इंसानों से ज़्यादा ख़र्च होने पर भी क्यों मर रही हैं गायें?

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छत्तीसगढ़ में सरकार कुपोषण को दूर करने के लिए हर दिन महिलाओं और बच्चों पर 5 रुपये 10 पैसे की रक़म ख़र्च करती है और सरकारी अनुदान से चलने वाली गोशालाओं की गायों पर 25 रुपये.

लेकिन इतनी बड़ी रक़म ख़र्च करने के बाद भी राज्य की गोशालाओं में गायों की मौत का सिलसिला थम नहीं रहा है.

गुरुवार को भी भूख और बीमारी के कारण कम से कम 19 गायों ने दम तोड़ दिया. सैकड़ों की संख्या में गायों का इलाज चल रहा है और इनमें से अधिकांश की हालत गंभीर है.

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राज्य के पूर्व मुख्यमंत्री अजीत जोगी कहते हैं, 'एक हज़ार से अधिक गायों की हत्या हुई है. छत्तीसगढ़ की बीजेपी सरकार के संरक्षण में गोशाला के नाम पर व्यापार चल रहा है. जो ईमानदारी से गोशाला चला रहे हैं, उन्हें अनुदान नहीं मिल रहा है. कमीशन देने वालों को अनुदान दिया जा रहा है और इसमें बीजेपी के लोग शामिल हैं.'

आरोप-प्रत्यारोप का दौर

गायों की मौत के मामले में गिरफ़्तार बीजेपी नेता और गोशाला संचालक हरीश वर्मा पहले आरोप लगा चुके हैं कि गोसेवा आयोग के अध्यक्ष अनुदान देने के नाम कमीशन मांगते रहे हैं और इस बार जब उन्हें कमीशन नहीं दिया गया तो अनुदान की 10 लाख रुपये की रक़म रोक दी गई.

दूसरी ओर गोसेवा आयोग के अध्यक्ष विश्वेश्वर पटेल का कहना है कि इस तरह के आरोप पूरी तरह से बेबुनियाद और झूठे हैं. उनका कहना है कि जो लोग गोशाला संचालन में गड़बड़ी करते हैं, उनका ही अनुदान रोका जाता है और हरीश वर्मा के मामले में भी ऐसा ही हुआ.

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Image caption कई गोशालाओं में गायों की हालत दयनीय है.

लेकिन गोशालाओं को दिए जाने वाले अनुदान जिस तरह से बांटे जाते हैं, उसकी ज़िम्मेदारी कोई भी लेने के लिए तैयार नहीं है. यहां तक कि अनुदान की रकम का क्या उपयोग हुआ, इसकी भी कभी जांच नहीं की जाती.

हालत यह है कि पिछले दस सालों में किसी भी गोशाला की ऑडिट रिपोर्ट पर गोसेवा आयोग ने कभी आपत्ति नहीं दर्ज की और न ही ऑडिट रिपोर्ट की जांच की गई.

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सिस्टम पर भी उठ रहे हैं सवाल

असल में गोशाला का संचालन करने वाला कोई भी व्यक्ति सरकार की गोसेवा आयोग में पंजीकरण करवा सकता है और अपनी संस्था की ऑडिट रिपोर्ट और गायों की संख्या बताकर अनुदान पा सकता है.

गायों को 1 इकाई माना जाता है तो बैल और भैंस को 1.2 इकाई. गोसेवा आयोग गोशालाओं को एक इकाई के लिए 25 रुपये प्रतिदिन के हिसाब से अनुदान देता है.

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सामाजिक कार्यकर्ता संतोष देवांगन कहते हैं,'गोशाला संचालक गायों की संख्या बढ़ा-चढ़ाकर बता देते हैं और आयोग उनकी रिपोर्ट पर आंख बंद करके कमीशन लेकर अनुदान जारी कर देता है. अगर जांच की नौबत आई तो सड़कों पर घूमते आवारा गाय-बैलों को गोशाला में रखकर सारा कुछ दुरुस्त कर दिया जाता है. जांच हुई नहीं कि फिर से ये पशु सड़कों पर छोड़ दिए जाते हैं.'

आंकड़ों को देखें तो सरकार के गोसेवा आयोग में 84 गोशालाएं पंजीकृत हैं और इनमें से 77 गोशालाओं को अनुदान दिया जाता रहा है. पिछले तीन सालों में इन गोशालाओं को करोड़ों रुपये बांटे गये हैं. किसी गोशाला को 60 लाख तो किसी को 55 लाख.

कुछ गोशालायें तो ऐसी हैं, जहां एक भी गाय नहीं है, फिर भी अनुदान बांटा गया. लेकिन कुछ गोशालायें ऐसी भी हैं, जो केवल जन सहयोग से चल रही हैं.

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खर्च ज़्यादा, रिटर्न कम

दुर्ग ज़िले के राजपुर की गोशाला में अधमरी और बीमार गायों की चिकित्सा में जुटे पशु चिकित्सा विभाग के नवीन प्रकाश कन्नौजे का कहना है कि गांवों में गाय पालने की परंपरा कम हो रही है क्योंकि एक गाय पर होने वाला हर दिन का खर्च ज़्यादा होता है. वहीं उसपर की जाने वाली मेहनत की तुलना में लोगों को दूघ का पैकेट कम कीमत पर और आसानी से मिल जाता है.

कन्नौजे का कहना है कि एक किलो दूध देने वाली देसी गाय के चारे पर न्यूनतम 60 से 80 रुपये तक खर्च होते हैं, इसके अलावा मेहनत अलग होती है. जबकि बाज़ार में 40-60 रुपये किलो दूध आसानी से मिल जाता है.

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कन्नौजे कहते हैं, 'गांव में पशुओं के चरागाह जब तक थे, तब तक पशुओं पर होने वाला यह खर्च कम था. लेकिन अब अधिकांश चरागाह खत्म हो चुके हैं. यहां तक कि खेती में भी आधुनिक तकनीक के इस्तेमाल ने बैलों को भी खेत से बाहर कर दिया है.'

गोसेवा आयोग के अध्यक्ष विश्वेश्वर पटेल मानते हैं कि किसी भी स्थिति में गोशालाओं में गायें सुखी नहीं रह सकतीं. मगर वह गाय और बैलों को सुरक्षित रखने का उपाय भी सुझाते हैं. वह कहते हैं, 'सरकार अगर गाय और बैल का मूत्र ख़रीदना शुरू कर दे तो लोग गायों को बचाना शुरु कर देंगे और उनकी सेवा भी करेंगे.'

इस बीच दुर्ग इलाक़े के आईजी पुलिस दीपांशु काबरा ने दावा किया है कि भाजपा नेता हरीश वर्मा की गोशाला से गायों की तस्करी भी होती थी और गायों को कसाइयों को भी बेचा जाता था.

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