नज़रिया: गोरखा मोर्चा की कथित दादागीरी से आंदोलन में मतभेद

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दार्जिलिंग पर्वतीय क्षेत्र में बीते दो महीने से भी लंबे समय से अलग गोरखालैंड की मांग को लेकर जारी आंदोलन के तौर-तरीकों पर अब स्थानीय राजनीतिक दलों में मतभेद उभरने लगे हैं.

गोरखा जनमुक्ति मोर्चा की अपील पर जारी बेमियादी बंद के विरोध में आवाज़ें तो पहले से ही उठ रही थीं. लेकिन अब विरोध के स्वर तेज़ होने लगे हैं.

दिल्ली में केंद्रीय गृह मंत्री राजनाथ सिंह से गोरखालैंड मांग समन्वय समिति के प्रतिनिधिमंडल की मुलाक़ात और उसके बाद 25 दिनों से जारी आमरण अनशन वापस लेने से इलाके के लोगों को बंद ख़त्म होने की उम्मीद बंधी थी.

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लेकिन गोरखा मोर्चा नेता विमल गुरुंग ने लड़ाई लंबी चलने की बात कह कर इन उम्मीदों पर पानी फेर दिया है. लंबे बंद की वज़ह से खाने-पीने की वस्तुओं और नकदी की भारी किल्लत ने आम लोगों के लिए मुश्किलें खड़ी कर दी हैं.

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स्वाधीनता दिवस के मौके पर अपने भूमिगत ठिकाने से बाहर निकले विमल गुरुंग ने कहा, 'ये तो महज ट्रेलर था. असली पिक्चर तो अभी बाकी है.'

लंबे अरसे से जारी बेमियादी बंद को समर्थन के लिए सबका आभार जताते हुए उन्होंने कहा है कि गोरखालैंड का सपना हकीकत में बदलने तक उनकी लड़ाई जारी रहेगी.

गुरुंग ने लोगों से मनोबल ऊंचा रखने की अपील की और कहा कि गोरखा मोर्चा पहाड़ के लोगों के इस सपने पर कभी समझौता नहीं करेगा.

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आंदोलन की शुरुआत के बाद इसकी दशा-दिशा तय करने के लिए गोरखा मोर्चा ने बीते 20 जून को इलाके के तमाम राजनीतिक संगठनों के प्रतिनिधियों को लेकर 30-सदस्यीय गोरखालैंड मांग समन्वय समिति का गठन किया था.

लेकिन यह समिति भी बेमियादी बंद पर कोई फ़ैसला नहीं कर सकी है. इसकी बैठकें महज ख़ानापूर्ति ही रही हैं.

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रणनीति पर सवाल

अब बंद से आम लोगों को होने वाली भारी दिक्कतों के चलते समिति में शामिल कुछ सदस्य गोरखा मोर्चा की रणनीति पर सवाल उठाने लगे हैं.

उधर, विमल गुरुंग ने पहले ही यह साफ़ कर दिया है कि समिति को बंद वापस लेने का कोई अधिकार नहीं है. उनका कहना है कि बंद की अपील मोर्चा ने की है और वही इसे वापस ले सकता है.

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मोर्चा की इस कथित दादागीरी के ख़िलाफ़ अब सहयोगी दल मुखर होने लगे हैं. समिति के एक वरिष्ठ सदस्य कहते हैं, "सबकुछ बेहद जल्दबाजी में किया गया. बंद और अनशन का फैसला आंदोलन के दूसरे चरण में लेना चाहिए था."

भारतीय गोरखा परिसंघ (बीजीपी) के अध्यक्ष सुखमान मोक्तान कहते हैं, "बीते दो महीनों के दौरान इलाके में जितनी हिंसा हुई हैं उसमें गोरखा मोर्चा समर्थकों का ही हाथ था. इससे लोकतांत्रिक आंदोलन की छवि को नुकसान पहुंचा है."

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सवाल

गोरखा नेशनल लिबरेशन फ्रंट (जीएनएलएफ) के प्रवक्ता नीरज जिम्बा सवाल करते हैं कि जब तमाम फैसला गुरुंग को ही करना है तो समिति बनाने की क्या ज़रूरत थी?

वो कहते हैं, "यह आम लोगों का आंदोलन है. गोरखा मोर्चा को इस पर जबरन अपना फ़ैसला नहीं थोपना चाहिए."

दूसरी ओर, गोरखा मोर्चा के महासचिव रोशन गिरि राजनीतिक दलों के दावों का खंडन करते हुए कहते हैं, "विमल गुरुंग पर्वतीय क्षेत्र के निर्विवाद नेता हैं. आंदोलन जारी रखने के लिए मोर्चा तमाम राजनीतिक दलों के साथ तालमेल बना कर आगे बढ़ रहा है. ऐसे में मोर्चा नेतृत्व पर अंगुली उठाना बेमानी है."

