नज़रिया: सरकार का अपने सिपाहियों पर नियंत्रण नहीं रहा?

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कर्नाटक में पत्रकार गौरी लंकेश की पिछले दिनों गोली मारकर हत्या कर दी गई. उनकी हत्या के मामले की पुलिस जांच चल रही है.

इस हत्याकांड के बाद अभिव्यवक्ति की आज़ादी और पत्रकारों की सुरक्षा का सवाल एक बार फिर से चर्चा के केंद्र में है. इसी मुद्दे पर बीबीसी हिंदी ने जाना वरिष्ठ पत्रकार सागरिका घोष के विचार.

पढ़िए सागरिका घोष का नज़रिया

पत्रकार गौरी लंकेश निडर, जुनूनी और जन्मजात विद्रोही थीं.

बीते मंगलवार की रात उनकी ख़ौफनाक तरीके से गोली मार कर हत्या कर दी गई.

वो तमाम क्षेत्रों में किसी के साथ भी पूरे अधिकार के साथ भिड़ जाती थीं और भारत की समतावादी परंपराओं के हक़ में बोलने के अपने अधिकारों पर ज़ोर देती थीं और हमारे देश की समृद्ध मूर्तिभंजक परंपराओं को बचाए रखने में लगी थीं.

जो लोग जातिगत अत्याचार, अंधविश्वास, मजहबी नफरत, पोंगापंथ, देहात में रहने वाले गरीबों के शोषण जैसी समाज की छुपी बुराई- जो उन्हें बंदूक उठाने के लिए मजबूर करती है- के ख़िलाफ़ बोलते हैं और जो अंध राष्ट्रवाद के ख़िलाफ जान जोख़िम में डालकर संघर्ष करते हैं, गौरी की पत्रकारिता को उन्हीं से खाद-पानी मिलता था.

गौरी लंकेश से आख़िर किसे ख़तरा था?

गौरी लंकेश की मौत की 'त्रासद गवाही' देता वो बयान

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हम जैसे पत्रकार जो भारतीय संविधान की भावना के अनुरूप उदार धर्मनिरपेक्ष मूल्यों के पोषक हैं, ये मानते हैं कि पत्रकारों को ऐसे लोगों की आवाज़ बनना चाहिए जो दबे कुचले हैं, जो कड़वी सचाई बयां करते हैं और स्वच्छंद लोगों से असहज करने वाले सवाल पूछते हैं और मुश्किल में घिरे लोगों को सहारा देते हैं.

पत्रकार की भूमिका अच्छाई और बुराई के बीच नीरस और घिसा पिटा 'भेद' करना नहीं. मेरे विचार में वो सामाजिक न्याय का सजग प्रहरी है और राजनीतिक तंत्र की निरंकुश शक्तियों के ख़िलाफ़ खड़ा होता है.

अंधेरी ताक़तों के ख़िलाफ़ जंग

गौरी की हत्या के बाद मुझे दम सा घुटता लगा. मैंने ख़ुद को बेचैन और असहाय महसूस किया. मैं सिर्फ़ इसलिए नहीं हिल गई हूं कि मैंने एक सहयोगी को खो दिया है बल्कि अचानक मेरी ये उम्मीदें टूट गई हैं कि क्या नफ़रत फैलाने और बांटने वाली अंधेरी ताक़तों के ख़िलाफ़ जंग कभी जीती जा सकती है?

क्या गौरी की मौत एक और चेतावनी है कि उदार और धर्मनिरपेक्ष लोग हारने वाले पक्ष में खड़े हैं? क्या असहमति का साहस दिखाने वालों को हत्या करके चुप कर दिया जाएगा?

हमारे बीच से जो भी अंधभक्ति, हिंदुत्व के नाम पर होने वाले जुल्म और एक ऐसी सरकार के ख़िलाफ़ बोलते हैं जो गालियां देने वालों, धमकाने वालों और मृत्युदंड की चेतावनी देने वाले कथित हिंदू राष्ट्रवादियों को कवच मुहैया करती नज़र आती है, वो पहले से ज्यादा ख़तरे में महसूस होते हैं.

क्या वजह ये है कि सच बोलने का मतलब अपनी जान समेत तमाम चीज़ों को ख़तरे में डालना है?

'गौरी लंकेश की हत्या में नक्सलियों और दक्षिणपंथियों की भूमिका की जांच हो'

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गौरी की मौत के बाद सोशल मीडिया पर गालियों की भरमार घटियापन की इंतहा है. ऐसे ट्विटर हैंडल जिन्हें भारत के प्रधानमंत्री भी फॉलो करते हैं, पर गालियां देते हुए लिखा गया कि वो कुत्ते की मौत मरीं.

एक बेतुके बयान में सत्ताधारी दल ने कहा कि प्रधानमंत्री जिन लोगों को फॉलो करते हैं, उन्हें 'चरित्र प्रमाणपत्र' नहीं देते हैं. तब क्या हम ये मानकर चलें कि जो लोग भारत की सत्ताधारी पार्टी के समर्थक होने का दम भरते हैं, उनकी बेहूदा और गिरी हुई बातों की कोई निंदा नहीं होगी?

भारतीय जनता पार्टी की पूरी सरकार जवाहर लाल नेहरू यूनिवर्सिटी के उन 'देशविरोधी' छात्रों की निंदा करने में जुटी थी जिन पर नारे लगाने का आरोप था, क्या अब एक मरहूम पत्रकार के ख़िलाफ नफरत का ज़हर उगलकर बोलने की अपनी आज़ादी पर बदनुमा दाग़ लगाने वालों की दिखावे के लिए भी निंदा नहीं होगी, वो भी सिर्फ इसलिए कि वो सरकार और उसकी हिंदू राष्ट्रवादी विचारधारा की कटु आलोचक थीं?

