छत्तीसगढ़: बीजेपी नेता की गोशाला में दम तोड़ती गायें

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छत्तीसगढ़ के धमधा की ओर जाने वाली मुख्य सड़क से जैसे ही गोड़मर्रा गांव की ओर मुड़ते हैं, गातापारा इलाके में गाय की एक सुंदर और विशालकाय प्रतिमा लगी हुई है.

एक पक्की छत वाले चबूतरे में बैठी हुई इस नंदी गाय की प्रतिमा का लोकार्पण पिछले ही साल बीजेपी के स्थानीय विधायक लाभचंद बाफना के आतिथ्य और भाजपा के ज़िलाध्यक्ष राजेंद्र शर्मा की उपस्थिति में किया गया था.

उस वक़्त गांव के लोगों के बीच गाय की सेवा के लाभ बताए गए थे, लेकिन गोड़मर्रा गांव के गौशाला की तस्वीर ऐसी नहीं है.

दूर-दूर तक फैले गोबर, मिट्टी और दलदलुमा कीचड़ में पड़ी एक गाय अंतिम सांसें गिनती हुई बड़ी मुश्किल से अपने पैर हिलाती है. मिनट दो मिनट में उसके कान हिलते हैं, जैसे वह अपने ज़िंदा होने का सबूत दे रही हो. लेकिन यह सिलसिला लंबा नहीं चल पाया. गाय की आंखें खुली रह जाती हैं, जैसे याचना कर रही हों. देखते ही देखते वह दम तोड़ देती है.

इस गोशाला में मौजूद लगभग दो दर्ज़न लोगों में से कोई भी उस गाय की तरफ़ देखता तक नहीं है.

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गोशाला के दूसरे किनारे में मरी हुई कई गायें पड़ी हैं और उनके बीच जो ज़िंदा हैं, उन्हें ट्रकों में डाल-डालकर दूसरी गोशालाओं में भेजने की तैयारी चल रही है.

इन ज़िंदा गायों के बीच मरणासन्न और मरी हुई गायों की अनदेखी करते हुए पशु चिकित्सा विभाग के एक कर्मचारी उत्साह से बताते हैं ,'अभी तो सारा ध्यान इन ज़िंदा गायों को भेजने पर है. बीस ट्रक से अधिक गायों को दूसरी गोशालाओं में भेजा है. हालत तो देख ही रहे हैं आप. अब देखिए, कितनी ज़िंदा बचती हैं.'

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बेमेतरा ज़िले का गोड़मर्रा गांव पिछले सप्ताह भर से चर्चा में बना हुआ है. इस गांव की गोशाला को बीजेपी के नेता और जामुल नगरपालिका के उपाध्यक्ष हरीश वर्मा चलाते थे. बड़ी संख्या में इस गोशाला की गायों की मौत की ख़बर पिछले सप्ताह जब सामने आई तो पता चला कि हरीश ऐसी ही गोशाला रानो गांव में भी चला रहे हैं और दुर्ग ज़िले के राजपुर में भी.

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इन तीनों गोशालाओं को पिछले तीन सालों में डेढ़ करोड़ रुपये से अधिक का सरकारी अनुदान दिया गया. लेकिन इन गोशालाओं में न तो गायों के लिए कभी ढंग से शेड बना और न ही उन्हें चारा मिला. सैकड़ों गायों की मौत की ख़बर राजधानी रायपुर पहुंची और मामले ने राजनीतिक तूल लिया. तब कहीं जाकर गोशाला के संचालक हरीश वर्मा समेत कुछ लोगों की गिरफ़्तारी की गई. वहीं पशु चिकित्सा विभाग के 9 अधिकारियों को भी निलंबित किया गया.

गाय से लेकर बाघ तक टेंशन में

ज़िले के पशु चिकित्सा विभाग के उप संचालक डॉक्टर ए.के. सिंह अपने सहयोगी के साथ आंकड़ों में उलझे हुए हैं. वे बताते हैं कि अब तक गोड़मर्रा गोशाला से 654 गायों को दूसरी गोशालाओं में भेजा गया है. सिंह कहते हैं, 'हमें एक दिन गांव से बाहर दो ट्रैक्टर ट्रॉली में 76 मरी हुई गायें मिलीं, जिनका पोस्टमॉर्टम करने पर पेट में कुछ भी नहीं पाया गया.'