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लेकिन जीएनएलएफ की दलील है कि नेतृत्व के अभाव के चलते ये आंदोलन दिशा से भटक गया है.

इन दलों का कहना है केंद्र या राज्य सरकार ने अब तक इस आंदोलन को कोई खास तवज्जो नहीं दी है.

नतीजतन अब गोरखा मोर्चा के तरकश में कोई तीर नहीं बचा है. आंदोलन के नाम पर रोजाना महज़ रैलियों का ही आयोजन किया जा रहा है.

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चुनौती

मोर्चा नेतृत्व को भी अब अंदेशा होने लगा है कि परेशानियों के चलते आम लोगों का कहीं आंदोलन से मोहभंग नहीं हो जाए. यही वजह है कि उसने स्थानीय लोगों में खाने-पीने के सामान और रोजमर्रा की ज़रूरत की वस्तुओं के वितरण के लिए गैर-सरकारी संगठनों को लेकर एक राहत समिति का गठन किया है.

मोर्चा ने इसके लिए सिक्किम में एक निजी बैंक में समिति के नाम से ख़ाता खोल कर दुनिया भर में बसे गोरखा तबके के लोगों से इसमें दान देने की अपील की है.

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गोरखा मोर्चा नेताओं का दावा है कि आम लोग तमाम दिक्कतों के बावजूद अलग राज्य के आंदोलन के समर्थन में हैं. मोर्चा की केंद्रीय समिति के सदस्य स्वराज थापा कहते हैं कि तमाम परेशानियों के बावजूद आम लोगों ने हिम्मत नहीं छोड़ी है.

उनका कहना है कि आम लोगों की समस्याओं को दूर करने के लिए बनी राहत समिति गैर-सरकारी संगठनों के साथ ज़रूरी वस्तुओं की सप्लाई सुनिश्चित करेगी.

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दार्जिलिंग चाय पर संकट

गोरखालैंड की मांग के लिए छेड़े गए आंदोलन ने दुनिया भर में मशहूर दार्जिलिंग चाय के वज़ूद पर भी सवाल पैदा कर दिया है. पर्यटन के अलावा यही उद्योग इलाके की अर्थव्यवस्था का प्रमुख आधार है. लेकिन बेमियादी बंद ने इसकी साख और पहचान ख़तरे में डाल दी है.

दार्जिलिंग चाय उद्योग को उत्पादन और निर्यात के लिहाज से अब तक कोई चार सौ करोड़ का नुकसान हो चुका है. लेकिन यह नुकसान कहां तक जाएगा, इसका अनुमान लगाना भी मुश्किल है. उत्पादन में भारी गिरावट की वजह से नीलामी में दार्जिलिंग चाय की कीमतें लगभग दोगुनी हो चुकी हैं.

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बागानों पर मार

दार्जिलिंग टी एसोसिएशन (डीटीए) ने बीते महीने टी बोर्ड से सहायता की गुहार लगाई थी. बोर्ड ने उससे नुकसान पर एक रिपोर्ट मांगी थी ताकि सहायता के तरीकों पर विचार किया जा सके. अब नुकसान के आकलन के लिए डीटीए ने हाल में एक चार्ट्ड अकाउंटेंट फर्म की सेवा ली है.

डीटीए अध्यक्ष विनोद मोहन कहते हैं, "फर्म की रिपोर्ट मिलने के बाद उसे टी बोर्ड को भेजा जाएगा. नियमित कटाई नहीं होने की वजह से बागानों में जंगली पौधे उग आए हैं. इससे पौधों में कीड़े लगने का ख़तरा है. आंदोलन खत्म होने के बाद भी इन बागानों को काम लायक बनाने में एक महीने से ज्यादा समय लग जाएगा."

डॉ. ए. कैंपबैल ने वर्ष 1845 में इलाके में परीक्षण के तौर पर चाय के पत्तों की नर्सरी शुरू की थी. उसके बाद इलाके की मुफीद जलवायु के चलते धीरे-धीरे अंग्रेजों ने इलाके में चाय बागानों का जाल बिछा दिया.

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देश के विभाजन के समय इन बागानों का मालिकाना हक भारतीयों को मिला. उस समय इलाके में सौ से ज्यादा चाय बागान थे. लेकिन अब कई बागान बंद हो चुके हैं. फिलहाल यहां 87 बागान हैं और उनमें हर साल लगभग 10 मिलियन किलो चाय पैदा होती है. इस उद्योग पर आए संकट से अब निर्यात में गिरावट और समय पर डिलीवरी नहीं देने का ख़तरा भी मंडराने लगा है.

