BBC SPECIAL: बड़ी तेज़ दौड़ रही है 'परेशानियों' की ट्रेन

भारतीय रेल इमेज कॉपीरइट Getty Images

संसद में पेश की गयी 'सीएजी' की रिपोर्ट ने भारतीय रेल से यात्रा करने वालों को मिलने वाली सुविधाओं पर गंभीर सवाल खड़े किए हैं.

रिपोर्ट में जहां एक तरफ ट्रेन में दिए जाने वाले खाने की गुणवत्ता पर सवाल उठाए गए, वहीं वातानुकूलित श्रेणी में मिलने वाले कंबल और चादरों की सफाई की पूरी व्यवस्था पर गंभीर टिप्पणियां की गई हैं.

मैंने एक ऐसी ही लंबे सफर की ट्रेन में यात्रा की ताकि सीएजी की रिपोर्ट में उठाए गए सवालों की जांच की जा सके.

पढें, ख़ास सिरीज़ की पहली कड़ी.

भारत में रहने वालों के लिए रेल सिर्फ़ दूरियां तय करने का साधन नहीं, बल्कि ये यहाँ के लोगों की जीवन रेखा है. रेल सबकुछ जोड़ती है- क़स्बे, शहर और संस्कृति भी.

रेल की बात हो तो सबके पास रेल यात्रा से जुड़ी कोई न कोई कहानी है, जिसके अनुभव वो बड़े चाव से सुनाते हैं. हज़ारों लाखों लोग हर रोज़ रेल से यात्रा करते हैं. हज़ारों के रोज़गार इसपर निर्भर हैं. रेल कभी रुकती नहीं है.

मगर पिछले महीने भारत के नियंत्रक और महालेखा परीक्षक यानी 'सीएजी' की रिपोर्ट में कई चौंकाने वाले तथ्य सामने आए जिससे यात्रा करने वालों की परेशानियां उजागर हुई हैं.

बदतर है भारतीय रेलवे का खाना, सीएजी ने लगाई मुहर

टॉयलेट नहीं जा पाए, रेलवे देगा हर्जाना

सफ़र की पहली बाधा

मुझे पता था कि मेरा सफ़र बड़ा लंबा भी है और मुश्किल भी. जब टिकट बुक करते समय अवध-असम एक्सप्रेस की ए-1 बोगी में मुझे 'साइड लोअर' सीट मिली और वो भी बिलकुल दरवाज़े के पास, तो मुझे समझ में आ गया कि आगे के सफ़र में क्या कुछ होने वाला है.

पुरानी दिल्ली के कश्मीरी गेट के छोर से स्टेशन में दाखिल होना ही अपने आप में एक अजीब अनुभव है. न 'एक्स-रे' मशीनें न और कोई दूसरा सुरक्षा इंतज़ाम. अपना 'सूटकेस' लुढ़काते हुए मैं प्लेटफार्म संख्या 13 पर पहुंचा.

पहले से इस्तेमाल चादरें थमाई

ट्रेन में सवार होने के बाद कुछ ही मिनटों में 'कोच अटेंडेंट' हाथों में चादरें और तकिया लेकर पहुंचे. मगर ये चादरें 'पैकेट' में ना होकर खुली हुई हालत में ही लाकर दी गयीं.

मैंने पूछा तो 'कोच अटेंडेंट' का कहना था कि जब ट्रेन डिब्रूगढ़ से खुली थी तो उन्हें ठेकेदार की तरफ से ये चादरें खुली हुई हालत में ही दी गयीं.

अवध-असम एक्सप्रेस असम के डिब्रूगढ़ से चलती है और राजस्थान के लालगढ़ तक जाती है. फिर ये डिब्रूगढ़ लौटती है. इस दौरान ये राजस्थान से शुरू होकर पंजाब, हरियाणा, दिल्ली, उत्तर प्रदेश, बिहार और पश्चिम बंगाल होते हुए चार दिनों में 3115 किलोमीटर की यात्रा के बाद पूर्वोत्तर राज्य असम के डिब्रूगढ़ पहुँचती है.

