बाबा पर बवाल, 31 मौतों का ज़िम्मेदार कौन?

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सीबीआई की विशेष अदालत के गुरमीत राम रहीम को बलात्कार का दोषी करार दिए जाने के बाद हुई हिंसा में पंचकुला और सिरसा में 31 लोगों की मौत की पुष्टि हुई है जिसमें 29 मौतें पंचकुला और 2 मौतें सिरसा में हुई हैं.

इसके अलावा हरियाणा और पंजाब के कई हिस्सों में संपत्ति के भारी नुक़सान की ख़बरें हैं. शुक्रवार को हुए घटनाक्रम के बाद हरियाणा सरकार और प्रशासन पर सवाल उठ रहे हैं.

सबसे बड़ा सवाल तो यही है कि धारा 144 लगे होने के बावजूद भी इतनी भारी तादाद में लोगों को इकट्ठा क्यों होने दिया गया?

गुरुवार रात हरियाणा और पंजाब हाईकोर्ट ने एक वकील की याचिका पर सुनवाई करते हुए हरियाणा के डीजीपी को फटकारते हुए सुरक्षा के इंतेज़ाम पुख़्ता करने के निर्देश दिए थे.

डीजीपी ने पुख़्ता इंतेज़ामों का दावा भी किया, लेकिन इसके बावजूद अदालत परिसर के पास डेरा सच्चा सौदे प्रमुख बाबा गुरमीत राम रहीम के भक्तों की भीड़ बढ़ती ही चली गई.

यही नहीं एक ओर जहां पत्रकारों को पूरी जांच पड़ताल के बाद ही जाने दिया जा रहा था वहीं बाबा के भक्त कथित तौर पर बेरोकटोक जमा हो रहे थे.

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कहां हुई चूक?

फ़ैसला आने के तुरंत बाद भीड़ हिंसक हो गई. पत्थरबाज़ी और आगज़नी की गई. भीड़ ने पत्थरों का इंतेज़ाम तुरंत नहीं किया बल्कि लोग अपने बैग में ही पत्थर भरकर लाए थे.

यहीं नहीं आग भड़काने के लिए कपूर की टिकिया भी लोग लेकर आए थे. ऐसे में ये सवाल उठ रहा है कि एक ओर जब आग भड़काने की तैयारी हो रही थी तब क्या प्रशासन आंखें मूंदे क्यों बैठा था?

जो लोग इकट्ठा हुए वो तुरंत नहीं पहुंचे थे. एक साथ एक से डेढ़ लाख लोग नहीं आए थे बल्कि वो कई दिनों से जुट रहे थे.

इतनी बड़ी तादाद में लोग डेरे से निकलकर पंचकुला पहुंच रहे थे तो क्या सरकार के ख़ुफ़िया तंत्र को पता नहीं था और अगर पता था तो सरकार क्या कर रही थी?

दूसरी सबसे बड़ी लापरवाही फ़ैसला आने के बाद उजागर हुई. बाबा को दोषी क़रार दिए जाने के बाद जब भीड़ उग्र हो रही थी तब पुलिस पीछे हट रही थी. भीड़ को रोकने के बजाय पुलिसवाले पीछे हट रहे थे.

जब पत्रकारों की गाड़ियों को आग के हवाले किया गया तब पुलिस ने भीड़ को रोकने का कथित तौर पर कोई भी प्रयास नहीं किया गया.

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सीएम खट्टर की ग़लती?

लेकिन ये सिर्फ़ पुलिस की नाकामी नहीं है बल्कि हरियाणा की मनोहरलाल खट्टर सरकार भी हालात को नियंत्रण में रखने में पूरी तरह नाकाम साबित हुई.

सरकार की हालात को काबू पाने की इच्छाशक्ति दिखाई नहीं दी है बल्कि फ़ैसला आने से एक दिन पहले तक जब भीड़ इकट्ठा हो रही थी तब सरकार के मंत्री भीड़ को शांतिप्रिय भक्त बता रहे थे.

हरियाणा में हिंसा की ये तीसरी बड़ी वारदात है. इससे पहले बाबा रामपाल के भक्त इसी तरह की हिंसा कर चुके हैं जबकि बीते साल हुए जाट आंदोलन के दौरान भी हरियाणा सरकार पूरी तरह नाकाम रही थी.

लेकिन शुक्रवार की हिंसा सिर्फ़ हरियाणा तक ही सीमित नहीं है बल्कि पंजाब में भी कई ज़िलों में हिंसा हुई है. हालांकि पंजाब से किसी की मौत की ख़बर नहीं है. ढील तो पंजाब पुलिस की ओर से भी हुई है, लेकिन पंजाब सरकार ने एक सही काम ये किया था कि मुख्यमंत्री कैप्टन अमरिंदर सिंह ने गुरुवार को ही डीजीपी को कार्रवाई करने के लिए खुली छूट दे दी थी. यही नहीं मुख्यमंत्री ने कह दिया था कि डीजीपी को जहां ज़रूरी लगे वो वहां कर्फ्यू लगा सकते हैं.

पंजाब में जो आगज़नी की वारदातें हुई हैं उसका अंदाज़ा भी शायद प्रशासन को नहीं था. पुलिस ने एहतियात तो बरती, लेकिन इस स्तर पर प्रतिक्रिया होगी इसका अंदाज़ा नहीं लगा सकी.

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