'मुसलमानों ने कब कहा कि तीन तलाक़ गुनाह नहीं है'

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तीन तलाक़ पर सुप्रीम कोर्ट के फ़ैसले पर बीबीसी संवाददाता दिलनवाज पाशा ने ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड के वकील एमआर शमशाद से बातचीत की. उन्होंने कहा कि इस फ़ैसले में यह नहीं कहा गया कि तीन तलाक़ असंवैधानिक है.

तीन तलाक़ को किस आधार पर असंवैधानिक क़रार दिया गया है?

सुप्रीम कोर्ट ने ये नहीं कहा है कि ये असंवैधानिक है. तीन में से दो जजों ने कहा है कि ये असंवैधानिक है. तीसरे जज ने ये कहा है कि चूंकि इस्लाम को मानने वाले इसको खुद ग़लत मानते हैं और कुरान शरीफ़ में इसका ज़िक्र नहीं है इसलिए मैं इसको मान लेता हूं कि ये ग़लत है.

इस तरह से तीन जजों ने इस पर एक राय दी है कि यह एक ग़लत प्रथा है और इसको ख़त्म किया जाना चाहिए. इसे ये कहना सही नहीं है कि ये असंवैधानिक है.

क्या सुप्रीम कोर्ट ने मुसलमानों के मज़हबी कानून में दख़ल दिया है?

मुसलमानों में कोई ऐसा तबका नहीं है जिसने ये कहा हो कि ये प्रथा गुनाह नहीं है. मुसलमानों के हर तबके ने सुप्रीम कोर्ट को ये कहा था कि तीन तलाक़ एक वक्त पर देना गुनाह है. जब मुस्लिम समुदाय यह ख़ुद मान रहा है कि यह एक गुनाह है और सुप्रीम कोर्ट ने इसको बुनियाद बना कर फ़ैसला दिया है तो समुदाय को इसे सकारात्मक रूप में ही लेना चाहिए.

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ख़बरों के मुताबिक मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड की तरफ़ से कहा गया है कि वो पुनर्विचार याचिका दाखिल करेंगे. आपका क्या कहना है?

यह फ़ैसला बहुत ही संतुलित है. इसमें सबसे महत्वपूर्ण ये है कि तीन जजों ने ये कहा है कि पर्सनल लॉ को मूलभूत अधिकारों के दायरे में चैलेंज नहीं किया जा सकता. सुप्रीम कोर्ट ने यह साफ़ किया है कि अन्य धर्म को मानने वाले लोगों के यहां तलाक़ का इतना आसान तरीका नहीं है. पुनर्विचार याचिका दायर करना एक क़ानूनी प्रक्रिया है और इस मामले में भी ये प्रक्रिया अपनाई जा सकती है.

समान आचारसंहिता पर भी बहस चल रही है. क्या ये समान आचार सिंहिता की दिशा में क़दम है?

ये एक अलग मामला है. अगर कोई समान आचार संहिता लाना चाहता है तो वो ला सकता है. पांच जजों की बेंच ने ये फ़ैसला किया है कि पर्सनल लॉ का मामला बहुत पर्सनल है. जब भी कोई स्टेट एक्शन होगा तो अनुच्छेद 25 के अंतर्गत कोर्ट अपनी अपनी राय देगी. वो क़ानून पहले भी था, आज भी है. समान आचार संहिता के संदर्भ में इसे बढ़ा चढ़ा कर पेश करना सही नहीं है.

क्या इस फ़ैसले के बाद मज़हबी मामलों में सरकार के पास दख़ल देने और क़ानून लाने का रास्ता खुल जाएगा?

मज़हबी मामले में कानून लाने की संविधान में इजाज़त है. 1937 के अधिनियम के तहत व्यवस्था है जिसमें यह कहा गया है कि पर्सनल लॉ के तहत पर्सनल मामले तय किए जाएंगे. पर्सनल लॉ शरीयत में है. सरकार अगर कोई पर्सनल लॉ लेकर आती है तो वो कोर्ट में भी चैलेंज होगा. कई ऐसे मामले हुए हैं जिसमें सरकार ने लॉ लाए और वो कोर्ट में गए हैं.

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तीन तलाक़ एक वक्त में देने से तलाक़ नहीं होगा. लेकिन दो और तरीके हैं तलाक़ के. एक है तलाक़-ए-अहसन और दूसरा तलाक़-ए-हसन. तलाक-ए-अहसन में तीन महीने के अंतराल में तलाक़ दिया जाता है. तलाक-ए-हसन में तीन महीनों के दौरान बारी-बारी से तलाक दिया जाता है. इन दोनों के तहत मियां-बीवी के बीच सुलह की गुंजाइश बनी रहती है. हां अब एक वक्त में तीन तलाक़ से तलाक़ नहीं होगा लेकिन ये दो इस्लामी रास्ते अभी भी तलाक़ देने के लिए खुले हैं.

अगर औरत तलाक़ लेना न चाहे तो क्या ये गुंज़ाइश भारतीय क़ानून के तहत उसके पास रहेगी?

जो भी तलाक़ के मामले जाते हैं उसमें एक पार्टी तलाक़ नहीं चाहता, तो क्या कोर्ट को उस मामले से अलग हट जाना चाहिए? कोर्ट को फ़ैसला देना पड़ता है. या तो तलाक़ होता है या फिर आपसी सुलह से साथ रहने के लिए दोनों तैयार हो जाते हैं. इस मामले में तो दरवाज़ा खुला ही है. वो कभी भी सहमति से साथ हो जाएं.

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