गंदगी का अंबार

चूंकि ट्रेन पहले ही लगभग 600 किलोमीटर का सफ़र तय कर पुरानी दिल्ली रेलवे स्टेशन पहुँची, पूरे 'कम्पार्टमेंट' में गंदगी का अंबार पहले से ही था.

दिल्ली से यात्रा शुरू करने वालों को उम्मीद थी कि आगे का सफ़र शुरू होने से पहले ही बोगी की सफ़ाई हो जायेगी. मगर ऐसा नहीं हुआ. लोग ट्रेन में सफाई कर्मियों की तलाश करते रहे.

सिग्नल हुआ और आहिस्ता-आहिस्ता ट्रेन ने प्लेटफॉर्म छोड़ दिया. इसी बीच 'कोच अटेंडेंट' ने दिल्ली में सफर पूरा कर उतरे लोगों की चादरें तह करनी शुरू कर दीं. मैंने उनसे पूछा कि वो इन इस्तेमाल की हुई चादरों को तह करके क्यों रख रहे हैं?

मगर, इसका कोई जवाब उनके पास नहीं था. कुछ ही देर में समझ में आ गया कि जो 'बेड रोल' पहले के यात्रियों ने इस्तेमाल किया था उसे फिर तह कर नए यात्रियों को दिया जा रहा है.

लोग गंदी चादरों की शिकायत करते भी तो किससे. 'कंबल तो वही रहते हैं. मगर इतना तो समझ में आया कि कंबलों की भी धुलाई लंबे अरसे से नहीं हुई है.

मोबाइल छीनने की कोशिश की गई

यही हाल सभी वातानुकूलित बोगियों का था. रेलवे के अधिकारियों के अनुसार रेलवे हर वातानुकूल श्रेणी के टिकट पर प्रति यात्री 20 रुपये अतिरिक्त किराया वसूलती है. इस अतिरिक्त शुल्क के ज़रिये रेलवे कंबल और चादरों की धुलाई की व्यवस्था करती है.

जहां चादरें और तकिए के खोल हमेशा हर यात्री को धुले दिए जाने का नियम है, कंबल की धुलाई का प्रावधान हर दो महीनों के बाद है. मगर कई ट्रेनों में ये कंबल 6 महीनों तक नहीं धोए जाते हैं, ऐसा सीएजी की रिपोर्ट में उजागर हुआ है.

मैं अपने मोबाइल फ़ोन पर चादरों और कंबल का वीडियो बना रहा था ताकि इसे रेलवे के अधिकारियों के साथ साझा कर पाऊँ. मगर इसी बीच एक शख़्स अचानक आया और उसने मेरा मोबाइल फ़ोन छीनने की कोशिश की. वो मुझे वीडियो बनाने नहीं देना चाह रहा था.

फिर कुछ यात्रियों के विरोध की वजह से उसने मुझे फ़ोन तो लौटाया मगर खुद कहीं ग़ायब हो गया. बाद में किसी ने बताया कि ये अज्ञात व्यक्ति दरअसल उस ठेकेदार का प्रतिनिधि है जिसे ट्रेन में 'बेड रोल' सप्लाई करने का ठेका मिला हुआ है. हालांकि उसकी पहचान की आधिकारिक पुष्टि नहीं हो सकी.

प्लेबैक आपके उपकरण पर नहीं हो पा रहा
'सीएजी' रिपोर्ट ने रेल यात्रियों को मिलने वाली सुविधाओं पर गंभीर सवाल खड़े किये हैं.

सफ़र जारी रहा. एक स्टेशन के बाद दूसरा. लोग उतरते गए और नए यात्रियों की खेप चढ़ती रही. दरवाज़े के पास सीट होने की वजह से मैं सो नहीं पा रहा था. देर रात ट्रेन गोरखपुर स्टेशन पहुंची. पुलिस वालों का एक दल बोगी में चढ़ा.

मुझे लगा ये ट्रेन में गश्त करने चढ़े हैं. मगर एसी बोगी में इन पुलिसकर्मियों ने खाली पड़ी सीटों पर पाँव पसार दिए और सो गए. ट्रेन फिर चल पड़ी.

