही कही जाएगी कि लगभग साढ़े तीन दशकों तक बंगाल पर राज करने वाले वाममोर्चा को अब महज़ एक ही सीट मिली है. अभी ज़्यादा दिन नहीं हुए जब वामपंथियों के वर्चस्व के चलते बंगाल को लालकिला कहा जाता था. लेकिन अब हालत यह है कि इस मोर्चे की सबसे बड़ी पार्टी माकपा का ख़ाता तक नहीं खुल सका है.

उसकी झोली में आई इकलौती सीट भी सहयोगी फॉरवर्ड ब्लॉक को मिली है. कांग्रेस की हालत तो और बुरी है. इन चुनावों में उसका भी ख़ाता नहीं खुल सका है. उससे बेहतर प्रदर्शन तो निर्दलीय उम्मीदवारों का रहा है जिन्होंने कम से कम एक सीट तो जीती है.

बीते सप्ताह राज्य की सात नगरपालिकाओं की 148 सीटों पर वोट पड़े थे. इनमें से 140 सीटें जीतने वाली तृणमूल कांग्रेस ने तमाम नगरपालिकाओं पर कब्ज़ा कर अपना दबदबा बनाए रखा है. तृणमूल कांग्रेस के इस प्रदर्शन ने साफ कर दिया है कि राज्य की राजनीति में फिलहाल दूर-दूर तक उसका कोई विकल्प नहीं है.

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आरोपों के बावजूद टीएमसी पर भरोसा

इन चुनावों से पहले तृणमूल कांग्रेस नेताओं के दामन पर शारदा और नारदा घोटाले के दाग़ थे. विपक्ष ने इन मामलों को अपना चुनावी हथियार भी बनाया. बावजूद इसके वोटरों ने तृणमूल पर भरोसा करते हुए विपक्ष को नकार दिया.

हालांकि नतीजे सामने आने के बाद विपक्षी नेताओं ने इन चुनावों में तृणमूल कांग्रेस पर धन और बाहुबल का इस्तेमाल करने के आरोप लगाए हैं. लेकिन निजी बातचीत में कई विपक्षी नेता मानते हैं कि अगर ऐसा नहीं भी होता तो तस्वीर कमोबेश यही रहती.

तृणमूल कांग्रेस महासचिव पार्थ चटर्जी कहते हैं, "नतीजों से साफ़ है कि लोगों ने सरकार के विकास के दावों पर भरोसा जताया है. उन्होंने विपक्ष के आरोपों को ख़ारिज कर दिया है."

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Image caption पार्थ चटर्जी

जनादेश की सही तस्वीर

इन चुनावों ने वाममोर्चा और उसके सबसे बड़े घटक दल माकपा को भारी झटका दिया है. इससे एक बार फ़िर साबित हो गया है कि वर्ष 2011 से ही उसके पैरों तले ज़मीन खिसकने का जो सिलसिला शुरू हुआ था वह अब भी जस का तस है.

वैसे, माकपा नेताओं ने इन चुनावों को एक धोखा करार दिया है. विधानसभा में विपक्ष के नेता सुजन चक्रवर्ती कहते हैं कि यह नतीजे जनादेश की सही तस्वीर पेश नहीं करते. वह कहते हैं कि चुनाव मुक्त और निष्पक्ष नहीं थे. इसलिए पार्टी ने मतदान के फौरन बाद दोबारा चुनाव कराने की मांग उठाई थी.

वैसे, पार्टी के प्रदर्शन में लगातार आने वाली गिरावट को ध्यान में रखते हुए माकपा नेता के इन दावों में ख़ास दम नहीं नज़र आता.

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Image caption वामपंथी दलों का घट रहा दबदबा

148 में से एक भी सीट नहीं जीती माकपा

दरअसल, सत्ता से हटने के बाद नेतृत्व की कमी और सांगठनिक कमज़ोरी के चलते पार्टी का प्रदर्शन लगातार ख़राब हुआ है. हाल के वर्षों में वह कोई बड़ा आंदोलन खड़ा करने में नाकाम रही है. केंद्रीय नेतृत्व के साथ बढ़ते मतभेदों ने भी यहां नेताओं और कार्यकर्ताओं का मनोबल कमज़ोर किया है.

यही वजह है कि कभी अपने मज़बूत गढ़ रहे बंगाल में ही यह पार्टी राजनीति के हाशिए पर पहुंच गई है. 148 में से माकपा का एक सीट भी नहीं जीतना उसके भविष्य का गंभीर संकेत है. इन नतीजों के हवाले कांग्रेस पर अधिक चर्चा करना बेमानी है.

