नज़रिया: 'बहुत मुश्किल है विपक्ष का एकजुट हो पाना'

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लालू यादव 27 अगस्त को पटना में 'बीजेपी हटाओ, देश बचाओ' रैली का आयोजन कर रहे हैं. यह रैली ग़ैर-बीजेपी पार्टियों द्वारा 'एकता' दिखाने की एक और कोशिश है.

इससे पहले इसी तरह की कोशिश कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी ने की थी, जब उन्होंने मई में विपक्ष के नेताओं को लंच पर आमंत्रित किया था.

राष्ट्रपति चुनाव में बीजेपी और एनडीए के उम्मीदवार की टक्कर में उन्होंने मज़बूत कैंडिडेट देने की कोशिश भी की थी, मगर कामयाबी नहीं मिल पाई थी.

कांग्रेस भले ही कमज़ोर हुई है मगर सोनिया को आज भी विपक्ष की एकता की सबसे सक्षम कर्णधार माना जाता है. मगर वह पटना रैली में शामिल नहीं होंगी, क्योंकि बताया जा रहा है कि उनकी तबीयत ठीक नहीं है.

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विपक्ष की एकजुटता में बाधा

सोनिया की जगह कांग्रेस के उपाध्यक्ष राहुल गांधी आ सकते थे, मगर वह नॉर्वे के विदेश मंत्रालय के न्योते पर ऑस्लो यात्रा पर गए हुए हैं.

दोनों शीर्ष नेताओं के न होने पर इस रैली में वरिष्ठ नेता ग़ुलाम नबी आज़ाद कांग्रेस के एकमात्र प्रतिनिधि होंगे. गांधियों की ग़ैरमौजूदगी से जहां रैली का महत्व कम हुआ है, इसे लेकर कुछ और दिक्कतें भी हैं.

लेफ़्ट नहीं चाहता कि वह तृणमूल कांग्रेस के साथ मंच साझा करे. बहुजन समाज पार्टी (बीएसपी) की सुप्रीमो मायावती ने ऐलान किया है कि वह पटना नहीं जाएंगी, क्योंकि उन्हें लगता है कि इस तरह के गठजोड़ करने पर तुरंत ही सीटों के बंटवारे को लेकर दिक्कतें खड़ी हो जाएंगी.

एकजुटता की सोनिया की कोशिश पहले भी सिरे नहीं चढ़ पाई थी क्योंकि कांग्रेस में ख़ुद ही एनडीए के उम्मीदवार राम नाथ कोविंद के लिए क्रॉस-वोटिंग हो गई थी. ऐसा ही समाजवार्टी पार्टी के साथ उत्तर प्रदेश में हुआ था.

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कोविंद का समर्थन

गुजरात में कांग्रेस के विधायकों ने इस साल के आख़िर में होने जा रहे चुनावों से पहले बीजेपी में शामिल होने की उम्मीद को लेकर पार्टी लाइन का उल्लंघन करके कोविंद का समर्थन कर दिया.

इसी तरह समाजवादी पार्टी के मामले में भी साफ़ हो गया कि मुलायम सिंह यादव के खेमे में बहुत मतभेद हैं और वे ख़त्म होने का नाम नहीं ले रहे.

17 अगस्त को विपक्ष एक बार फिर दिल्ली के कॉन्स्टिट्यूशन क्लब में समाजवाद के पुराने सिपाही शरद यादव के समर्थन में इकट्ठा हुआ. जब बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने लालू के राष्ट्रीय जनता दल से अलग होकर अपनी पुरानी सहयोगी बीजेपी से नाता जोड़ा, शरद बाग़ी हो गए.

कांग्रेस और लालू भूल गए कि शरद इससे पहले की एनडीए सरकार में मंत्री थे, जब अटल बिहारी वाजपेयी प्रधानमंत्री थे. 2002 में गुजरात की मार-काट के बाद हुए कई चुनावों में भी उन्हें अपनी पार्टी जनता दल (युनाइटेड) के एनडीए में रहने से कोई दिक्कत नहीं हुई थी.