इलाके के बागानों में साल में पांच बार पत्तियां चुनी जाती हैं. इसे उद्योग की भाषा में फ्लश कहा जाता है. इनमें जून के पहले सप्ताह से जुलाई के पहले सप्ताह के दौरान होने वाला दूसरा फ्लश सबसे अहम है.

इसी दौरान चुनी गई पत्तियों से बनी चाय दुनिया भर में निर्यात की जाती है. लेकिन दूसरे और तीसरे फ्लश ही नहीं मानसून फ्लश भी चौपट हो चुकी है.

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सबसे बड़ा नुकसान

बागान मालिकों के एक प्रतिनिधिमंडल ने हाल में कोलकाता में टी बोर्ड के अधिकारियों से मुलाकात की थी. बोर्ड के उपाध्यक्ष संतोष सारंगी कहते हैं, "बोर्ड चाय उद्योग को हरसंभव सहायता देने के लिए तैयार है. बागान मालिकों की ओर से नुकसान के बारे में रिपोर्ट मिलने के बाद बोर्ड इस मुद्दे पर केंद्रीय वाणिज्य मंत्रालय से बात करेगा."

डीटीए अध्यक्ष विनोद मोहन कहते हैं, "अब तक जो नुकसान हो चुका है उसकी भरपाई असंभव है. यह बीते पांच दशकों में इस उद्योग को होने वाला सबसे बड़ा नुकसान है."

डीटीए के मुताबिक, "दार्जिलिंग के बागानों को होने वाले इस नुकसान का फायदा श्रीलंका के चाय उद्योग को मिलेगा."

अब तक इलाके में होने वाले आंदोलनों और बंद से चाय उद्योग को छूट दी जाती रहती है. लेकिन अबकी ऐसा नहीं हुआ.

गोरखा मोर्चा के महासचिव रोशन गिरि कहते हैं, "ये पूरे पहाड़ के लोगों की पहचान का सवाल है. एक बड़े मकसद के लिए होने वाले आंदोलन में चाय उद्योग को कुछ करोड़ रुपये का नुकसान क्या मायने रखता है?"

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आंदोलन में शामिल मजदूर

गोरखा मोर्चा के प्रवक्ता स्वराज थापा कहते हैं, "गोरखालैंड का गठन बागान मजदूरों के लिए भी अहम है. दुनिया की सबसे महंगी चाय होने के बावजूद यहां बागान मजदूरों के जीवन में पीढ़ियों से कोई बदलाव नहीं आया है. वे न्यूनतम मजदूरी पाने के लिए इस आंदोलन में साथ हैं."

थापा कहते हैं, "बागान मालिकों को तो एक सीजन में ही नुकसान होगा. लेकिन वहां काम करने वाले मजदूर पीढ़ियों से जो नुकसान उठा रहे हैं उसका क्या होगा?"

वो कहते हैं "दार्जिलिंग चाय के मजबूत ब्रांड को कोई खास नुकसान नहीं होगा. वर्ष 1986 में भी आंदोलन के दौरान उद्योग को वित्तीय नुकसान उठाना पड़ा था. लेकिन यह उससे उबर गया."

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वेतन कहां से दें?

"हमारा होटल अपनी लोकेशन के चलते साल के बारहों महीने घरेलू और विदेशी सैलानियों से भरा रहता था. लेकिन अब तो दो महीने से तमाम कमरे खाली हैं. आगे भी सैलानियों के आने की कोई संभावना नहीं है. आंदोलन ने कमर तोड़ दी है. गोरखालैंड तो जब बनेगा तब बनेगा, फिलहाल तो भविष्य सूना नजर आ रहा है." दार्जिलिंग के माल चौरास्ता से सटे एक होटल के मालिक नाम नहीं छापने की शर्त पर यह कहते हुए लगभग रुआंसे हो उठते हैं.

इलाके की 80 फीसदी आबादी अपनी रोजी-रोटी के लिए पर्यटन और चाय उद्योग पर ही निर्भर है. साल के बारहों महीने सैलानियों से ठसाठस रहने वाले इस इलाके में सैलानी अब दुर्लभ हो गए हैं.

तमाम होटलों ने ज़रूरी स्टाफ रख कर बाकी सबको छुट्टी दे दी है. एक होटल मालिक सवाल करते हैं, "कमाई नहीं होने पर आखिर कर्मचारियों को वेतन और भोजन कहां से देंगे?"

वो कहते हैं कि बीते तीन दशकों के दौरान गोरखालैंड के गठन का सपना तो कई दलों ने दिखाया. लेकिन वह अब तक एक कड़वा सपना ही साबित हुआ है. दार्जिलिंग पर्वतीय क्षेत्र में अलग राज्य की मांग में गोरखा जनमुक्ति मोर्चा समेत तमाम क्षेत्रीय दलों ने बीते दो महीने से भी लंबे समय से इलाके में बेमियादी बंद बुला रखा है.

