मोदी सरकार की 'धमाकेदार' योजनाओं का रियलिटी चेक

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रिज़र्व बैंक ऑफ इंडिया (आरबीआई) ने 2016-17 की वार्षिक रिपोर्ट में नोटबंदी को लेकर भी कुछ आंकड़े जारी किए हैं. इन आंकड़ों के सामने आने के बाद नोटबंदी के क़दम को लेकर केंद्र सरकार विपक्ष के निशाने पर है.

विपक्ष सवाल कर रहा है कि जिन कारणों का हवाला देकर सरकार ने अचानक नोटबंदी का फ़ैसला किया था, आरबीआई की रिपोर्ट में वे कारण तर्कसंगत साबित नहीं होते. विपक्ष का कहना है कि नोटबंदी पूरी तरह नाकामयाब रही है और अब सरकार नए-नए बहाने गढ़ रही है.

नोटबंदी मोदी सरकार का इकलौता ऐसा कदम नहीं था जिसे ज़ोर-शोर से उठाया गया हो. 'सर्जिकल स्ट्राइक' के दावे से लेकर 'स्वच्छ भारत अभियान' जैसी योजनाओं को बड़े स्तर पर प्रचारित किया गया था.

नज़रिया: 'नोटबंदी पर पूरी तरह विफल रही मोदी सरकार'

नोटबंदी: 16 हज़ार करोड़ नहीं लौटे वापस

ज़ोर-शोर से प्रचारित इन क़दमों और योजनाओं की आज क्या स्थिति है, हमने जवाब तलाशने की कोशिश की:

क्या नोटबंदी के लक्ष्य पूरे हुए?

पिछले साल 8 नवंबर को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने एलान किया था कि 500 और 1000 रुपये के नोट अर्थव्यवस्था में चलन से हटा लिए जाएंगे. इस क़दम को उठाए लगभग नौ महीने बीत चुके हैं. क्या वाकई नोटबंदी उन लक्ष्यों को हासिल कर पाई है जो इसे लागू करते वक़्त बताए गए थे?

इस सवाल पर जेएनयू में अर्थशास्त्र के पूर्व प्रोफ़ेसर अरुण कुमार बताते हैं कि नोटबंदी लागू करते वक्त सरकार ने तीन लक्ष्य गिनाए थे और उन्हें हासिल करने में वह नाकाम हो गई है.

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उन्होंने कहा, "सरकार ने जो लक्ष्य गिनाए थे, उनमें पहला था- काले धन पर अंकुश लगेगा. दूसरा लक्ष्य नकली नोटों को पकड़ना था और तीसरा यह कि उस वक्त कहा जा रहा था कि ये नकली नोट कई लाख करोड़ के हैं जिनसे आतंकवाद फाइनेंस हो रहा है, चाहे वह नक्सलवाद हो या कश्मीर और नॉर्थ ईस्ट का आतंकवाद."

प्रोफेसर अरुण ने कहा, "अब आरबीआई के मुताबिक़ 99 फ़ीसदी नोट वापस आ गए हैं और क़रीब 16 हज़ार करोड़ रुपये वापस नहीं आए हैं. नकली नोट भी सिर्फ़ 40 करोड़ निकले हैं. तो यह बात तो साबित हो गई कि 3-4 लाख करोड़ नकली नोट होने की जो बात कही जा रही थी जिन्हें आतंकवादी या नक्सलवादी इस्तेमाल कर रहे हैं, वह सही नहीं निकली."

'सरकार को माननी होगी नाकामी'

प्रोफ़ेसर अरुण ने कहा कि न काले धन की अर्थव्यवस्था पर असर पड़ा है, न नकली नोटों की संख्या अनुमान के मुताबिक निकली और न ही ऐसा लग रहा है कि नक्सलवाद या आतंकवाद ख़त्म हो गए हों.

उन्होंने कहा, ''मेरा मानना है कि सरकार को अब यह स्वीकार करना पड़ेगा कि शुरू में इन्होंने जो सोचा था, वह हुआ नहीं है. इसीलिए सरकार अपना रुख़ बदल रही है और कह रही है कि इससे डिजिटाइज़ेशन होगा, टैक्स बेस बढ़ेगा. इसका असर कितना है, यह तो आने वाले वक़्त में ही दिखेगा. मगर ओरिजनल स्कीम तो फ़ेल हो गई है.''

