आज होगा तय, निजता का अधिकार 'मौलिक अधिकार' है या नहीं

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Image caption आधार कार्ड को ज़रूरी बनाने के केंद्र के फ़ैसले के ख़िलाफ़ प्रदर्शन

आधार स्कीम को लागू करने को लेकर उठे निजता के अधिकार के सवाल पर गुरुवार को सुप्रीम कोर्ट का फैसला आने वाला है.

सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस जेएस खेहर के नेतृत्व वाली नौ जजों की संविधान पीठ इस विवाद पर फैसला देगी कि संविधान के तहत निजता का अधिकार, नागरिकों का मौलिक अधिकार है या नहीं.

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'निजता का अधिकार' मौलिक अधिकार है या नहीं

माना जा रहा है कि इस फैसले पर ही केंद्र की आधार योजना का भविष्य तय होगा.

अर्थशास्त्री और इस मामले में याचिकाकर्ताओं में से एक रितिका खेड़ा इस बात पर हैरानी जताती हैं कि आखिर ये सवाल ही क्यों पैदा हुआ कि निजता का अधिकार, नागरिकों का मौलिक अधिकार है या नहीं.

इस बारे में उन्होंने बीबीसी से बातचीत की. पढ़िए बातचीत के अंश-

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निजता के अधिकार पर ही सवाल

लोग इस बात पर हैरान हैं कि निजता के सवाल पर, 21वीं सदी में देश में नौ जजों की संविधान पीठ के बैठने की ज़रूरत क्यों पड़ी.

अगर एक लोकतंत्र में निजता का अधिकार, मौलिक अधिकार नहीं रहता है तो ये किस तरह का लोकतंत्र है.

किसी भी तरह आधार को क़ानूनी तौर पर लागू करने की कोशिश कर रही केंद्र सरकार के वकीलों ने निजता के अधिकार की मौलिकता पर ही सवाल खड़ा कर दिया.

सुप्रीम कोर्ट में 2015 में सरकारी वकीलों की तरफ़ से तर्क दिया गया कि ये हो सकता है कि आधार लोगों की निजता में दखल देता हो, लेकिन क्या निजता का अधिकार मौलिक अधिकार है?

सरकार का तर्क था कि इस बारे में कभी भी अदालत ने कोई फैसला नहीं दिया और संविधान में भी इस बारे में स्पष्ट कुछ लिखा नहीं है.

उस समय इस मामले की सुनवाई तीन जज कर रहे थे. उन्होंने सरकारी वकील की दलील मान ली और इस पर फैसला लेने के लिए मामले को संविधान पीठ के हवाले कर दिया.

तत्कालीन जज जस्टिस जे चेलमेश्वर ने इस मामले की जल्द सुनवाई का आश्वासन दिया था क्योंकि आधार के लागू होने से बहुत सारे लोगों के जीने के अधिकार पर असर पड़ रहा है.

फिर भी इस मामले को लगभग दो साल हो गये.

सरकारी दलीलें

संविधान पीठ में जब इस पर बहस हो रही थी तो सरकारी वकीलों ने बहुत अजीबो ग़रीब दलीलें दीं.

उनका पहला तर्क था कि निजता का अधिकार मौलिक अधिकार है ही नहीं.

सरकार की तरफ़ कुछ दूसरे वकील जब बहस में आए तो उन्होंने कहा कि ये मौलिक अधिकार तो है लेकिन ये पूरी तरह निरपेक्ष नहीं है.

सरकार की ओर से सबसे अहम दलील दी गई कि अगर निजता का अधिकार और जीने का अधिकार आमने सामने टकराते हैं तब जीने का अधिकार प्राथमिक होगा.

हालांकि दूसरे पक्ष के वकीलों की दलील दी थी कि ये दोनों अधिकार एक दूसरे में ही निहित हैं, इन्हें अलग नहीं किया जा सकता.

उनका तर्क था कि न तो जीने का अधिकार, बिना निजता के अधिकार के पाया जा सकता है और ना ही निजता का अधिकार, बिना जीने के अधिकार के पाया जा सकता है.

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सरकार का डर

डर ये है कि अगर सुप्रीम कोर्ट निजता के अधिकार को मौलिक मान लेता है तो आधार पर एक सवाल खड़ा हो जाएगा क्योंकि ये निजता के अधिकार में दखल देता है.

सरकार इन दोनों को आमने सामने रख कर रास्ता निकालने की कोशिश कर रही थी.

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सरकार आधार को जीने के अधिकार से जोड़कर देख रही है क्योंकि उसका तर्क है कि इसके बिना सार्वजनिक वितरण प्रणाली, मनरेगा, बुज़ुर्गों की पेंशन स्कीम और अन्य जन कल्याणकारी कार्यक्रम नहीं चलाए जा सकेंगे.

उसका तर्क है कि आधार से, इन योजनाओं को अच्छी तरह लागू करने में मदद मिलती है.

हालांकि आधार योजना के शुरू होने के पहले से सारी योजनाएं चल रही थीं.

सबसे अहम बात ये है कि ये सरकारी आंकड़े ही बताते हैं कि जिन कल्याणकारी योजनाओं में आधार को लागू किया गया है, वहां लोगों का नुकसान हुआ है. उनका राशन बंद हुआ है, काम का हक़ छिना है.

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निजता को मौलिक अधिकार नहीं माना गया तो...

अगर निजता के अधिकार को मौलिक अधिकार नहीं माना गया तो ये आम जनता के लिए एक बड़ा झटका होगा.

आम नागरिकों के लिए निजता का अधिकार ही एक सुरक्षा है और अगर यही उनसे छिन जाए तो राज्य, जो कि पहले ही लोगों की निजी ज़िंदगी में अधिक से अधिक दखल करना चाहता है, और हावी हो जाएगा.

असल में ये सिर्फ आधार से जुड़ा मामला नहीं है, बल्कि ये हमारे जीने और खुली सोच की आज़ादी का मामला है.

अगर संविधान पीठ अपने फैसले में निजता के अधिकार को मौलिक मानती है तो फिर ये मामला छोटी पीठ के पास वापस चला जाएगा.

तब जजों के सामने ये सवाल बचेगा कि निजता और आधार के बीच क्या रिश्ता है.

लेकिन निजता के मौलिक अधिकार मान लिए जाने के बाद, आधार परियोजना पर सवाल खड़ा होना तो लाज़िमी है.

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आधार से जनकल्याणकारी योजनाएं ठप

जिस तरह से जनकल्याणकारी योजनाओं में आधार को अनिवार्य किया जा रहा है, उससे ये योजनाएं ठप पड़ती जा रही हैं.

गांवों के बुज़ुर्ग लोगों को पिछले अगस्त से पेंशन नहीं मिल रही है. आधार न होने से लोगों को राशन नहीं मिल पा रहा. गांवों में मनरेगा के तहत काम नहीं मिल रहा.

जबकि सरकार प्रचारित कर रही है कि इसकी वजह से जनकल्याणकारी योजनाओं से फर्जी लोग छंट गए, बिचौलियों का सफाया हो गया और सरकार का पैसा बच गया.

असल में आधार नंबर हासिल करने और सबकुछ दुरुस्त होने के बाद भी लोगों को समझ नहीं आ रहा कि कहां ग़लती रह गई.

अगर आधार की अनिवार्यता समाप्त होती है तो आम लोगों को भारी राहत मिलेगी.

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(रितिका खेड़ा के साथ बीबीसी संवाददाता कुलदीप मिश्र की बातचीत पर आधारित)

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