नज़रिया: पार्टियों को चंदा देने वालों के नाम जारी होंगे?

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राजनीतिक दलों को दिया जाने वाला चंदा तेज़ी से बहस का मुद्दा बनता जा रहा है. असोसिएशन ऑफ डेमॉक्रेटिक रिफॉर्म्स (एडीआर) की ताज़ा रिपोर्ट के बाद राजनीतिक पार्टियों को दिया जाने वाला कॉर्पोरेट चंदा एक बड़ी चिंता का विषय है.

रिपोर्ट बताती है कि पिछले चार सालों में 5 राष्ट्रीय पार्टियों (बीजेपी, कांग्रेस, एनसीपी, सीपीआई और सीपीएम) को 89 फ़ीसदी चंदा कॉर्पोरेट फंडिंग से प्राप्त हुआ है.

सच्चाई यह है कि सत्तारुढ़ पार्टी को सबसे अधिक चंदा मिला है जो बिल्कुल चौंकाने वाला नहीं है और यह हमेशा से होता रहा है. मुद्दा यह है कि चंदा देने वाली कंपनियों के नाम क्या सार्वजनिक होंगे ताकि लोगों को इसके बारे में पता चल सके.

वित्त मंत्री की कसम

शुरुआत से ही भारतीय राजनीति में पार्टियों को चंदे में पारदर्शिता का अभाव रहा है और इसने हमेशा से संविधान द्वारा अनिवार्य स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनावों पर प्रश्न चिन्ह लगाया है.

हालांकि, 1 फ़रवरी 2017 को बजट पेश करते हुए वित्त मंत्री ने राजनीतिक दलों को मिलने वाले चंदे पर चिंता जताते हुए, इसे हल करने की कसम खाई थी.

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चंदे की प्रणाली को पारदर्शी बनाने पर जेटली के इरादे को सराहा गया था. वित्त मंत्री ने नकद में मिलने वाले चंदे पर रोक लगाने के लिए चुनावी बॉन्ड का भी प्रस्ताव दिया था जिसे चंदा देने वाला शख़्स बैंक से ख़रीद सकता था.

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इस बॉन्ड की रक़म 3-4 हफ़्तों में उस रजिस्टर्ड पार्टी के ख़ाते में चली जाएगी. वित्त मंत्री के इस तर्क से नक़द भुगतान को रोकने में मदद मिलती.

लेकिन यहीं से दिक्कतें शुरू होती हैं. अभी तक 20 हज़ार रुपये से ऊपर दिए जाने वाले चंदे के बारे में राजनीतिक पार्टियां चुनाव आयोग को नहीं बताती हैं.

बॉन्ड से हल होगा समाधान?

अब सवाल यह उठता है कि क्या बॉन्ड के रूप में मिलने वाले चंदे के बारे में पार्टियां चुनाव आयोग के सामने ख़ुलासा करेंगी?

हालांकि, विस्तृत योजना अभी तैयार नहीं हुई है लेकिन यह साफ़ था कि कॉर्पोरेट द्वारा दिए गए दान को इस बात का ख़ुलासा नहीं करना होगा कि उन्होंने किस दल को दान दिया है. कथित तौर पर ऐसा इसलिए किया गया था ताकि राजनीतिक दलों के बदले की भावना से दानदाताओं को बचाया जा सके.

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इस बात को समझने के लिए ज़्यादा अक़्ल की ज़रूरत नहीं है कि दानदाता के नाम का ख़ुलासा और चंदे की पारदर्शिता दो अलग ध्रुव हैं. इस पर शोरगुल होना स्वाभाविक और अपेक्षित है.

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एक दूसरा प्रस्ताव जिसने ध्यान खींचा है वह यह कि फाइनैंस बिल के द्वारा इस नियम को हटा दिया गया कि एक कंपनी अपने तीन साल के लाभ का 7.5 फ़ीसदी राजनीतिक दलों को चंदे के रूप मे दे सकती है.

अब कोई कंपनी अपना पूरा लाभ पार्टियों को दे सकती है. विशेषज्ञ इस बात पर सवाल उठाते हैं और ख़ासकर कि जब चंदा लेने वाले की पहचान गुप्त रखी जाएगी.

कॉर्पोरेट कंपनियां और परोपकार

निश्चित रूप से कॉर्पोरेट कंपनियां परोपकार के लिए दान नहीं करेंगी बल्कि उसके बदले कुछ चाहेंगी. जैसे- लाइसेंस, कॉन्ट्रैक्ट्स, अफ़सरों की पोस्टिंग-ट्रांसफ़र आदि और घोर पूंजीवाद एक वास्तविकता बन जाएगा.

वित्त मंत्री ने राज्यसभा में विनियोग विधेयक पर चर्चा के दौरान यह भरोसा दिया था कि चुनावी बॉन्ड योजना को तैयार करते समय सभी विषयों पर ग़ौर किया जाएगा.

उन्होंने सभी से विचार मांगे और आश्वस्त किया कि उन पर ध्यान दिया जाएगा. यह जानना रोचक होगा कि कितने दलों और हितधारकों ने इस पर प्रस्ताव भेजे.

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सरकार के एजेंडे में राजनीतिक दलों को चंदे में पारदर्शिता के लिए उठाए जाने वाले कदमों का स्वागत है लेकिन उसकी कार्रवाई भी उद्देश्य के अनुरूप होनी चाहिए.

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चुनावी कोष हो सकता है समाधान

आदर्श समाधान यह है कि एक राष्ट्रीय चुनावी कोष बनाया जाए जिसमें सभी दानदाता बिना किसी दल की वरीयता तय करते हुए खुले तौर पर चंदा दें. इसके बाद राजनीतिक दलों को मिले वोटों के अनुपात के आधार पर सभी रजिस्टर्ड पार्टियों को फंड बांटा जाए. इससे दानदाताओं की गोपनीयता भी बरकरार रहेगी.

एक बार राजनीतिक दलों की पब्लिक फंडिंग का मसला सुनिश्चित हो जाए तो निजी तौर पर दिया गया दान पूरी तरह प्रतिबंधित कर दिया जाना चाहिए. वहीं, पब्लिक फंड को सीएजी या किसी ऑडिटर द्वारा सालाना ऑडिट कराया जाना चाहिए.

यह देश की ज़रूरतों के हिसाब से चुनाव सुधारों में सबसे निर्णायक कार्रवाई होगी.

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