बाढ़ मेरी दो साल की बेटी को निगल गई..

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Image caption मोहम्‍मद अब्‍दुल गनी

42 साल के मोहम्‍मद अब्‍दुल गनी जब भी उस दुखद दिन को याद करते है तो चीख चीख कर रोने लगते है. सोमवार की उस शाम को वह कभी नहीं भूल सकते जब उनकी नजर के सामने दो साल की बेटी नसीमा खातुन बाढ़ के पानी में बह गई.

असम के मोरीगांव जिले के बरसोला के रहने वाले अब्दुल ने रुआंसे होकर कहा, 'मेरी चार बेटियां है. नसीमा सबसे छोटी थी. मैं उससे बेहद प्यार करता था. अभी वो दो साल की हुई थी. उस दिन आसपास के इलाकों में बाढ़ का पानी बढ़ रहा था. मैं घर पर ही था और नसीमा की देखभाल कर रहा था. अचानक शाम को चार बजे हमारे घर के पास भी पानी तेज़ी से बढ़ने लगा."

"इसे देख मैं सिर्फ दो मिनट के लिए दूसरे कमरे में गया था और जब वापस आया तो वहां नसीमा नहीं थी. वह पानी के तेज बहाव में बह गई. हमने काफ़ी खोजबीन की लेकिन वह नहीं मिली. बाद में उसकी लाश बरामद की गई.'

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बाढ़ से 33 लाख प्रभावित

असम में इस साल आई बाढ़ को पिछले 50 साल के इतिहास में सबसे भयानक त्रासदी बताया जा रहा है. अबतक बाढ़ के पानी में डूबने से कम से कम 144 लोगों की मौत हो चुकी है. हालांकि पिछले दो दिनों में प्रदेश के कई जिलों में बाढ़ की स्थिति में सुधार होने की बात की जा रही हैं.

असम राज्य आपदा प्रबंधन प्राधिकरण की तरफ से सोमवार शाम को जारी एक रिपोर्ट में अब भी राज्य के 12 जिलों में कुल 1,241 गांव बाढ़ के पानी में डूबे होने की जानकारी दी गई है.

इस साल बाढ़ प्रभावित लोगों की संख्या 33 लाख से भी अधिक पहुंच गई थी. जबकि मोरीगांव जिले में अब भी कई गांव पानी में डूबे हुए हैं.

पास के एक और गांव मोइरावाड़ी में बाढ़ की ऐसी ही एक घटना में अपनी पांच साल की बेटी मोबासिरा खातुन को खो चुके मोहम्मद जसीमुद्दीन सदमें में हैं. धीमी आवाज में वे केवल इतना कहते है कि मेरी बेटी बाढ़ के पानी में डूब गई.

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Image caption अपने पिता के साथ मोहम्मद जसीमुद्दीन

गांवों का निशान तक न बचा

उनके बुजुर्ग पिता मिनाजुल इस्लाम ने बीबीसी को बताया कि शुक्रवार का दिन था. बाढ़ के पानी ने हमारे घर को चारों तरफ से घेर रखा था. सुबह 9 बजे का समय था और हम सभी घर पर थे. जसीमुद्दीन अपने किराने की दुकान का सामान सुरक्षित स्थान पर रखने गया था. इस बीच बिना किसी को बताए मोबासिरा बिस्कुट लाने अपने पिता की दुकान पर चली गई. पानी धीरे धीरे बढ़ रहा था. जब वह बिस्कुट लेकर वापस घर आ रही थी तभी अचानक पानी में गिर गई. किसी ने भी ध्यान नहीं दिया. काफी देर तक जब वह घर नहीं लौटी तो हम नाव लेकर उसे तलाशने निकले और शाम करीब पांच बजे हमें उसकी लाश मिली.

बाढ़ की इस त्रासदी की कहानी को सुना रहे मिनाजुल इस्लाम के गांव से सटे चार ऐसे गांव भी है जिनका आज कोई नामों निशान तक नहीं बचा है. कभी इन गांवों के स्कूल-मदरसों में बच्चों के पढ़ने का शोर सुनाई देता था अब यहां न कोई घर बचा है, न कोई स्कूल और न ही खेत-खलिहान. सबकुछ पानी में समा गया है.

