बिल के चक्कर में कड़वी हो रही हैं बंगाल की मिठाइयां

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मिठाइयां पश्चिम बंगाल के लोगों के रोज़मर्रा के जीवन का अभिन्न हिस्सा हैं. ख़ासकर संदेश और मिष्टी दोई यानी मीठी दही के बिना तो आम बंगाली परिवार में नाश्ते या भोजन की कल्पना करना मुश्किल है.

इनके बिना कोई भी सामाजिक, धार्मिक या सांस्कृतिक समारोह पूरा नहीं हो सकता. इसी तरह रसगुल्ला और बंगाल एक-दूसरे के पर्याय माने जाते हैं. लेकिन एक जुलाई से लागू वस्तु एवं सेवा कर यानी जीएसटी की मार ने इन मिठाइयों के स्वाद में कड़वाहट भर दी है.

जीएसटी के विरोध में राज्य की डेढ़ लाख से ज़्यादा मिठाई की दुकानों में बीते हफ़्ते की शुरुआत में एक दिन की हड़ताल रही. फिर गुरुवार से इन दुकानों के मालिक पश्चिम बंगाल मिष्ठान्न व्यवसायी समिति के बैनर तले तीन दिनों की भूख हड़ताल पर बैठे.

जीएसटी के दायरे से बाहर रखने की मांग

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Image caption हड़ताल पर हैं कारोबारी

इससे पहले इन लोगों ने बीते जून में केंद्रीय वित्त मंत्री अरुण जेटली को एक पत्र लिखकर बंगाल की मिठाइयों को जीएसटी के दायरे से बाहर रखने की मांग की थी. उसके बाद भी केंद्र को कई पत्र भेजे गए हैं.

मगर इन मिठाई व्यापारियों की नाराज़गी की वजह क्या है?

दरअसल, मिठाइयों की अलग-अलग किस्मों पर जीएसटी की अलग-अलग दरों ने व्यापारियों के लिए मुसीबत पैदा कर दी है. जाने-माने प्रतिष्ठान सेन महाशय के मालिक अरुण सेन कहते हैं, 'बंगाल की मिठाइयां उत्तर भारत की मिठाइयों से अलग होती हैं. ये जल्दी ख़राब हो जाती हैं. इसलिए अगर मछली और हरी सब्ज़ियों को जीएसटी के दायरे में नहीं रखा गया है तो मिठाई को भी नहीं रखा जाना चाहिए.'

वह कहते हैं कि मिठाई की अलग-अलग किस्मों पर टैक्स की दरें अलग-अलग होने की वजह से कर्मचारियों को बिल बनाने में काफी मशक्कत करनी पड़ रही है.

मिठाई पर वैट नहीं थाअब जीएसटी क्यों

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Image caption कारोबारियों का कहना है कि बिल बनाने में समस्या हो रही है.

पश्चिम बंगाल में असंगठित मिठाई उद्योग का सालाना टर्नओवर एक हज़ार करोड़ से ऊपर है. इसमें प्रत्यक्ष रूप से लगभग दस लाख लोग काम करते हैं.

पश्चिम बंगाल मिष्ठान्न व्यवसायी समिति का सवाल है कि मिठाई पर वैट लागू नहीं था तो अब जीएसटी क्यों? रसगुल्ले पर जहां पांच फ़ीसदी जीएसटी है, वहीं कई अन्य मिठाइयों के लिए यह दर 12 से 20 फ़ीसदी के बीच है. मगर चॉकलेट वाली मिठाइयों पर इसकी दर 28 फ़ीसदी है.

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Image caption मिष्टी दोई

समिति के अध्यक्ष राम चौरसिया कहते हैं, 'यह कारोबार ज्यादातर असंगठित क्षेत्र में है. टैक्स के मामलों में उनका ज्ञान लगभग शून्य है.'

चौरसिया की दलील है कि यह उद्योग ज़्यादातर कच्चा माल बिना किसी रसीद के खरीदता है. ऐसे में सप्लायर ज़रूरी काग़जात कहां से देंगे? वह कहते हैं कि मुसीबतें तो बढ़ी ही हैं, इससे बंगाल की आत्मा में रची-बसी मिठाइयों की कीमतें भी काफ़ी बढ़ जाएंगी.

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Image caption संदेश

मिठाई की जानी-मानी दुकान बलराम मल्लिक एंड राधारमण मल्लिक के मालिक प्रदीप मल्लिक कहते हैं, 'अलग-अलग मिठाई पर टैक्स की अलग-अलग दरें तमाम मुसीबतों की जड़ है.'

वह कहते हैं कि अगर इस उद्योग को जीएसटी से छूट नहीं दी गई तो असंगठित क्षेत्र में स्थित ज़्यादातर कारोबार ठप हो जाएगा.

तेज़ हो सकता है आंदोलन

वेस्ट बंगाल स्वीटमीट कन्फ़ेक्शनर्स एसोसिएशन के महासचिव रवींद्र कुमार पाल कहते हैं, 'हमने केंद्र को हड़ताल और भूख हड़ताल के बारे में तीन सप्ताह पहले ही सूचित कर दिया था, लेकिन उसने कोई जवाब नहीं दिया है.'

वह कहते हैं कि अगर अगले दो सप्ताह में भी इस मामले में कुछ नहीं हुआ तो व्यापारी अपना आंदोलन तेज़ करेंगे. तब लगातार तीन दिनों तक उद्योग में हड़ताल रहेगी.

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Image caption बिल बनवाने में देरी से ग्राहक भी खीझ रहे हैं

ग्राहक भी खीझ रहे हैं

कुछ लोगों में भी जीएसटी से नाराज़गी है. एक ग्राहक मोहन गुप्ता कहते हैं, 'कीमतें तो बढ़ ही गई हैं, अलग-अलग दरों के चलते बिल बनवाने और भुगतान करने में भी ज़्यादा समय लग रहा है.'

आने वाले वक़्त में संदेश और दही की मिठास दोबारा लौटेगी या कड़वाहट बढ़ेगी, इस सवाल का जवाब फ़िलहाल किसी के पास नहीं है.

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