नज़रिया: 'गौरी लंकेश तो ठीक पर दूसरे पत्रकारों के लिए कब उठेगी आवाज़'

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बंगलुरु में वरिष्ठ पत्रकार गौरी लंकेश की नृशंस हत्या से सब स्तब्ध हैं और नाराज़ भी. देश के कोने-कोने में इसका विरोध हो रहा है.

पत्रकार ही नहीं, समाज के दूसरे तबके भी अपने गुस्से का इज़हार कर रहे हैं. विरोध इसलिए भी हो रहा है कि हत्याओं का एक सिलसिला-सा चल पड़ा है.

एक के बाद एक पत्रकारों और बुद्धिजीवियों को मारा जा रहा है, मगर हत्यारे पकड़े नहीं जा रहे. इन हत्याओं में एक ख़ास तरह का पैटर्न है.

ये साफ़ दिख रहा है कि हत्यारे एक ही सोच के लोग हैं और उनका संबंध एक ही तरह की राजनीति तथा एक ही तरह की विचारधारा से है.

वे संगठित हैं और उनके नेता उनकी हौसला अफज़ाई कर रहे हैं, उनकी करतूतों को सीधे न सही परोक्ष रूप से सही ठहरा रहे हैं.

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सत्ता का विरोध

इससे भय और असुरक्षा का माहौल बनता जा रहा है जिसमें पत्रकारों के लिए स्वतंत्र होकर काम करना मुश्किल हो गया है.

ख़ास तौर पर उन पत्रकारों के लिए जो सत्ता के विरोध में लिखते-बोलते हैं.

इसलिए ये स्वाभाविक ही है कि गौरी लंकेश की हत्या पर राष्ट्रव्यापी प्रतिक्रिया हो रही है. बल्कि ऐसा नहीं होता तो ये हैरत और अफ़सोस की बात होती.

लेकिन इस तरह के सवाल भी उठाए जा रहे हैं कि पत्रकार और लोग तभी क्यों जागते हैं जब बड़े शहरों में रहने वाले खाते-पीते या कथित ऊँची जातियों के पत्रकार निशाना बनते हैं?

छोटे शहरों-कस्बों और दूर-दराज़ के इलाक़ों में जब पत्रकारों पर ज़ुल्म ढाए जाते हैं, तब भी इसी शिद्दत से आवाज़ें क्यों नहीं उठतीं?

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मीडिया का एजेंडा

अव्वल तो ये सही है कि पत्रकारों पर होने वाले सभी हमलों पर इस तरह की प्रतिक्रिया देखने में नहीं आती और इसके पीछे कुछ आग्रह-पूर्वाग्रह भी होते ही हैं. लेकिन ऐसा दूसरे मामलों में भी होता है.

दूर-दराज़ के इलाक़ों में होने वाले अपराधों को अनदेखा कर दिया जाता है जबकि जेसिका लाल हत्याकांड जैसी घटनाओं पर कैंडल लेकर लोग इंडिया गेट पर उमड़ पड़ते हैं.

एक वजह ये भी है कि चूँकि दिल्ली और बड़े शहरों में मीडिया का जमावड़ा होता है और अगर कोई मुद्दा उठाया जाता है तो उसे व्यापक कवरेज़ मिलती है.

इसका असर पूरे देश पर पड़ता है और लोग जुटने लगते हैं. मीडिया का अपना एजेंडा भी होता है.

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पत्रकारों की हत्याएं

वह कभी व्यावसायिक लोकप्रियता के लिए तो कभी दूसरे मक़सदों से कवरेज का आकार-प्रकार तय करता है.

लेकिन इस सबके बावजूद सचाई तो यही है कि हमारा प्रतिरोध नगर केंद्रित है और पत्रकारिता इसका अपवाद नहीं है.

सन् 1992 से 2017 तक हिंदुस्तान में 41 पत्रकारों की हत्याएं हुई हैं और इसमें सभी हिंदी तथा भारतीय भाषाओं के पत्रकार हैं.

इसका मतलब यही है कि अधिकांश हत्याएं प्रदेशों में और दूर-दराज़ के इलाक़ों में हुई हैं.

ग़ौरतलब है कि इन हत्याओं पर कभी कोई राष्ट्रव्यापी प्रदर्शन नहीं हुआ, न ही राष्ट्रीय स्तर पर ये चिंता का विषय बनीं.

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पत्रकारों का दमन आम बात

अक्सर तो हत्याओं की ख़बरें दबा दी गईं या फिर उन्हें उतनी तवज्जो नहीं मिली.

मिसाल के तौर पर बाबा राम रहीम के अपराधों की जान का जोख़िम उठाकर रिपोर्टिंग करने वाले रामचंद्र छत्रपति को ले लीजिए.

आज उनकी हर तरफ़ चर्चा हो रही है, मगर जब उनकी हत्या कर दी गई थी, तब उस पर कोई हो-हल्ला नहीं हुआ था.

छत्तीसगढ़ में तो पत्रकारों और स्वयंसेवियों का खुल्लमखुल्ला सरकारी दमन चल रहा है. झूठे आरोपों में पत्रकारों को फँसाकर जेल में ठूँसा गया है.

