नज़रिया: उमा भारती को पुचकार कर रखना बीजेपी की मजबूरी?

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Image caption तस्वीर 2004 की, जब नरेंद्र मोदी गुजरात के और उमा भारती मध्य प्रदेश की मुख्यमंत्री थीं

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी चाहते तो राजीव प्रताप रूडी की तरह उमा भारती को भी मंत्रिमंडल से बाहर कर सकते थे. लेकिन उन्होंने ऐसा नहीं किया. उमा भारती का विभाग बदला गया पर वो कैबिनेट में बनी रहीं.

उमा भारती का मंत्रिमंडल में बने रहना प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सीमाओं की ओर इशारा करता है. इससे मोदी के सर्वशक्तिमान होने के मिथक पर भी सवाल खड़ा हो जाता है. क्या उमा भारती को सहन करना नरेंद्र मोदी की मजबूरी है?

इस सवाल का जवाब तलाशने से पहले उमा भारती के व्यक्तित्व पर एक नज़र:

  • उमा भारती राजनीति के कारण लोकप्रिय नहीं हुईं बल्कि बचपन से धारा प्रवाह गीता प्रवचन करने के कारण कई लोग उनके चरण छूते थे.
  • धार्मिक प्रवचन में उनकी महारत ने विजया राजे सिंधिया को इतना प्रभावित किया कि उन्होंने उमा भारती को अपने आश्रय में ले लिया और राजनीति में महारत दिलाई.
  • उमा भारती भले ही भारतीय जनता पार्टी के बड़े बड़े नेताओं - लालकृष्ण आडवाणी और यहां तक कि नरेंद्र मोदी के ख़िलाफ़ भड़की हों और बीजेपी छोड़कर बाहर निकल गई हों पर वो हमेशा राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की दुलारी बनी रहीं.
  • हिंदुत्व की विचारधारा की प्रबल समर्थक उमा भारती ने सिर्फ़ संघ के आशीर्वाद से राजनीति में अपनी जगह नहीं बनाई बल्कि पिछड़ी जातियों की नेता के तौर पर ज़बरदस्त जनाधार के कारण वो अपनी शर्तों पर राजनीति करने में कामयाब रहीं.

यही कारण हैं कि वो उन्होंने बार बार पार्टी अनुशासन को ठेंगा दिखाया इसके बावजूद उन्हें पुचकार कर रखना बीजेपी की मजबूरी हो गई है.

'हिंदुत्व पर तेवर बने रहे'

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बीजेपी के कर्ता-धर्ताओं को एहसास है कि 'तुनकमिज़ाज' उमा भारती पार्टी और सत्ता की परिधि से बाहर किए जाने पर ज़्यादा ख़तरनाक साबित हो सकती हैं.

उन्होंने साबित किया है कि अगर वो चिढ़ गईं तो किसी की परवाह नहीं करतीं क्योंकि उन्हें ये भरोसा है कि राजनीतिक बॉस नाराज़ भी हो जाएं तो संघ के बॉस उन्हें ज़रूर दुलराएंगे क्योंकि उन्होंने भले ही राजनीति में एक क़दम आगे, दो क़दम पीछे किए हों मगर हिंदुत्व के मुद्दों पर कभी अपने तेवर ढीले नहीं किए - चाहे वो बीजेपी में रही हों या बीजेपी से बाहर.

बहुत से लोगों को उमा भारती के वो कड़क तेवर याद होंगे जब उन्होंने 2004 में लालकृष्ण आडवाणी की मौजूदगी की परवाह न करते हुए भारतीय जनता पार्टी की बैठक में खड़े होकर सभी नेताओं को खरी खोटी सुनाई और दनदनाते हुए बाहर निकल गईं.

उन्हें 2004 में निलंबित किया गया और 2005 में पार्टी से निकाल ही दिया गया. पर उमा भारती ने इस फ़ैसले को सिर झुका कर मंज़ूर नहीं किया बल्कि पार्टी अनुशासन और परंपरा की परवाह किए बग़ैर भारतीय जनशक्ति पार्टी बना ली और हर मंच से बीजेपी पर हमले करने शुरू कर दिए.