दलबदल और गुटबाज़ी की शिकार इस पार्टी ने वाममोर्चा से हाथ मिलाकर अपने पांव जमाने का प्रयास ज़रूर किया था. लेकिन शायद वह दांव उस पर उल्टा पड़ रहा है.

भगवा पार्टी

प्रदेश कांग्रेस अधीर चौधरी कहते हैं, "बंगाल में चुनाव कराना बेमतलब है. तृणमूल कांग्रेस यहां कभी मुक्त और निष्पक्ष चुनाव ही नहीं होने देगी."

इन नतीजों की सबसे अहम बात है, भाजपा का धीरे-धीरे विपक्ष की कुर्सी की ओर बढ़ना. वह अपने बूते छह सीटें जीतकर दूसरे नंबर पर रही है. वैसे, तृणमूल कांग्रेस की 140 सीटों के मुकाबले यह तादाद कहीं नहीं ठहरती. लेकिन आंकड़े अक्सर पूरी तस्वीर नहीं पेश करते.

विपक्ष के प्रदर्शन को ध्यान में रखते हुए मौजूदा परिदृश्य में इनकी काफ़ी अहमियत है. इसके साथ ही यह भी हक़ीक़त है कि 77 सीटों पर यह भगवा पार्टी दूसरे स्थान पर रही है.

प्रदेश भाजपा अध्यक्ष दिलीप घोष कहते हैं, "मुख्यमंत्री ममता बनर्जी हमेशा कहती थीं कि बंगाल में भाजपा ही उनकी प्रमुख दुश्मन है. अब नतीजों से यह बात साबित भी हो गई है."

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Image caption दिलीप घोष

बीजेपी ने जीती थीं लोकसभा की 2 सीटें

ख़ासकर उत्तर बंगाल की धूपगुड़ी नगरपालिका की 16 में से चार सीटों पर कब्ज़ा कर पार्टी ने वहां राजनीतिक समीकरण बदलने के ठोस संकेत दिए हैं. पहले उत्तर बंगाल में उसका कोई जनाधार नहीं था. अब धीरे-धीरे वहां भी वह मजबूत होने लगी है.

लेकिन भगवा पार्टी की सबसे बड़ी दिक्कत है संगठन की कमज़ोरी और मज़बूत नेतृत्व का अभाव. तृणमूल कांग्रेस नेता भाजपा के इस प्रदर्शन को ख़ास तवज्जो देने को तैयार नहीं हैं.

उत्तर बंगाल के तृणमूल नेता और पर्यटन मंत्री गौतम देब कहते हैं, "वाममोर्चा के तमाम वोट भाजपा की झोली में गए हैं. इससे साफ है कि इन दोनों दलों में गोपनीय तालमेल है."

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Image caption टीएमसी को चुनौती देना बीजेपी के लिए अभी भी आसान नहीं

2020 में होगा कोलकाता नगर निगम चुनाव

भाजपा यहां वाममोर्चा और कांग्रेस को पछाड़कर दूसरे स्थान पर भले पहुंच गई हो, उसके सामने वर्ष 2019 के लोकसभा चुनावों से पहले अपने वोटों को सीटों में बदलने की ठोस रणनीति बनाने की गंभीर चुनौती है. वर्ष 2014 के लोकसभा चुनावों में उसने 17 फीसदी वोट पाकर दो सीटें जीती थीं.

बीते साल विधानसभा चुनावों में उसे लगभग 10 फीसदी वोट मिले और उसके तीन विधायक जीते थे. अब धूपगुड़ी नगरपालिका चुनावों में उसे 41.59 फीसदी वोट और चार सीटें मिली हैं जबकि तृणमूल कांग्रेस ने 48.51 फीसदी सीट पाकर 12 सीटें जीती हैं.बंगाल में भाजपा का प्रदर्शन भले लगातार निखर रहा हो.

लेकिन अगले लोकसभा चुनावों में तृणमूल कांग्रेस के समक्ष कड़ी चुनौती पेश करने के लिए उसे पहले अपना संगठन मज़बूत करना होगा. राज्य में अब लगातार चुनाव होने हैं.

अगले साल पंचायत चुनावों के बाद 2019 में लोकसभा चुनाव, 2020 में मिनी विधानसभा चुनाव कहा जाने वाला कोलकाता नगर निगम चुनाव और फिर उसके अगले साल विधानसभा चुनाव. यानी विपक्ष की खाली कुर्सी पर पूरी तरह कब्ज़ा करने के लिए भाजपा के पास मौकों की कमी नहीं है.

अब यह देखना दिलचस्प होगा कि आने वाले चुनावों में वह इन मौकों को कितना भुना पाती है.

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