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खाली हैं होटलें

पर्वतीय अर्थव्यस्था की रीढ़ कहे जाने वाले चाय और पर्यटन उद्योग को लगभग बर्बाद कर दिया है. इलाके में सालाना पहुंचने वाले पांच लाख सैलानियों से पर्यटन उद्योग को अमूमन 12 सौ करोड़ की कमाई होती है. लेकिन अबकी दुर्गापूजा के सीजन के लिए स्थानीय होटलों में एक भी कमरा बुक नहीं है.

दार्जिलिंग पर्वतीय क्षेत्र में लगभग छह सौ होटल हैं. इसके अलावा 10 हजार कारें और दूसरे वाहन हैं जो सैलानियों से होने वाली कमाई पर ही निर्भर हैं. लेकिन दो महीने से सबकुछ बंद है. इलाके का परिवहन क्षेत्र चाय बागानों से पत्तियों की ढुलाई पर चलता था. लेकिन जब बागान ही बंद हैं तो पत्तियां कहां से मिलेंगी?

ईस्ट हिमालयन ट्रेवल एंड टूर ऑपरेटर्स एसोसिएशन के सचिव सम्राट सान्याल बताते हैं, "जून से अब तक इस उद्योग को दो सौ करोड़ का नुकसान हो चुका है. यह आंकड़ा अभी और बढ़ेगा. अगले महीने से टूरिस्ट सीजन शुरू होने वाला है."

वे कहते हैं कि आंदोलन के खत्म होने के बावजूद अब सैलानी यहां आने से कतराएंगे. उनके मुताबिक, सितंबर से जनवरी तक इस उद्योग को छह सौ करोड़ का नुकसान होने का अंदेशा है. ट्रेवल एजेंट्स फेडरेशन ऑफ इंडिया की पूर्वी शाखा के प्रमुख अनिल पंजाबी बताते हैं, "पर्वतीय क्षेत्र में दुर्गापूजा के दौरान हुई तमाम बुकिंग रद्द हो गई है."

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खाने-पीने के पड़े लाले

लंबे बंद से आम लोगों के सामने चक्की के दो पाटों के बीच पिसने की मजबूरी है. गोरखा मोर्चा की ताक़त और इलाके में उसके वर्चस्व की वज़ह से स्थानीय लोग उसके ख़िलाफ़ मुंह नहीं खोलते.

एक दुकानदार रमेश मोक्तान (बदला हुआ नाम) कहते हैं, "शुरुआत में आंदोलन अच्छा लगा था. लेकिन पेट की भूख और रोजमर्रा की ज़रूरतों के दबाव में अलग राज्य का सपना अब दम तोड़ने लगा है."

वे कहते हैं कि ऐसे सपने हमने पहले भी कई बार देखे थे. लेकिन तमाम हिंसक आंदोलनों का नतीजा सिफर ही रहा है. अब तो खाने-पीने के लाले पड़ गए हैं.

आंदोलन की वजह से दार्जिलिंग हिमालयन रेलवे (डीएचआर) को लगभग ढाई करोड़ रुपए का नुकसान हुआ है.

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बंद है ट्वाय ट्रेन

पूर्वोत्तर सीमांत रेलवे के मुख्य जनसंपर्क अधिकारी प्रणव ज्योति शर्मा बताते हैं कि अगर हालात सामान्य होते तो ट्वाय ट्रेन के संचालन से अब तक ढाई करोड़ की आमदनी हुई होती. इलाके में ट्वाय ट्रेन सेवा बीते 12 जून से ही स्थगित है. इस साल 12 जून तक ट्रेन से 3.05 करोड़ रुपये की आय हुई थी. यूनेस्को ने सिलीगुड़ी से दार्जिलिंग के बीच चलने वाले इस ट्रेन को दो दिसंबर, 1999 को हेरिटेज दर्जा दिया था.

आंदोलन के दौरान इस ट्रेन के सोनादा व गयाबाड़ी स्टेशनों को आग लगा दी गई. इसके अलावा कर्सियांग स्थित डीएचआर मुख्यालय को भी काफ़ी नुकसान पहुंचा है. आंदोलन से पहले तक दार्जीलिंग से घूम के बीच रोजाना नौ ट्रेनें चलती थीं.

इसके अलावा सिलीगुड़ी से दार्जिलिंग और दार्जिलिंग से सिलीगुड़ी के बीच एक-एक ट्रेन चलाई जाती थी. ये ट्रेनें देशी-विदेशी सैलानियों में बेहद लोकप्रिय हैं. 1881 में शुरू हुई इस ट्वाय ट्रेन सेवा के संचालन पर सालाना 15 करोड़ रुपये खर्च होते हैं. इस ट्रेन को भी अब बंद खत्म होने का इंतजार है.

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