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मोदी सरकार का रवैया

मगर कॉन्स्टिट्यूशन क्लब में हुई मीटिंग की कामयाबी का स्तर लामबंदी और उत्साहवर्धन के मामले में राष्ट्रपति चुनाव की तुलना में ज़्यादा था. कुल मिलाकर देखा जाए तो शरद यादव का शो था, जिसमें उनके प्रति एकजुटता दिखाई गई थी.

पटना की रैली रोमांचक है क्योंकि यह लंबे समय बाद विपक्ष की एकता और ताकत को ज़मीन पर दिखाने का पहला मौका होगा.

बीजेपी से विपक्ष का आमना-सामना आमतौर पर संसद में ही होता है, जहां पर कांग्रेस ने जब-तब राज्यसभा में अपनी संख्या (जो कुछ वक्त पहले तक बीजेपी से ज़्यादा थी) का फ़ायदा उठाया.

इससे मोदी सरकार को सुरक्षात्मक रवैया अपनाना पड़ा. मगर इस बात को लेकर संदेह किया जा रहा है कि पटना रैली इस मक़सद में कामयाब होगी या नहीं.

कोलकाता की रिपोर्ट्स बताती हैं कि सीपीएम पश्चिम बंगाल की सत्ताधारी पार्टी तृणमूल कांग्रेस के साथ मंच साधा करने के विचार को लेकर 'असहज' है, क्योंकि नारदा-शारदा घोटालों के बाद वह उसे 'करप्ट' मानता है.

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आरजेडी की पटना रैली

मगर लेफ़्ट भूल जाता है कि पश्चिम बंगाल में पिछले विधानसभा चुनावों में उसने इन्हीं घोटालों को लेकर मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के ख़िलाफ़ ज़ोरदार अभियान चलाया था, मगर वह न सिर्फ़ जीतकर आईं बल्कि कम्युनिस्ट ख़ुद तीसरे पायदान पर खिसक गए.

उसके बाद हुए स्थानीय निकाय चुनावों में भी लेफ़्ट को वापसी का मौका नहीं मिला. अगर ममता विपक्ष को एकसाथ लाने के लिए 'सेक्युलरिज्म' को आगे रखती हैं तो लेफ़्ट 'करप्शन' की अपनी धुन के साथ कहां खड़ा होगा?

उत्तर प्रदेश विपक्ष के लिए एक और बड़ी समस्या है. बहुजन समाज पार्टी की मायावती और समाजवादी पार्टी के अखिलेश शुरू में पटना रैली में शामिल होने वाले थे. इससे संकेत मिले कि उत्तर प्रदेश में बड़ा गठबंधन उभर सकता है और उसमें कांग्रेस भी शामिल हो सकती है.

विपक्ष को लगा कि इस वक़्त राज्य में बीजेपी की ताकत को चुनौती देने की यही एक रणनीति है. मगर फिर अखिलेश जाने के लिए तैयार दिखे पर मायावती नहीं.

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कमजोर कड़ी

भले ही पिछले विधानसभा चुनाव में एसपी का वोट प्रतिशत 21.8 और बीएसपी का 22.2 रहा था, मगर आज उत्तर प्रदेश में दोनों का ज़्यादा महत्व नहीं है. मगर कांग्रेस के 6.2% वोट प्रतिशत को दोनों के वोट प्रतिशत में मिला दिया जाए यह 50.2 हो जाता है जो बीजेपी के वोट प्रतिशत 39.7 से काफ़ी ज़्यादा है.

एक राजनीतिक पार्टी कितनी अच्छी और विश्वसनीय है, इसका पता पहले उसकी जीती हुई सीटों से पता चलता है और फिर उसे मिले वोटों की पर्सेंटेज से.

अगर बड़ा गठबंधन बनाना हो, जिसकी कोशिश कांग्रेस भी कर रही है, तो उसका आधार पूरी चेन में सबसे बड़ा होना चाहिए. मगर विडंबना यह है कि जिस कांग्रेस ने अपने लिए इस मामले में मुख्य भूमिका तय की है, भले ही एक वक्त उसकी पूरे देश में मौजूदगी थी, मगर आज वह इस चेन की सबसे कमज़ोर कड़ी है.