मोदी को कहा था विनाश पुरुष

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उन्होंने गुजरात जाकर भरी प्रेस कॉन्फ़्रेंस में तत्कालीन मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी को "विकास नहीं विनाश पुरुष" कहा था. साथ ही गुजरात के "हिंदुओं में भय के वातावरण" के लिए मोदी को सीधे तौर पर ज़िम्मेदार ठहराया था.

छह साल तक पार्टी से बाहर रहने के बाद 2011 में उमा भारती एक बार फिर से बीजेपी में शामिल कर ली गईं और उन्हें उत्तर प्रदेश में ख़स्ता हाल पार्टी इकाई को पुनरुज्जीवित करने की ज़िम्मेदारी सौंपी गई. ये वो दौर था जब नरेंद्र मोदी दिल्ली आने के मंसूबे बना रहे थे मगर दिल्ली की राजनीति में उनका दख़ल सीमित था.

नरेंद्र मोदी के बारे में भी कहा जाता है कि वो अपने विरोधियों को कभी भूलते नहीं. इसके बावजूद जब वो प्रधानमंत्री बने तो उन्हें उमा भारती को मंत्रिमंडल में लेना ही पड़ा. और अब पिछले तीन साल के रिपोर्ट कार्ड को देखते हुए उमा भारती से उनका मंत्रालय तो छीन लिया गया पर उन्हें मंत्रिमंडल से बाहर नहीं किया जा सका.

शपथ ग्रहण समारोह में नहीं पहुंचीं उमा

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Image caption नए कैबिनेट विस्तार के बाद की तस्वीर

नदी विकास और गंगा संरक्षण मंत्रालय से छुट्टी किए जाने पर उमा भारती ने अपनी तरह से नाराज़गी ज़ाहिर की और शपथ ग्रहण समारोह में शामिल नहीं हुईं. हालांकि उन्होंने कहा ये कि पहले से तय कार्यक्रम के कारण वो शपथ ग्रहण समारोह में शरीक नहीं हो पाईं.

ये सीधे सीधे नरेंद्र मोदी के फ़ैसले से असहमति जताने का तरीक़ा था. समारोह में हालाँकि राजीव प्रताप रूडी भी शामिल नहीं हुए पर उनकी ग़ैरमौजूदगी के बहुत गहरे मायने नहीं हैं क्योंकि वो मंत्रिमंडल से ही बाहर कर दिए गए हैं और अब संगठन की ज़िम्मेदारी उन्हें दी जाएगी.

पर उमा भारती को मंत्रिमंडल से नहीं हटाया गया है - इसके बावजूद उन्होंने मोदी के फ़ैसले को चुपचाप शिरोधार्य करने की बजाय अपने तरीक़े से अपनी असहमति ज़ाहिर कर दी. ये एक तरह से मोदी के फ़ैसले की अवहेलना थी और वही व्यक्ति ऐसी अवहेलना कर सकता है जो ये मानता हो कि उसकी राजनीति मोदी की कृपा के भरोसे नहीं चल रही.

नरेंद्र मोदी की सीमाएं

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उमा भारती के इस आत्मविश्वास के पीछे राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के अधिकारियों से उनकी नज़दीकियां तो हैं ही, साथ ही पिछड़ी जातियों के नेता के तौर पर उनका अपना जनाधार भी है.

उमा भारती को विश्वास है कि संघ की नज़र में भारतीय जनता पार्टी की वही हैसियत है जो किसी दूसरे आनुषांगिक संगठन की. यानी संघ के अधिकारी बीजेपी को निर्देश दे सकते हैं पर बीजेपी के नेता संघ को निर्देशित नहीं कर सकते.

ऐसे में उमा भारती को विश्वास है कि जब तक संघ के अधिकारियों का आशीर्वाद उनके साथ है, नाराज़गी या तुनकमिज़ाजी का इज़हार करना कोई घाटे का सौदा नहीं है. वैसे भी उमा भारती उन नेताओं में से नहीं हैं जिन्हें हाशिए पर डालकर 'न्यूट्रलाइज़' किया जा सकता हो.

इसलिए उमा भारती को पुचकार कर रखना संघ की और भारतीय जनता पार्टी की मजबूरी है और यही वो सीमा रेखा है जहाँ नरेंद्र मोदी समझौता करते नज़र आते हैं.

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