उन्हें परेशान भी किया जा रहा है. मगर उनको लेकर ऐसी राष्ट्रव्यापी प्रतिक्रिया कभी देखने को नहीं मिली.

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Image caption रामचंद्र छत्रपति

पत्रकार बिरादरी

उत्तर प्रदेश और बिहार में पत्रकारों की लगातार हत्याएं हो रही हैं. पूर्वोत्तर भारत और जम्मू-कश्मीर में तो पत्रकारिता करना हमेशा से जोखिम भरा रहता है.

इन इलाक़ों में पत्रकारों को पुलिस, सेना और आतंकवादी तीनों से ख़तरा रहता है. हाल के वर्षों में इस तरह की हत्याएं बढ़ी हैं.

गौरी की हत्या के पहले तीन साल के अंदर ही पंद्रह पत्रकार मारे जा चुके हैं मगर बहुत कम मामलों में विरोध के स्वर सुनाई पड़े.

एक तो उनकी रिपोर्टिंग ही बहुत कम हुई और दूसरे उनको लेकर ख़ुद पत्रकार बिरादरी का रवैया उपेक्षापूर्ण रहा.

इसकी शिकायत छोटे शहरों और कस्बों में काम करने वाले पत्रकार अकसर करते रहते हैं. उनका कहना है कि वे सबसे मुश्किल हालात में काम करते हैं, मगर उन्हें किसी तरह का संरक्षण नहीं मिलता.

पत्रकार बिरादरी तक उनका साथ नहीं देती, उन्हें अकेला छोड़ देती है.

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संस्थान का साथ?

निचले स्तर पर काम करने वाले अधिकांश पत्रकार या तो स्थानीय शासन-प्रशासन के भ्रष्टाचार को उजागर करने की वजह से या फिर आपराधिक किस्म के नेताओं-ठेकेदारों को बेनकाब करने के कारण हिंसा के शिकार होते हैं.

वहाँ उनकी मदद करने वाला कोई नहीं होता. आँकड़ों के मुताबिक 46 प्रतिशत हत्याएं राजनीतिक कारणों से हुईं जबकि 35 फ़ीसदी के पीछे अवैध खनन माफ़िया था.

कई बार पत्रकार अपने ग़लत कामों की वजह से मारे जाते हैं, मगर हत्याएं तो आख़िर हत्याएं ही हैं.

अफ़सोस की बात तो ये है कि जिन अख़बारों या टीवी चैनलों के लिए पत्रकार काम करते हैं वे भी उनके पीछे नहीं खड़े होते.

कई बार तो साफ़ मुकर जाते हैं कि वे उनके लिए रिपोर्टिंग भी करते हैं. वे ताक़तवर लोगों से तुरंत समझौता कर लेते हैं.

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कोर्ट-कचहरी

छोटी-छोटी जगहों पर काम करने वाले हज़ारों अंशकालिक संवाददाता आम तौर पर आर्थिक तौर पर कमज़ोर भी होते हैं.

मीडिया संस्थान उन्हें उनके काम के लिए बहुत कम पैसे देते हैं और वह भी कई-कई महीनों के बाद. ज़ाहिर है कि कोर्ट-कचहरी की लड़ाई भी वे नहीं लड़ सकते.

ऐसे मामलों की ख़बरें राज्य या देश की राजधानी तक पहुँचती ही नहीं या पहुंचती भी हैं तो उन्हें गंभीरता से नहीं लिया जाता.

शहरों में रहने वाली पत्रकार बिरादरी खुद को इन पत्रकारों से जोड़ने और उन्हें सहयोग-समर्थन देने में नाक़ाम रही है.

सच तो ये है कि उसने इस दिशा में कोई कोशिश भी नहीं की है.

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ये लड़ाई सबके लिए रहे जारी

ये अच्छी बात है कि गौरी लंकेश की हत्या के बाद पत्रकारों ने एकजुटता दिखाई और वे खुलकर सामने आए. लेकिन उन्हें अब यहीं नहीं रुकना चाहिए.

उन्हें इस बारे में सोचना चाहिए कि वे दूर-दराज़ के क्षेत्रों में काम करने वाले अपने साथियों के साथ कैसे खड़े हो सकते हैं. ये कोई बहुत मुश्किल काम नहीं है.

राष्ट्रीय, राज्य और ज़िला स्तर पर ऐसी व्यवस्था खड़ी की जा सकती है जो संकट में फँसे पत्रकारों की ख़बर सब तक पहुँचाकर मदद का इंतज़ाम कर सके.

इससे पत्रकारों को नई हिम्मत मिलेगी और पत्रकारिता को नई धार भी.

ध्यान रहे जो लड़ाई गौरी लंकेश बंगलुरु में लड़ रही थीं, वह गाँव और कस्बों में भी लड़ी जा रही है और आगे चलकर तेज़ भी होगी.

ये पत्रकारिता ही नहीं लोकतंत्र की ज़रूरत है कि उस लड़ाई को सबका संबल मिले.

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(ये लेखक के निजी विचार हैं.)

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