अंशुल छत्रपति बोले, बीजेपी हो या कांग्रेस सभी गुरमीत राम रहीम को बचाना चाहते थे

अंशुल छत्रपति
Image caption अंशुल छत्रपति

गुरमीत राम रहीम को सीबीआई जज जगदीप सिंह द्वारा सज़ा सुनाए जाने की ख़बर जैसे ही अंशुल छत्रपति को मिली उन्हें अपने पिता याद आने लगे.

अंशुल के पिता रामचंद्र छत्रपति ने अपने अख़बार 'पूरा सच' में वो गुमनाम चिट्ठी छापी थी जिसमें गुरमीत राम रहीम पर एक महिला ने रेप का आरोप लगाया था. बाद में रामचंद्र छत्रपति की उनके घर में हत्या कर दी गई थी.

अंशुल छत्रपति कहते हैं, ''मेरे पिता ने इस कथित संत के ख़िलाफ़ सबसे पहले सरकार, प्रशासन और समाज को अगाह करने की कोशिश की थी, लेकिन तब किसी ने उनकी ना सुनी.''

गुरमीत राम रहीम का 'पूरा सच' सामने लाने वाला पत्रकार

राम रहीम या डंडे वाले पीर में क्या कमीं है

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Image caption सिरसा के स्थानीय पत्रकार रामचंद्र छत्रपति ने छापी थी बाबा के ख़िलाफ़ रिपोर्ट

'किसी राजनीतिक दल ने साथ नहीं दिया'

अपने पिता को याद करते हुए 30 साल के अंशुल भावुक हो रहे थे लेकिन उनकी आवाज़ में ठहराव बरकरार है. टीवी चैनल के सवालों का जवाब वो सोच समझकर दे रहे थे.

अंशुल के पिता रामचंद्र छत्रपति की हत्या के मुक़दमे पर सुनवाई 16 सितंबर से पंचकुला की अदालत में शुरू होने वाली है. छत्रपति पर साल 2002 में हमला हुआ, 28 दिनों तक मौत से लड़ने के बाद सांसों ने उनका साथ छोड़ दिया.

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Image caption रामचंद्र छत्रपति

सोमवार दोपहर को 14 साल बाद कथित संत राम रहीम को रेप के दो मामलों में सज़ा सुनाई गई.

अंशुल से मैंने पूछा, ''इतने लंबे संघर्ष में उनकी हिम्मत ने थकान महसूस नहीं की ?''

अंशुल कहते हैं, ''हां, कई बार ये लड़ाई बहुत मुश्किल लगती थी, ये सवाल भी दिल में आता था कि क्या कभी न्याय मिलेगा!''

वो कहते हैं, ''किसी राजनीतिक दल ने हमारा साथ नहीं दिया. चाहे वो आरएनएलडी हो, बीजेपी हो या कांग्रेस - सभी उसे बचाना चाहते थे, लेकिन ऐसे लोग भी थे जो शहर के थे, मीडिया समाज से थे, जिन्होंने हमारी मदद की और उससे मुझे बहुत ढांढस मिला.''

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Image caption गुरमीत राम रहीम

पिता को न्याय दिलवाकर रहूंगा

अंशुल ख़ासतौर पर अपने वकील लेखराज धोत का नाम लेते हैं, जो उनके साथ उनके घर पर मौजूद हैं और आरोप लगाते हैं कि रामचंद्र छत्रपित के 'मृत्यु के वक्त दर्ज हुए कथन' में भी फेरबदल कर दिया गया.

अंशुल कहते हैं कि हमारे समाज में इस तरह की शिक्षा दी जाती है कि हमें बचपन से ही धर्म, इन बाबाओं और कथित संतों पर सवाल करना नहीं सिखाया जाता.

अंशुल ने पिता का अख़बार बंद कर दिया है और वो खेती-बाड़ी का काम देखते हैं. उनका आरोप है कि अख़बार चलाना उनके लिए मुश्किल हो गया था क्योंकि कुछ लोग उसमें लगातार दिक्कतें और परेशानियां पैदा कर रहे थे.

अंशुल कहते हैं कि उनकी लड़ाई अब अपने पिता को न्याय दिलवाने की है और अगर ज़रूरत पड़ी तो वे इस लड़ाई को ऊंची से ऊंची अदालत तक लड़ेंगे.

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