गौरी लंकेश ने अमित शाह को भी नहीं बख़्शा

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गौरी लंकेश की हत्या के बाद से ही देश में पत्रकारिता और एक्टिविज़्म के बीच बहस शुरू हो गई है. इन दोनों में ही महीन सा फर्क है.

गौरी जब तक अंग्रेजी के लिए लेखन करती रहीं तब तक वे अपने नियमों के प्रति दृढ़ रहीं. लेकिन कन्नड़ पत्रकारिता में जाने के बाद उन्होंने अपने पिता पी. लंकेश की 'लंकेश पत्रिका' की कमान संभाल ली और इस के साथ ही उनका झुकाव एक्टिविज़्म की तरफ होने लगा.

फिर चाहे माओवादियों को मुख्यधारा में शामिल करने की बात हो, मुस्लिम संगठनों का समर्थन करना हो या फिर आरएसएस की विचारधारा के ख़िलाफ़ लिखना हो, गौरी लगातार हिंदुत्व ताकतों के सामने एक कड़ी आलोचक के रूप में उभरीं.

लंकेश पत्रिका में मई के बाद शायद ही ऐसा कोई भी अंक हो जिसमें आरएसएस या बीजेपी नेताओं की खिंचाई करते हुए कवर स्टोरी या संपादकीय न छपा हो.

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अमित शाह को बोला भगवाधारी गंजा

गौरी लंकेश के भाई ने जब 'लंकेश पत्रिका' नाम पर अपना अधिकार जमा लिया तो गौरी लंकेश ने 'गौरी लंकेश पत्रिका' नाम से अपना अलग अख़बार शुरू किया. इस अखबार के 30 अगस्त के अंक में बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह तक को नहीं बख़्शा.

इस अंक की कवर स्टोरी का शीर्षक था 'कर्नाटक को जलाने आए भगवाधारी गंजे की कहानी'. इस खबर में बताया गया कि अमित शाह कर्नाटक में मीडिया का भगवाकरण करने आए हैं और साथ ही कर्नाटक में ओक्कालिगा के साथ बीजेपी के संबंधों पर भी पार्टी का बचाव करने आए हैं. ओक्कालिगा दक्षिणी कर्नाटक में उच्च जाति के प्रभुत्व वाला समुदाय है.

पत्रकार से सामाजिक कार्यकर्ता बने प्रकाश बेलवाड़ी ने बीबीसी को बताया कि जब गौरी लंकेश की पिता की मृत्यु हुई उसके बाद उन्होंने लंकेश पत्रिका की कमान संभाली और फिर पूरी तरह से अपने राजनीतिक विचार रखने लगीं.

बेलवाड़ी बताते हैं कि ''दलित, मुस्लिम या अन्य समुदाय की बात रखने से पहले गौरी सीपीआई(एम-एल) द्वारा उठाए गए मुद्दों का खुलकर समर्थन करने की वजह से राज्य प्रशासन की नज़र में आईं. इसके बाद वे पूरी तरह से हिंदुत्व विरोध की पक्षधर बन गईं.

बेलवाड़ी की ये बातें इसलिए भी जरूरी हैं कि क्योंकि गौरी और बेलवाड़ी 2014 तक करीबी दोस्त थे लेकिन लोक सभा चुनाव के वक्त जब बेलवाड़ी नरेंद्र मोदी का समर्थन करने लगे तो दोनों ने एक दूसरे को सोशल मीडिया पर ब्लॉक कर दिया.

गौरी लंकेश से आख़िर किसे ख़तरा था?

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व्यंग्यों से करती थी हमला

लंकेश पत्रिका में छपने वाले शीर्षक उसके पूरे स्वरूप के बारे में बता देते हैं. जुलाई अंक में प्रकाशित कवर स्टोरी का शीर्षक था 'भट के लिए और कितनी हत्याएं होगीं ?'

यह ख़बर कल्लडका प्रभाकर भट पर केंद्रित थी, जो हिंदुत्व ध्रुविकरण और लव जिहाद के लिए जाना जाता है.

गौरी के टैब्लाइड में आरएसएस के लिए अक्सर 'चड्डीवाला' शब्द का प्रयोग किया जाता था.

कन्नड़ कवयित्री ममता सागर कहती हैं, ''चाहे जो भी हो, गौरी के लेखन में कभी हिंसा नहीं झलकती थी, वे व्यंग्य के माध्यम से अपने विरोधियों से लड़ती थी.''

फिल्मकार केएम चैतन्य कहते हैं, ''गौरी फेक न्यूज़ से बहुत परेशान थी, जिन मुद्दों पर वे बात करती थी उस वजह से उन्हें ट्रोल किया जाता था, गौरी ने कभी भी असहिंष्णुता की बात नहीं की, ना ही उन्होंने कभी किसी को मारने-पीटने को कहा.''

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आईएएस रवि की आत्महत्या का सच सामने लाईं

कुछ वक्त के लिए गौरी ने अंग्रेजी प्रकाशन में भी कॉलम लिखे. अपने लेखों में वो ज़िंदगी की सच्चाईयों को सामने रखने से कभी नहीं हिचकिचाईं.

जब आईएएस अफसर डी.के रवि ने जमीन सौदे में गैरकानूनी संबंधों के आरोप लगने के चलते आत्महत्या की तो कई लोगों को इस पर भरोसा नहीं हुआ. तब गौरी ने काफी स्पष्ट परिप्रेक्ष्य के साथ इस पूरे मुद्दे को सभी के सामने रखा.

गौरी ने लिखा, ''अपनी तमाम बेहतरीन खूबियों के बाद भी रवि भी एक इंसान थे. हम सब की तरह. जिस तरह उनकी प्रोफेशनल ज़िंदगी थी उसी तरह उनकी निजी ज़िंदगी भी थी. उनकी भी कमजोरियां और मजबूती थी. शायद निजी ज़िंदगी की मुश्किलों का सामना करने में खुद को असमर्थ पाकर उन्होंने एक दिन इसे ख़त्म कर दिया.''

टीवी चैनल चिल्लाते रहे और आम भीड़ ने भी उनके सुर से सुर मिलाए कि ''यह हत्या का एक मामला है''. जब नोआम चोमस्की और एडवर्ड एस हर्मन ने लिखा, ''मैंन्युफैक्चरिंग पब्लिक कॉन्सेंट'', उनका सीधा मतलब यही था.

गौरी के अख़बार की टैगलाइन थी, मनोरंजन, प्रचार और उत्तेजना के लिए कन्नड़. उनका प्रकाशन पूरी तरह सब्सक्रिप्शन और डोनेशन पर चलता था. वह विज्ञापन नहीं लेती थीं. पत्रकारिता और आंदोलन के बीच चलने का यह रास्ता गौरी का था.

सागर ने कहा, ''उन्होंने जो सोचा वह लिख दिया. हम में से कोई ये नहीं चाहता था जो उनके साथ हुआ. लोगों को किसी और चीज से ज़्यादा यह हत्या डराएगी.'

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