नज़रिया: 'रेप, लिंचिंग...शुक्र है हमारे पास सुप्रीम कोर्ट है'

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समाज में हमेशा से विभिन्न असहमतियों की मौजूदगी रही है, लेकिन आज किसी के विचार से असहमत होने पर क्या हो रहा है.

मुझे याद है कि 2016 में अमरीकी राष्ट्रपति चुनाव प्रचार के दौरान बराक ओबामा ने कहा था कि डर लोकतंत्र को मारता है, डर बोलने से रोकता है इसलिए ज़रूरी है कि लोकतंत्र के लिए भारत में बोला जाए.

हिंदुत्ववादी ताक़तों की तरफ़ से बोलने की आज़ादी पर ख़तरा मंडरा रहा है और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया में होने वाली अर्थहीन बहसों ने समाज का ध्रुवीकरण किया है और ज़हर भर दिया है. केवल विरोध और दुर्व्यवहार के कारण कोई भी सभ्य व्यक्ति टीवी पर दिखना नहीं चाहता है.

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क़ानून ही ज़रिया

यह वही परिस्थिति है जिसमें हम ख़ुद के लिए लोकतांत्रिक अधिकारों की रक्षा के क़ानून का उपयोग कर रहे हैं. सौभाग्य से इस देश की अदालतों में अभी भी सभ्य तर्क किए जा सकते हैं. क़ानून ही एक ज़रिया है जिससे ग़रीब और हाशिए पर मौजूद लोग अपनी रक्षा कर सकते हैं. उनके पास कोई पैसा, कोई ताक़त, कोई नेटवर्क नहीं, लेकिन उनके पास क़ानून है.

निजता पर सुप्रीम कोर्ट के हालिया फ़ैसले ने कई लोगों को हिम्मत दी है और यह संदेश दिया है कि हमारी आवाज़ सुनी जाएगी. इस फ़ैसले ने सरकार के बहुमत को तोड़ा है और उसे नागरिकों के प्रति कर्तव्यों की याद दिलाई है.

इसी वजह से मुझे प्रेरणा मिली कि मैं गौरक्षकों के ख़िलाफ़ याचिका दायर कर पाऊं ताकि और मौतें न हो सकें. यह मामला उस सुबह सुना गया जब गौरी लंकेश की हत्या की जा चुकी थी और बेशक इस बात का मुझे बेहद दुख था. जब बंदूकें निकलती हैं तब क़ानून शांत हो जाता है.

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ऐसे देश के लिए स्वतंत्रता चाही?

महात्मा गांधी के पोते तुषार गांधी ने यह याचिका दायर की थी. मैंने अदालत में कहा, "अहिंसा राष्ट्र की स्थापना का पहला तत्व था, लेकिन आज एक राष्ट्र के तौर पर हमारे साथ क्या हो रहा है."

हम केवल हिंसा ही नहीं बल्कि बलात्कार, नाबालिगों के गर्भवती होने, महिलाओं को भीड़ द्वारा मार देने, दलितों और दूसरों द्वारा गौमांस खाने पर शक करने और वैचारिक तौर पर असमहत लोगों की हत्या को भी स्वीकार करते हैं. क्या यह वही देश है जिसके लिए हमने स्वतंत्रता चाही थी?

मुझे मालूम है कि हम हिंदुत्ववादी राजनीति का सामना कर रहे हैं, लेकिन हमारा संविधान लोकतांत्रिक और धर्मनिरपेक्ष है जिसका इस्तेमाल हमें करना चाहिए.

किसी व्यक्ति को किसी भी कारण भीड़ द्वारा खींच कर मार देने की घटना की जांच के लिए सुप्रीम कोर्ट ने हर राज्य को एक नोडल अफ़सर मनोनीत करने का फ़ैसला दिया है ताकि क़ानून बनाया रखा जा सके. साथ ही सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र को कहा है कि वह राज्यों को निर्देश दे कि गौरक्षकों के ख़िलाफ़ बिल्कुल नरमी न बरती जाए.

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भीड़ द्वारा हत्या राष्ट्रीय महत्व का मुद्दा

मैंने कोर्ट को सलाह दी थी कि यह केवल क़ानून-व्यवस्था की दिक्कत नहीं है जिससे राज्यों को निपटना है बल्कि यह एक राष्ट्रीय महत्व का मुद्दा है. भीड़ द्वारा पीट-पीटकर मारने की घटनाओं को रोकने से हमारा आकलन किया जाना चाहिए न कि लोगों के मारे जाने की संख्याओं से.

तुषार गांधी के मामले में आया आदेश काफ़ी राहत भरा है. यह भारत राष्ट्र को निर्दोष नागरिकों की मौत को लेकर जवाबदेह बनाएगा. लोकतंत्र की सबसे कड़ी परीक्षा यह होती है कि उसके यहां अल्पसंख्यक कितने सुरक्षित हैं. भारत में एक नया अल्पसंख्यक समुदाय है जो असहमत है. वह भारत को हिंदुतत्ववादी राष्ट्र के रूप को नकारता है और धर्मनिरपेक्षता उसका सबसे बुनियादी तत्व है. लोकतंत्र के सिकुड़ते दायरे को रोकने के लिए यही एकमात्र जगह है.

यही एक काम कोर्ट में हो रहा है और मुझे विश्वास है कि देश में जो कुछ हो रहा है, कोर्ट उस पर ध्यान देगा. यह हमारा सौभाग्य है कि सरकार और इस देश के लोग सुप्रीम कोर्ट के फ़ैसले का अभी भी सम्मान करते हैं. यह लोकतंत्र की मज़बूती है.

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