2014 लोकसभा चुनावों में यह 162 से 44 सीटों पर आ गई और 9.03 वोट पर्सेंट खोकर इसका वोट प्रतिशत मात्र 19.52 रह गया.

बिहार में इसने जेडीयू और आरजेडी के साथ मिलकर चुनाव लड़ा और सीटों की संख्या बढ़ाई. दिसंबर 2015 में गुजरात के जिला पंचायत चुनावों में भी इसने अच्छा प्रदर्शन किया. मगर कहीं और इसने अपना प्रदर्शन नहीं सुधारा है.

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Image caption अहमद पटेल

विपक्ष का नेतृत्व

गुजरात से राज्यसभा चुनाव में सोनिया गांधी के राजनीतिक सचिव अहमद पटेल की जीत एक बड़ी कामयाबी है. मगर कांग्रेस भूल गई कि यह अप्रत्यक्ष चुनाव था, जिसमें जनता से सीधे जुड़ाव के बजाय दांव-पेंच मायने रखते हैं.

कांग्रेस के साथ ऐसे गठजोड़ का नेतृत्व करने में सक्षम व्यक्ति को ढूंढने की भी समस्या है. जब-जब सोनिया गांधी एकजुटता लाने की कोशिश करती हैं, विपक्ष उन्हें स्वीकार करता है. मगर जैसी ही राहुल गांधी उनकी जगह लेने की कोशिश करते हैं, राजनीतिक खेमे में उत्साह की कमी महसूस की जाने लगती है.

इसमें कोई शक नहीं है कि कांग्रेस को अपने तीन सहयोगियों से राजनीतिक ताकत मिलती है, भले ही वे विवादों या घोटालों में फंसे हों. एक हैं लालू, जो बिहार में विपक्ष का नेतृत्व करते हैं.

दूसरी हैं ममता, जिन्हें अभी बीजेपी से दूर तक कोई चुनौती मिलती नहीं दिख रहीं और तीसरी डीएमके, जिसे एआईएडीएमके में फूट के बाद सबसे ज़्यादा फ़ायदा हुआ है.

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मायावती की उलझन

अगर बीएसपी और एसपी साथ नहीं आते हैं तो विपक्ष की एकता का खेल उत्तर प्रदेश की तरह ही ख़त्म हो जाएगा. ऐसा लगता है कि इस वक्त मायावती अपने उस आधार को फिर से जुटाने की कोशिश में हैं जिसे वह 2012 से खोती जा रही थीं.

उनके ज़्यादातर सहयोगी उनसे अलग हो चुके हैं और वह आर्थिक झमेलों में भी उलझी हुई हैं. इन सिरदर्दों के अलावा, समाजवादी पार्टी से गठजोड़ करने से पहले मायवती यह भी देखेंगी कि ज़मीन पर दलितों और मज़बूत पिछड़ी जातियों, खासकर यादवों के बीच किस तरह का अंतर्विरोध है.

दशकों के आर्थिक सशक्तीकरण के बाद यादव ज़मीनों के मालिक बन गए हैं. ऐसा देखा जाता है कि वे भूमिहीन दलितों का दमन करते हैं, जो उनके खेतों में काम करते हैं. दलित-यादव बैर तब भी उभरकर आया था जब 1993-95 में एसपी और बीएसपी गठबंधन में थीं.

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मायावती को यह डर भी है कि अगर वह कांग्रेस के साथ किसी समझौते में आती हैं तो कांग्रेस को उस दलित आधार को फिर से कब्ज़ाने का मौका मिल सकता है, जिसे बीएसपी खो चुकी है.

जब तक यूपी का मसला नहीं सुलझता, विपक्ष की एकता निरर्थक ही रहेगी. और पटना रैली ताकत गंवा चुके लालू के लिए अपने परिवार पर लगे भ्रष्टाचार के आरोपों से उबरने व बिहार और देश की राजनीति में अपनी प्रासंगिकता साबित करने का एक कमज़ोर प्रयास बनकर रह जाएगी.

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