टॉयलेट गया तो पता चला कि बोगी में पानी नहीं है. मेरी बोगी के साथ जुड़ी हुई बोगियों का भी यही हाल था. रात में ट्रेन में सवार हुए टीटी से इसकी शिकायत भी की. सुबह हो गई और इस बीच ट्रेन कई स्टेशनों पर रुकती और चलती रही. मगर पानी का नामों निशाँ नहीं.

टीटीई ने नहीं, ट्वीट से सुनी गई शिकायत

सुबह दूसरे टीटीई चढ़े. उनसे भी शिकायत की. मगर उन्होंने मुझे आने वाले स्टेशनों के नाम गिनवाए जहाँ मैं खुद बोगी में पानी नहीं होने की शिकायत कर सकता हूँ. तब मैंने सोचा कि रेल मंत्रालय के ट्विटर हैंडल पर ट्वीट के ज़रिये अपनी शिकायत करता हूँ.

ये प्रयास रंग लाया और मेरे ट्वीट का जवाब भी आया. आने वाले समस्तीपुर स्टेशन पर टीटीई साहब को भी पता चल गया कि मैंने रेल मंत्रालय के ट्विटर पर शिकायत की तो उनके सुर भी बदल गए. फिर उन्होंने पूरी व्यवस्था के चौपट होने की दुहाई भी दी.

टीटीई श्याम चंद्र ठाकुर ने मुझे बताया कि ट्रेन में सफाई करने की ज़िम्मेदारी और बोगियों में पानी भरने की ज़िम्मेदारी भी ठेके पर दे दी गई है. उन्होंने बताया कि जिन लोगों को ट्रेन की सफाई का ठेका दिया गया है वो नज़र ही नहीं आते हैं.

ट्रेन समस्तीपुर पहुँची तो यात्रियों ने गंदगी और पानी नहीं होने को लेकर हंगामा शुरू कर दिया. तभी सफाई कंपनी के सुपरवाइज़र राजा कुमार सिंह भी प्रकट हुए. उन्होंने भी बोगियों की गंदगी का कारण पानी का अभाव ही बताया. गंदे टॉयलेट और कम्पार्टमेंट की सफाई शुरू हुई.

मेरी ही बोगी में सफ़र कर रहे, पेशे से डॉक्टर, विकास शाह ने मुझे बताया कि वो अक्सर इसी ट्रेन से आते-जाते हैं और हमेशा ही उन्होंने इसे ऐसी ही स्थिति में पाया.

उन्होंने मुझे अपने मोबाइल फ़ोन पर अपना ट्विटर हैंडल दिखाया जिस से वो हमेशा रेल अधिकारियों तक ट्रेन के रख रखाव की शिकायत करते रहते हैं.

सफ़र के अंत तक अनधिकृत लोग चढ़ते रहे

ट्विटर के ज़रिये शिकायत दर्ज कर बोगी में पानी तो चढ़ा, मगर टूटे हुए नल और टपकते हुए फ़्लश की वजह से पानी ज़्यादा देर तक नहीं रह पाया. बात सिर्फ टॉयलेट की सफाई और पानी की किल्लत तक ही सीमित नहीं थी. एसी बोगियों की कई सीटें भी फटीं हुईं थीं और बल्ब ख़राब.

अनधिकृत लोगों का चढ़ना उतरना भी परेशानी का सबब बना रहा क्योंकि आपका सामान ऐसे में भला कैसे सुरक्षित रह सकता है. एसी में अनाधिकृत रूप से सफ़र करने वालों में पुलिसवाले और रेल कर्मचारियों की तादाद ही ज़्यादा थी.

सफ़र जारी रहा और परेशानियां भी बदस्तूर बनी रहीं. अगले दिन रात को ट्रेन न्यू जलपाईगुड़ी रेलवे स्टेशन पहुंची. मैं तो उतर गया और ट्रेन डिब्रूगढ़ के लिए रवाना हो गयी.

मैं ये सोचता रहा कि आखिर जिस चादर, तकिए और कंबल का इस्तेमाल मैं दो दिनों तक करता रहा वो पता नहीं किस यात्री की क़िस्मत में आए होंगे.

(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉयड ऐप के लिए यहां क्लिक करें. आप हमें फ़ेसबुक और ट्विटर पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)

मिलते-जुलते मुद्दे