नज़रिया: 'तीन तलाक़ पर सुप्रीम कोर्ट का फ़ैसला इस्लाम के हक़ में'

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तुरंत तीन तलाक़ पर जो आज सुप्रीम कोर्ट ने फ़ैसला दिया है वह 'तलाक़-ए-बिद्दत' पर दिया है. बिद्दत का मतलब ही होता है 'इनोवेशन' यानी ये लफ़्ज़ क़ुरान में नहीं था. ये बाद में लाया गया है.

क़ुरान में या पैगंबर ए इस्लाम के समय में तुरंत तलाक़ था ही नहीं. पैंगबर के समय की बहुत सी हदीसें हैं जिसमें उन्होंने कहा है कि यदि किसी ने एक बार में ही तीन तलाक़ कहा है तो वह तीन तलाक़ नहीं माना जाएगा बल्कि एक ही तलाक़ माना जाएगा.

इस्लाम के हक़ में फ़ैसला

आज जो हुआ है वो सिर्फ़ महिलाओं के लिए लैंगिक न्याय नहीं हुआ है बल्कि इस्लाम के हक़ में भी फ़ैसला हुआ है क्योंकि इस्लाम ने हमेशा से महिलाओं को हक़ दिए हैं.

इस्लाम ने जिस तरह के हक़ महिलाओं के दिए थे, उस समय तक वो किसी धर्म ने महिलाओं को नहीं दिए थे, अगर हम आज के नज़रिए से भी देखें तो बहुत कम धर्मों में महिलाओं को इतने हक़ दिए गए हैं.

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लेकिन पितृसत्तात्मकता हर जगह है और तुरंत तीन तलाक़ के मामले में भी यही हुआ है. हम लोग ये भूल जाते हैं कि इस्लाम अलग है और मुसलमान अलग हैं. बहुत सी चीज़ें ऐसी हैं जो इस्लाम में नहीं हैं लेकिन मुसलमान उन्हें करते हैं. तुरंत तीन तलाक़ भी एक ऐसी ही चीज़ है.

मुसलमान मज़हब को न बदनाम करें और अपने भीतर झांके और जो क़ुरान की भावना है, इस्लाम की भावना है उसके हिसाब से जिएं.

मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड पर सवाल

भारतीय महिलाएं लंबे समय से इसके ख़िलाफ़ आवाज़ उठा रहीं थीं, मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड चाहता तो बहुत पहले ही तुरंत तलाक़ की इस प्रथा को ख़त्म कर चुका होता.

मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड ने एक ग़रै ज़िम्मेदाराना तर्क ये दिया है कि यदि तीन तुरंत तलाक़ न हो तो शौहर बीवी का क़त्ल भी कर सकते हैं. पर्सनाल लॉ बोर्ड के पास ये कहने का वक़्त था कि ये ग़ैर इस्लामी है.

कई मुस्लिम देशों में तुरंत तीन तलाक़ पर पहले से ही प्रतिबंध है. पर्सनल लॉ बोर्ड यदि इस मुद्दे पर गंभीर होता तो निक़ाहनामा में तुरंत तीन तलाक़ के ख़िलाफ़ शर्त शामिल की जा सकती थी.

पर्सनल लॉ बोर्ड का ये तर्क भी बेमानी है कि हम इस प्रथा का सामाजिक बहिष्कार करेंगे. यदि सामाजिक बहिष्कार से चीज़ें सुधरतीं तो फिर समाज में अपराध होते ही नहीं. इस दिशा में सुप्रीम कोर्ट ने फ़ैसला देकर एक सही क़दम उठाया है.

जब मुसलमानों ने ही तीन तलाक़ को ग़लत माना तो ये दख़ल क्यों?

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इस पर राजनीति न हो

ये एक सही फ़ैसला है लेकिन इस पर राजनीति नहीं होनी चाहिए क्योंकि जब ऐसे सामाजिक फ़ैसलों पर राजनीति होती है तो उसका जो फ़ायदा होना होता है वो कम हो जाता है.

हमारे देश की राजनीति कुछ इस तरह से है कि जब एक पार्टी किसी चीज़ के पक्ष में आती है तो दूसरी पार्टियां उसके विपक्ष में आ जाती हैं. इसलिए इस फ़ैसले पर किसी को सीना ठोकने की ज़रूरत नहीं है. ये अदालत का फ़ैसला है और इसे अदालती फ़ैसला ही रहने देना चाहिए.

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बहुत कम होता है तलाक़

मुसलमानों में तलाक़ की दर बेहद कम है. लेकिन यदि किसी एक महिला के साथ भी अन्याय होता है तो वो अन्याय ही है. बहुत सी औरतों के सर पर ये डर भी रहता था कि कहीं मुझसे कुछ ग़लत हो जाए तो मेरे शौहर तुरंत तलाक़ न दे दें. औरतों के सर से तुरंत तलाक़ का ये डर कम होगा.

भारत एक प्रजातांत्रिक देश है और यहां किसी एक औरत के दिल में भी इस तरह का ख़ौफ नहीं होना चाहिए. ये अलग बात है कि इस तरह के तलाक़ के सिर्फ़ सुन्नी हनफ़ी मसलक के लोग ही मानते थे. शिया और अहलेहदीस समुदाय में ये पहले से ही ग़ैर क़ानूनी है.

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लेकिन सिर्फ़ तुरंत तीन तलाक़ को असंवैधानिक कह देने से ही न्याय नहीं हो जाएगा बल्कि महिलाओं में जागरूकता लाने के लिए और अधिक प्रयास किए जाने की ज़रूरत है क्योंकि भारत में दहेज और बाल विवाह जैसी प्रथाओं को अपराध घोषित किया जा चुका है बावजूद इसके ये समाज में मौजूद हैं.

जब तक मर्दों को औरतों के हक़ समझ में नहीं आएंगे और ज़मीन पर औरतों को ये हक़ और आज़ादी नहीं मलेगी तब तक मुझे लगता है कि ये क़ानूनी जीत अधूरी ही रहेगी.

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