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देखते देखते गांव डूब गया

मैं जब नाव पर सवार होकर ब्रह्मपुत्र से तुलसीबोरी 1 नंबर गांव पहुंचा तो देखा कि क्षतिग्रस्त हालत में वहां केवल तीन-चार मकान ही बचे थे. वह भी एक छोटी सी जमीन के टुकड़े पर टिके थे. जबकि बाढ़ से पहले इस गांव में 70 से अधिक परिवार रहा करते थे. यहां सरकारी स्कूल था, बिजली थी और हाल ही में स्वच्छ भारत अभियान के तहत लोगों के घर पर बनाए गए शौचालय थे. इन सबके ऊपर से अब ब्रह्मपुत्र बह रहा है.

तुलसीबोरी 1 नंबर गांव की निवासी और फिलहाल राहत शिविर में रह रही रुक्साना बेगम उस दिन को याद कर कांप उठती है. वो कहती है, "उस दिन ब्रह्मपुत्र उफान पर था. गांव खाली करने की बात भी हुई थी. हमारे घर से कुछ दूरी पर एक तटबंध था, जो पिछली किसी भी बाढ़ में नहीं टूटा था. हम खुद को यह तस्सली देते हुए सो गए. लेकिन उस रात 2 बजे ब्रह्मपुत्र के पानी की जो आवाजें हमने सुनी वह पिछले 30 सालों में कभी नहीं सुनी थी. मेरे पति ने पड़ोस में सोए लोगों को जगाया और पानी बढ़ने की बात करने लगे."

"कई परिवार दिन में ही गांव खाली कर चले गए थे. अभी हम पानी बढ़ने की बात कर ही रहे थे कि महज 10 मिनट के भीतर बांध टूट गया और हमारा गांव डूब गया. पहले हमने घर की छत पर चढ़ कर जान बचाई पर जब पानी काफी बढ़ने लगा तो मैं बच्चों को लेकर एक लंबे पेड़ पर चढ़ गई. यह तो किस्मत थी कि रात को ही फोन पर गांव में बाढ़ आने की सूचना पास के गांव वालों को दे दी गई थी और लोग नाव लेकर हमें बचाने पहुंच गए. वरना उस रात हममें से कोई नहीं बचता."

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लोगों की नाराज़गी

बाढ़ में अपना सबकुछ गंवा कर सड़क किनारे राहत शिविरों में रह रहे लोगों की शिकायत है कि राहत सामग्री के तहत प्रति व्यक्ति जो एक किलो चावल और एक किलो दाल दिया जाता है, वह उन्हें नियमित रूप से नहीं मिल रहा. वहीं दवाईयों की उपलब्धता को लेकर भी लोग स्थानीय प्रशासन से खफा है.

हालांकि लाहरीघाट सर्कल में बाढ़ की स्थिति से निपट रहे वरिष्ठ अधिकारी दिलीप सरकार ने कहा कि प्रशासन की तरफ से बाढ़ पीड़ितों तक हर राहत सामग्री पहुंचाने का प्रयास किया जा रहा है. दूसरे चरण की बाढ़ में तकरीबन सारी सड़कें पानी में बह गई थी उस समय लोगों तक पहुंचना मुश्किल हो गया था. लेकिन रास्ते खुल जाने के बाद लोगों को नियमित तौर पर राशन दे रहे हैं.

इलाक़े में बने राहत शिविर में अगर किसी की तबीयत खराब होती है तो फिल्ड अधिकारी इसकी जानकारी चिकित्सकों की टीम को देते है और तुरंत इलाज किया जाता है. वहीं इस अधिकारी ने दावा किया कि मरने वाले व्यक्ति के परिवार को 48 घंटे के भीतर बतौर मुआवजा 4 लाख रुपये का चेक दे दिया जाता है.

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