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पड़ोसी देशों को लेकर भारत की नीति कितनी कामयाब?

हाल के दिनों में चीन के साथ डोकलाम को लेकर भारत का गतिरोध लंबे समय तक बना रहा. दोनों देशों ने अपने रुख़ में नरमी तो लाई, मगर बयानबाज़ी और तनातनी के लंबे दौर के बाद. पड़ोसी मुल्कों को लेकर भारत की नीति पर बात करते हुए वरिष्ठ पत्रकार मनोज जोशी कहते हैं कि चीन को लेकर मोदी सरकार की नीति में काफ़ी कमजोरियां हैं.

उन्होंने कहा, 'सीमा विवाद को लेकर बातचीत एक स्तर पर पहुंच गई थी, मगर इसके बाद पॉलिटिकल समझौते की ज़रूरत थी. भारत सरकार ने एनएसजी और मसूद अज़हर के मुद्दे जो मेरे लिहाज़ से छोटे मुद्दे हैं, ज़ोर-शोर से उठाए. जहां चीज़ें शांति से हल हो सकती थीं, वहां इन्हें उठाकर चीन पर दबाव डालने की कोशिश की, जिसका उल्टा ही असर हुआ.'

'नेपाल में भारत के ख़िलाफ़ नाराज़गी'

नेपाल को लेकर मोदी सरकार के रुख़ पर बात करते हुए जोशी बताते हैं कि तथाकथित नाकेबंदी का उल्टा असर हुआ है. उन्होंने कहा, 'मेरे विचार से नेपाल में जो अगला चुनाव होगा, उसमें केपी शर्मा ओली दोबारा प्रधानमंत्री बन सकते हैं और उनके विचार भारत विरोधी हैं. नेपाल में भारत के ख़िलाफ़ माहौल बनता जा रहा है.'

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मोदी सरकार के आने के बाद पाकिस्तान की नीति को आप कैसे देखते हैं- यह पूछे जाने पर जोशी ने कहा कि 'पाकिस्तान, कश्मीर या चीन के मामले में विवाद काफ़ी पेचीदे हैं और आसानी ने नहीं सुलझ सकते. इसलिए सुलझाने से ज़्यादा ज़रूरी उन्हें मैनेज करना है.'

मनोज जोशी ने कहा, ''ज़रूरी है कि हिंसा को कम किया जाए. मगर हिंसा का स्तर बढ़ गया है. बातचीत पर ध्यान नहीं दिया गया है. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी लाहौर में उतरे थे तो एक जोश सा पैदा हुआ था, मगर वह ख़त्म हो गया है. पठानकोट हमले के बाद मोदी जी का रुख़ बिल्कुल बदल गया है.''

'वैश्विक नीति में दिख रहा अमरीका का असर'

कूटनीतिक स्तर पर भारत की वैश्विक स्थिति पर जोशी कहते हैं कि इस बारे में कुछ साफ़ नहीं कहा जा सकता. उन्होंने कहा, ''चीन के साथ रिश्ते कमज़ोर हुए हैं, पाकिस्तान के साथ ठीक नहीं है, नेपाल के साथ भी जटिल समस्याएं आई हैं. हमारी कूटनीति अमरीका पर निर्भर करती है. ऐसा लगता है कि सबकुछ अमरीका के सामने रखा गया है. हमारी वैश्विक नीति अमरीका के समर्थन से आगे बढ़ रही है. हमारा स्वतंत्र नज़रिया नज़र नहीं आ रहा.''

'सर्जिकल स्ट्राइक' का कुछ असर हुआ?

सर्जिकल स्ट्राइक का दावा करने के बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी समेत कई मंत्री और सत्ताधारी बीजेपी के नेता बार-बार कहते रहे हैं कि पूरी दुनिया ने भारत का लोहा माना है और आज हमारी तरफ़ कोई आंख उठाकर नहीं देख सकता.

सरकार का यह भी दावा था कि इस कार्रवाई के बाद घुसपैठ और आतंकवाद में कमी आएगी. क्या ये बातें सही साबित हुई हैं? इस सवाल के जवाब में वरिष्ठ पत्रकार सुशांत सिंह बताते हैं कि ये दावे पूरे साबित नहीं हुए हैं.