हम नहीं जानते कि गौरी लंकेश की हत्या किसने की लेकिन हम सोशल मीडिया पर देख सकते हैं कि उनकी मौत पर जश्न कौन मना रहा है और वो सभी भारतीय जनता पार्टी और मोदी के समर्थक हैं.

प्रधानमंत्री अपने भक्तों के बर्ताव पर एतराज़ क्यों नहीं जाहिर कर सकते हैं? ऐसा शायद इसलिए है कि सरकार का अपने ज़मीनी सिपाहियों पर नियंत्रण नहीं रहा और वो एक ऐसे शेर की सवारी कर रही है जिससे उतरना मुमकिन नहीं.

गौरी की मौत के बाद मनाए जा रहे जश्न पर क़ानून मंत्री रविशंकर प्रसाद ने सामने आकर हैरानी जाहिर की और उनकी ही पार्टी के कैडर ने सार्वजनिक तौर से उन पर हल्ला बोल दिया.

गौरी की मौत से एक सीमा रेखा लांघ दी गई है. पत्रकारों, बुद्धिजीवियों, एक्टिविस्टों पर पहले से ज़्यादा ख़तरा है और उन्हें किसी तरह की सुरक्षा हासिल नहीं है.

गौरी लंकेश पर ट्वीट कर क्यों ट्रोल हो गए रविशंकर प्रसाद?

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Image caption एमएम कलबुर्गी की फ़ेसबुक प्रोफ़ाइल से ली गई तस्वीर

ऐसा लगता है कि हम अंधेरे में घिर गए हैं और यक़ीन और दिलासे के लिए बेकार एक दूसरे की ओर देख रहे हैं. छोटे शहरों के क्षेत्रीय भाषाओं में काम करने वाले पत्रकारों पर ख़तरा ज़्यादा है. निहित स्वार्थों वाली ताक़तों के ख़िलाफ़ आवाज़ उठाने की वजह से हर गली चौराहे पर मौत उनकी घात में रहती है.

ऐसा लगता है कि अब किसी स्टोरी की पड़ताल नहीं होगी, किसी स्कैंडल को सामने नहीं लाया जाएगा, कोई विचार प्रसारित नहीं होगा, कोई आलोचनात्मक टिप्पणी नहीं की जाएगी और कोई सवाल नहीं पूछा जाएगा क्योंकि इनमें से कुछ भी करने का मतलब किसी हत्यारे की गोली को आमंत्रित करने का जोख़िम लेना होगा.

तर्कशील होने की वजह से हत्या

गौरी की हत्या की गई क्योंकि नरेंद्र दाभोलकर, पानसरे और कलबुर्गी की तरह उनके विचार भी तर्कशील थे. भारत के सुदूर इलाक़ों में प्रगतिशील मूल्यों की मशाल ले जाने वाले इन तमाम बेहद मूल्यवान लोगों की जीवन ज्योति को ऐसे लोगों ने बुझा दिया जो उनकी शक्तियों से डरते थे. जो जानते थे कि बहस में वो हार रहे हैं.

शायद यही वजह है कि इस वक़्त डर की कोई जगह नहीं है. गौरी की मौत ने दिखाया कि वो कितनी ताक़तवर थीं और वो दूसरों में कितना ख़ौफ भर देती थीं. दुश्मन भले ही सर्वशक्तिमान नज़र आए लेकिन वो डरा हुआ, अनिश्चित और असुरक्षित है.

गौरी लंकेश ने अमित शाह को भी नहीं बख़्शा

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दुश्मन जानता है कि वो इतिहास के ग़लत सिरे पर खड़ा है.

एक खामोश गर्जना तेज़ हो रही है. महिलाएं तीन तलाक़ के ख़िलाफ अभियान चला रही हैं, एक्टिविस्ट जातिगत भेदभाव और मैला ढोने के मुद्दे उठा रहे हैं, गोरक्षा के नाम पर जान गंवाने वालों के परिजन को तसल्ली देने के लिए कारवां-ए-मोहब्बत नाम की साहसिक पहल हुई है.

भारतीय समाज नफ़रत और बहुसंख्यकवाद के ख़िलाफ़ संघर्ष कर रहा है. जब मुझे और दूसरी महिला पत्रकारों को सोशल मीडिया पर हत्या की धमकी दी गई तो मैंने पुलिस के पास शिकायत दर्ज़ कराई. पुलिस ने मामला दर्ज़ कर जांच शुरू कर दी है.

मुझे जो समर्थन और एकजुटता के संदेश मिले, अनचाहे हलकों से भी, उससे मैं प्रभावित हूं. आशा रखना मुश्किल है लेकिन ये हमारा कर्तव्य है.

साहस मुश्किल से मिलता है लेकिन ये सबसे अहम चीज़ है जिसे हमें तेज़ी के साथ जकड़ लेना चाहिए. ऐसा लगता है कि अपनी मौत के ज़रिए गौरी हमसे कहना चाहती हैं- बहादुर बनो क्योंकि हममें से अगर किसी एक की मौत होती है तो उसकी जगह लेने के लिए सैंकड़ों और खड़े हो जाएंगे.

(टाइम्स ऑफ इंडिया की कंस्लटिंग एडिटर सागरिका घोष के साथ बातचीत पर आधारित)

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