उनके पास जो आंकड़ा है, उसके अनुसार गोशाला में तब से अब तक 127 गायों की मौत हो चुकी है. लेकिन मौके पर मौजूद गांव के लोग डॉक्टर सिंह के बयान को सिरे से खारिज़ कर देते हैं. गांव के संतोष कुमार कहते हैं, 'आस पास के इलाकों में गढ्ढ़ा करके गायों को दफ़न कर दिया गया. कई गायों को अधिकारियों ने यहां से बाहर खदेड़ दिया, जिनकी मौत हो गई. नालों में गायें मरी पड़ी हैं.'

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गांव के दर्जनों लोग उनसे सहमति जताते हैं. गोशाला के पास ही रहने वाले राजेश का दावा है कि हर दिन सुबह ट्रॉली से मरी हुई गायों को ले जाया जाता रहा है. राजेश कहते हैं, '700-800 गायों के लिए चारा भले पंद्रह दिन में एक बार एक ट्रैक्टर में आता था लेकिन हर सुबह कम से कम 10-15 गायों की लाश तो जरूर निकलती थी.'

राजपुर की गोशाला के आसपास दर्ज़नों खाईनुमा गढ्ढे मिले हैं, जिनमें गायों को दफ़नाया गया था.

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इलाके में कांग्रेस पार्टी के प्रवक्ता विजय दुबे का दावा है कि बीजेपी नेता की तीनों गोशालाओं में पिछले सप्ताह भर में एक हज़ार से अधिक गायों की मौत हो चुकी है.

आम आदमी पार्टी के नेता सुबीर राय कहते हैं, 'राजधानी रायपुर से लेकर रामानुजगंज तक लाखों गायें सड़कों पर मारी-मारी फिर रही हैं, लेकिन सरकार के लिए गाय केवल राजनीति का मुद्दा है. बीजेपी को छत्तीसगढ़ में बच्चों के पाठ्यक्रम में नया आलेख शामिल करना चाहिए कि गाय एक राजनीतिक जानवर है.'

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मगर 23 ज़िलों में 84 गोशालाओं को हर साल करोड़ों का अनुदान बांटने वाले राज्य गोसेवा आयोग का मानना है कि भाजपा के लिए गाय केवल राजनीतिक मुद्दा नहीं है. इन गोशालाओं में सड़कों पर भटकने वाले गाय-बैल के अलावा गांव के लोगों द्वारा पहुंचाए गए गाय-बैलों को रखा जाता है. इसके अलावा कहीं से ज़ब्त किए गए गोवंश के जानवरों को भी यहीं रखा जाता है. आयोग संख्या के आधार पर प्रत्येक गोशाला को लाखों रुपये का अनुदान देता है.

लेकिन आयोग के सचिव एसके पाणिग्रही पूरे मामले से पल्ला झाड़ते हुए कहते हैं कि गोशालाओं में गायें क्यों मर रही हैं, यह देखना आयोग का काम नहीं है. उनका कहना है कि यह सारा काम गोशाला के संचालक देखें कि गायें स्वस्थ हैं या नहीं.

दूसरी ओर कांग्रेस पार्टी इस मामले में कृषि मंत्री बृजमोहन अग्रवाल के इस्तीफ़े की मांग कर रही है, जो इन दिनों इजराइल में हैं. वह वहीं से गोशाला संचालकों, पशु चिकित्सा विभाग के अधिकारियों पर कार्रवाई के निर्देश जारी कर रहे हैं.

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राज्य के मुख्यमंत्री रमन सिंह ने भी माना है कि गायों की मौत भूख से हुई है और पूरे राज्य की गोशालाओं की जांच के निर्देश दिए गये हैं.

लेकिन कांग्रेस के प्रवक्ता मोहम्मद अक़बर का दावा है कि सारी कार्रवाई महज़ दिखावा है. भूख से या क्रूरतापूर्वक गायों की मौत पर कोई कानून नहीं है. ताज़ा मामले में जो कार्रवाई की गई है, वह 1960 में बने कानून के तहत है, जिसमें महज 10 रुपये से लेकर अधिकतम 25 रुपये तक जुर्माना है.

अक़बर कहते हैं ,'गोशाला के नाम पर सरकार की ओर से जैसे दुकानें खोल ली गई हैं. एक बाज़ार सजा लिया गया और उस पर गोरक्षा की बात कहने वाले लोग धंधा कर रहे हैं.'

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