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उन्होंने कहा, ''पाकिस्तान की तरफ़ से न तो आतंकवादी गतिविधियां रुकीं और न ही कश्मीर में आतंकवादियों को भेजा जाना. ये गतिविधियां तो चल ही रही हैं. इनमें कोई रुकावट देखने को नहीं मिली है.''

सुशांत सिंह ने कहा, ''सरकार का यह दावा भी नहीं था कि यह सब पूरी तरह रुक जाएगा. मगर उसे उम्मीद थी कि शायद इससे थोड़ा फ़र्क पड़ेगा. मगर समझने वाली बात यह भी है कि पाकिस्तान ने तो स्वीकार ही नहीं किया है कि ऐसा कोई सर्जिकल स्ट्राइक किया गया. तो जब सर्जिकल स्ट्राइक हुई ही नहीं, तो उसका असर कैसे पड़ेगा?''

स्वच्छ भारत, स्किल इंडिया, मेक इन इंडिया कहां पहुंचे?

स्वच्छ भारत अभियान, स्किल इंडिया और मेक इन इंडिया जैसे कई सारे अभियान भी सरकार ने ज़ोर-शोर से शुरू किए थे. मगर आज ज़मीन पर इनका असर दिख भी रहा है या नहीं, इस बारे में बीबीसी से बाचतीत करते हुए वरिष्ठ पत्रकार सुषमा रामचंद्रन ने कहा कि 'इन योजनाओं का मकसद अच्छा है, दिशा अच्छी है मगर ज़मीन पर अब तक बहुत कुछ नहीं हुआ है.'

'लोगों में जागरुकता बढ़ी है'

स्वच्छ भारत अभियान पर उन्होंने कहा कि इससे बड़ी चीज़ यह हुई कि लोग स्वच्छता के बारे में सोचने लगे हैं. उन्होंने कहा, ''हम यह तो नहीं कह सकते कि शहरों में बहुत स्वच्छता आ गई है, लेकिन लोग जागरुक हुए हैं और इस बारे में बात करने लगे हैं.''

शौचालय बनाए जाने को लेकर छेड़े गए अभियान को अच्छी पहल मानते हुए सुषमा रामचंद्रन ने कहा, ''यह सकारात्मक पहल है. आंकड़े दिखाते हैं कि बहुत सारे टॉयलट बने हैं मगर इनमें से काफ़ी सारे इस्तेमाल नहीं होते. मगर इनमें से 60-70 प्रतिशत भी इस्तेमाल हो रहे हैं तो यह अच्छी चीज़ है.''

स्किल इंडिया पर उन्होंने कहा कि इसमें प्रगति नज़र नहीं आ रही. उन्होंने कहा, ''स्किल इंडिया के लिए वर्कशॉप करवाने वाली कंपनियां ख़ुद विकसित नहीं हैं. ट्रेनिंग भी अच्छी नहीं है. इस पर बहुत काम करने की ज़रूरत है. पैसा खर्च हो रहा है मगर इससे जो परिणाम निकलने चाहिए थे, वे दिख नहीं रहे. इसकी कामयाबी दिखाने वाले आंकड़े भी नहीं आए हैं.''

'सभी क्षेत्रों में नहीं हुआ काम'

मेक इन इंडिया को लेकर उन्होंने कहा कि बहुत सालों से हम सुनते आ रहे हैं कि हमें अपने देश में चीज़ें बनानी चाहिए. उन्होंने कहा, ''समझ लीजिए कि इसे नई बोतल में पुरानी शराब की तरह परोसा गया है.''

हालांकि सुषमा बताती हैं कि कुछ क्षेत्रों में यह सफल भी हुआ है. उन्होंने कहा, ''सरकार ने इलेक्ट्रॉनिक्स में काफ़ी बढ़ावा दिया है जिससे काफ़ी इन्वेस्टमेंट हुआ है. भारत में फ़ोन, लैपटॉप या कंप्यूटर बनाने की दिशा में में इन्वेस्टमेंट हो रहा है. बाकी क्षेत्रों में बहुत ज़्यादा नहीं हुआ है.''

वरिष्ठ पत्रकार सुषमा ने कहा कि इस योजना की कामयाबी व्यापार करने की सहूलियत पर निर्भर करती है, मगर भारत बाकी देशों की तुलना में बहुत पीछे है. उन्होंने कहा कि 'ईज़ ऑफ डूइंग बिज़नेस' में हम आगे नहीं बढ़े हैं.

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