आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत की आलोचना करने वाली महिला गुरु

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Image caption जगदगुरु माते महादेवी

वो लोग भी जो विचारधारा के तौर पर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का विरोध करते हैं, सरसंघचालक मोहन भागवत की आलोचना करने से पहले दो बार सोचते हैं, विशेष रुप से तब जब वो दो लाख की जनता के बीच अपनी बात रख रहे हों.

लेकिन, यहाँ लिंगायत समुदाय की पहली महिला गुरु जगदगुरु माते महादेवी ने कर्नाटक के बेलगावी में एक जनसभा में इसकी चिंता तक नहीं की.

माते महादेवी ने मोहन भागवत के उस बयान का जवाब दिया जिसमें उन्होंने कहा था कि लिंगायत समुदाय के नेता यह सुनिश्चित करें कि वो हिंदू समाज से बाहर न जाएं.

माते महादेवी ने कहा,"भागवतजी को इस बात की फ़िक्र करने की कोई ज़रूरत नहीं है कि लिंगायत को एक अलग धर्म के रूप में मान्यता प्राप्त हो."

लिंगायतों का मुद्दा हाल ही में काफ़ी चर्चा मे हैं क्योंकि लिंगायत जैन, बौद्ध और सिख की तरह ख़ुद को अलग धर्म का दर्जा दिए जाने की मांग कर रहे हैं. इस मुद्दे ने और तेज़ी पाई है क्योंकि कर्नाटक में विधानसभा चुनाव होने में 9 महीने का समय बचा है.

कर्नाटक में अलग झंडे की मांग क्यों?

लिंगायत को बनाना चाहते हैं अलग धर्म

माते महादेवी ने बीबीसी से कहा, "मैं भागवतजी से कहना चाहूंगी कि लिंगायत हिंदुओं में कोई जाति नहीं है. यह एक अलग धर्म है जिसे हम संवैधानिक दर्जा दिलाना चाह रहे हैं. अगर इसको मान्यता मिलती है तो भागवतजी को चिंता करने की ज़रूरत नहीं है क्योंकि हम हिंदू संस्कृति और विरासत के ख़िलाफ़ नहीं हैं."

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Image caption लिंगायत समुदाय से आते हैं येदियुरप्पा

राज्य की 17 फ़ीसदी जनसंख्या लिंगायतों की है और आमतौर पर मान्यता है कि लिंगायत बीजेपी के समर्थक हैं. साथ ही बीजेपी ने इसी समुदाय से आने वाले बी.एस. येदियुरप्पा का अपना मुख्यमंत्री पद का उम्मीदवार घोषित कर चुकी है.

कांग्रेस देना चाहती थी धर्म का दर्जा

वहीं, राज्य में सत्तारुढ़ कांग्रेस कह चुकी है कि उसकी सरकार लिंगायत को अलग धर्म की मान्यता देने के लिए तैयार थी.

71 वर्षीय माते महादेवी के भागवत पर टिप्पणी से कई सवाल खड़े हो गए हैं क्योंकि उन्होंने एक ऐसे शख़्स पर टिप्पणी की है जो देश की सत्ता संभाल रही पार्टी से जुड़े संगठन आरएसएस से संबंध रखते है.

माते महादेवी लिंगायत समुदाय की पहली महिला गुरु हैं. इस समुदाय की स्थापना विचारक बसावेश्वर उर्फ़ (बसवन्ना) ने की थी. बसवन्ना ने ब्राह्मणवादी व्यवस्था के ख़िलाफ़ लड़ाई की थी जबकि वह ख़ुद ब्राह्मण परिवार में जन्मे थे.

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Image caption कांग्रेस के सिद्दारमैया हैं राज्य के मुख्यमंत्री

कर्नाटक के पूर्व अतिरिक्त मुख्य सचिव और राज्य लिंगायत स्वतंत्र धर्म कार्रवाई समिति के संयोजक डॉ. एस.एम. जामदार कहते हैं, "वह एक शानदार उपदेशक और एक दार्शनिक व्यक्ति हैं. उनके मानने वाले उत्तरी कर्नाटक समेत महाराष्ट्र, तेलंगाना और आंध्र प्रदेश के कई इलाकों में हैं. आरएसएस की तरह उनके पास एक युवा ब्रिगेड है."

माते महादेवी का धार्मिक सफ़र

माते महादेवी का धार्मिक रुझानों का सफ़र 20 साल की उम्र से शुरू हुआ. ग्रेजुएशन पूरा करने के बाद वह लिंगानंदस्वामी मठ से जुड़ गईं.

वह कहती हैं, "बचपन से ही मैं स्वामी विवेकानंद से प्रेरित थी और स्वामी लिंगानंद से मुलाकात के बाद मैंने ख़ुद को धार्मिक प्रचार के लिए समर्पित कर दिया."

कुछ सालों बाद स्वामी लिंगानंद ने उन्हें अपना उत्तराधिकारी घोषित कर दिया. वह कहती हैं, "यह असामान्य नहीं है. बसवन्ना ने कभी भी महिलाओं और पुरुषों के बीच में भेदभाव नहीं किया. वेदों के अनुसार महिलाएं दूसरे दर्जे की नागरिक हैं जबकि लिंगायत में ऐसा नहीं है."

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Image caption माते महादेवी ने चुनाव भी लड़ा था

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लिंगायत के विशेषज्ञ रमज़ान दर्गा कहते हैं, "धर्म का प्रचार करने वाली महिलाओं के बीच उनकी शोहरत कहीं ज़्यादा है. बसवन्ना प्रवचन की ओर देखा जाए तो उनका आधुनिक दृष्टिकोण है. दूसरे जगदगुरुओं के मुकाबले इनका धार्मिक तरीका अलग है."

दर्गा कहते हैं, "वह राजनीति नहीं समझती हैं. उन्होंने विधानसभा चुनाव लड़ा था और हार गईं. बाद में उन्होंने 1999 के लोकसभा चुनाव में सोनिया गांधी के ख़िलाफ़ सुषमा स्वराज का समर्थन किया था. लेकिन बाद मे वह फ़िर से धार्मिक प्रवचन देने लगीं."

प्रवचन से छेड़छाड़ के लगे आरोप

उन पर बसवन्ना, लिंगादेवा के कुछ प्रवचनों से छेड़छाड़ के आरोप भी लगे. जामदार कहते हैं कि, "कोई भी परिवर्तन पसंद नहीं करता, इसलिए वह थोड़ा अलोकप्रिय हो गई. पहले से स्थापित पुराहितों ने उनका विरोध किया लेकिन वह वैसे ही अटल थीं."

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Image caption मोहन भागवत

माते महादेवी कहती हैं, "मैंने कुछ गलत व्याख्याओं को ठीक किया था लेकिन इससे कई लोगों में गलतफ़हमी पैदा हो गई. लेकिन जनता ने महसूस किया कि मैं गलत नहीं थी और वे लाखों में मेरी संख्या में आने लगे."

मोहन भागवत की आलोचना करने के लिए उन्हें नैतिक साहस कहां से मिलता है? इस पर जामदार ने कहा कि वह ईमादार हैं जो उनकी सबसे बड़ी ताकत है और लाखों की संख्या के उनके अनुयायी उन्हें नैतिक साहस देते हैं.

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